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  • Apr 2 2019 6:43PM

कला की रीढ़ रंगमंच का संरक्षण बेहद जरूरी

कला की रीढ़ रंगमंच का संरक्षण बेहद जरूरी

अरबिंद कुमार मिश्रा

झारखंड की मिट्टी के कण-कण में कला और संस्कृति समायी हुई है. कला के पुजारी डॉ रामदयाल मुंडा ने कहा था कि यहां चलना ही नृत्य है, तो बोलना ही संगीत है. यहां की प्रकृति भी लोगों से गीत-संगीत के माध्यम से संवाद करती है. यहां की मिट्टी ने एक से बढ़कर एक कलाकारों को जन्म दिया है, जो दिन-रात कला की सेवा में लगे हुए हैं. रांची की एक ऐसी ही कला की पुजारन हैं रीना सहाय. पिछले 25 वर्षों से थिएटर, फिल्‍मों और डॉक्यूमेंट्री के क्षेत्र में वह काम कर रही हैं. वह कहती हैं कि बचपन से ही उनका झुकाव अभिनय की ओर था. वक्त के साथ उनकी रूचि इस क्षेत्र में और बढ़ती चली गयी. कला की रीढ़ रंगमंच को संरक्षित करने की जरूरत है

प्रसिद्ध थियेटर आर्टिस्ट हैं रीना
रांची विश्वविद्यालय से हिंदी (विशेष पत्र - नाटक) भाषा से स्‍नातकोत्तर और वर्तमान में राजधानी के एक बड़े स्‍कूल की शिक्षिका रीना सहाय रांची की सबसे पुरानी थिएटर आर्टिस्ट में से एक हैं. अब तक वे सैकड़ों नाटक और फिल्‍मों में काम कर चुकी हैं. उन्‍होंने पगला घोड़ा, अमली, एक और द्रोणाचार्य, आषाढ़ का एक दिन, आधे-अधूरे, कैक्‍टस, शोभा एक इतिहास, कंपनी उस्‍ताद, खूबसूरत बहू, कहां हो परशुराम, संत और शैतान, चार दिन, नाटक नहीं, नाटक में नाटक, अनारकली का चुनाव, मुन्‍ना, अवरुद्ध इतिहास, चरणदास चोर, अंधेर नगरी चौपट राजा जैसे नाटकों में काम किया है.

फिल्म भगवान बिरसा से मिली पहचान
रीना सहाय ने नागपुरी के साथ-साथ हिंदी और भोजपुरी भाषा में कई फिल्‍में बनायी हैं. उनकी पहली फिल्‍म भगवान बिरसा को लोगों ने काफी पसंद किया और इसी ने उन्‍हें अलग पहचान दिलायी. इसके अलावा उन्होंने उलगुलान एक क्रांति, झारखंड कर छैला, ए सजनी, लोहरदगा, कोख, बेरंग सपने, आकांक्षा (टेलीफिल्‍म), हंसे तो फंसे (टेलीफिल्‍म), डाकिया (टेलीफिल्‍म), कहानी किस्‍मत की जैसी फिल्‍मों में काम किया. इसके साथ-साथ उन्‍होंने बहुत सारी डॉक्‍यूमेंट्री फिल्‍मों में भी काम किया है.

सावधान इंडिया में कर चुकी हैं अभिनय
मशहूर टीवी धारावाहिक सावधान इंडिया में भी रीना सहाय अपनी अभिनय प्रतिभा दिखा चुकी हैं. वह कहती हैं कि झारखंड की एक सच्‍ची घटना पर आधारित इस शो में काम करने से उनकी पहचान और बढ़ी है.

आकाशवाणी में हैं आकस्मिक उद्घोषिका
आकाशवाणी में नाटक के साथ-साथ उन्होंने धारावाहिक में भी काम किया है. सबसे पहले वो बाल कलाकार के रूप में जुड़ीं. उसके बाद से लगातार काम कर रही हैं. फिलहाल आकस्‍मिक उद्घोषिका के रूप में कार्यरत हैं. वह दूरदर्शन से भी जुड़ी हैं.

विभिन्‍न पुरस्‍कारों से सम्‍मानित
नाटक शोभा एक इतिहास के लिए रीना सहाय को 1992 में पटना में सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री का सम्‍मान दिया गया. 1994 में रांची की सर्वश्रेष्‍ठ अभिनेत्री चुनी गयीं. 2004 में अंतरराष्‍ट्रीय नाट्य संस्‍था यूनेस्‍को (पेरिस) के बिहार केंद्र ने अनवरत साधना से रंगकर्म को नया आयाम प्रदान करने के लिए अनिल मुखर्जी सम्‍मान प्रदान किया. 2018-19 में भागलपुर सांस्‍कृतिक महोत्‍सव में श्रेष्‍ठ अभिनेत्री सम्‍मान दिया गया. इसके अलावा शिक्षण के क्षेत्र में भी उन्‍हें श्रेष्‍ठ शिक्षक का सम्‍मान मिल चुका है.

नारी जागरण और सामाजिक मुद्दे पर किया काम
रीना सहाय ने नुकड़ नाटक के माध्‍यम से नारी जागरण एवं सामाजिक मुद्दे पर काम किया है, जैसे- नारी शोषण का विरोध, महिलाओं को अपने अधिकार के प्रति जागृत करना, अंधविश्वास, अशिक्षा, सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ, जातिगत एवं धार्मिक भेदभाव को अपना विषय बनाया और काम किया. नाटकों के माध्‍यम से लोगों को जागरूक करने की कोशिश भी की.

नाटक को बचाने की जरूरत
रीना सहाय की इच्छा है कि जीवन के आखिरी क्षणों तक वो काम करती रहें. नाटक को जीवंत रखने पर जोर देती हैं. कहती हैं कि रंगकर्मियों का उत्साह दर्शकों की तालियों से होता है, लेकिन दुख की बात है कि जहां नाटक का मंचन होता है, वहां दर्शकों की काफी कमी रहती है. रंगमंच कला की रीढ़ है, इसे बचाना बेहद जरूरी है.

नये कलाकारों से अपील
कला के क्षेत्र में कदम रखनेवाले नये कलाकारों से रीना की अपील है कि वे धैर्य के साथ नाटक या जिस विधा में आपकी रुचि है, उसकी सेवा करते जाएं. कला की बारीकियों को समझें और सीखें. आप पायेंगे कि धीरे-धीरे बुलंदियों को छू रहे हैं.

रंगकर्मियों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं : रीना सहाय
रीना सहाय कहती हैं कि रांची में रंगमच कलाकारों की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है. कलाकारों को कहीं से कोई आर्थिक मदद नहीं मिलती है. रंगकर्मी अपने खर्च पर काम करते हैं. बाहर भी जाना होता है, तो आपस में पैसे जमा करते हैं और नाटक में हिस्सा लेते हैं. अगर यहां के कलाकारों को आर्थिक मदद मिले, तो और भी अच्छे काम नाटक के क्षेत्र में हो सकते हैं. उनका कहना है कि ये तो कलाकारों का जुनून है कि तमाम परेशानियों के बावजूद वे लगातार इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं.