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  • Jun 13 2019 2:04PM

पंचायतों को स्वच्छ पेयजलापूर्ति का है अधिकार

पंचायतों को स्वच्छ पेयजलापूर्ति का है अधिकार

स्वच्छ जल सभी की जरूरत है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में स्वच्छ जलापूर्ति करना एक बड़ी चुनौती है. ग्रामीणों का अधिकार है कि उन्हें उनकी जरूरत के हिसाब से पानी मिल सके. 2011 की जनगणना के मुताबिक राज्य के 26 फीसदी ग्रामीण पेयजल व कृषि के लिए कुएं के पानी पर निर्भर हैं, जबकि केरल में 62 फीसदी ग्रामीण कुएं पर निर्भर हैं. पानी के इस्तेमाल से लेकर जल प्रबंधन तक की जिम्मेदारी पंचायतों को दी गयी है. स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति, जलस्त्रोत का प्रबंधन, सिंचाई के लिए जल संसाधन उपलब्ध कराने को लेकर पंचायतों को विशेष अधिकार दिये गये हैं

जलापूर्ति व जल प्रबंधन को लेकर मुखिया का अधिकार
झारखंड पंचायती राज अधिनियम की धारा 75() के क्रमांक 11 के मुताबिक, पेयजल की सुविधा उपलब्ध कराना मुखिया का अधिकार है. इसके तहत पेयजल, कपड़ा धोने, स्नान करने के लिए सार्वजनिक कुएं, जलाशयों और चापाकलों के निर्माण, मरम्मत और अनुरक्षण का अधिकार मुखिया के पास होता है. जल प्रदूषण पर नियंत्रण और निवारण का उपाय करना भी मुखिया का कार्य है. इसके अलावा ग्रामीण जलापूर्ति योजना का संचालन एवं अनुरक्षण और पेयजल स्त्रोतों का प्रबंध करना भी मुखिया का कार्य है.

पेयजल को लेकर पंचायत समिति का अधिकार
जल प्रदूषण का नियंत्रण और निवारण करना पंचायत समिति का अधिकार है. ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं की व्यवस्था करना, मरम्मत करना और अनुरक्षण की समेकित व्यवस्था करना पंचायत समिति का कार्य है. पेयजल स्त्रोत के समेकित प्रबंधन में भी पंचायत समिति की भूमिका अहम है.

पेयजल की सुविधा को लेकर जिला परिषद के अधिकार
ग्राम पंचायतों में जल प्रदूषण का नियंत्रण और निवारण का जिम्मा जिला परिषद का होता है. ग्रामीण जलापूर्ति का विस्तार करना जिला परिषद का अधिकार है. यह अधिकार मुखिया या प्रमुख के पास नहीं होता है. पेयजल स्त्रोत का प्रबंधन जिला परिषद का अधिकार है.

मुखिया को है जल कर लेने का अधिकार
गांवों में अक्सर यह समस्या सामने आती है कि जब भी ग्रामीण खराब चापाकल की शिकायत लेकर मुखिया के पास जाते हैं, तो मुखिया जूनियर इंजीनियर से शिकायत करने के बाद भी कार्रवाई नहीं होने की बात दोहराते हैं. यही कारण है कि ग्रामीणों को पेयजल की कमी का सामना करना पड़ता है. इस समस्या से निबटने के लिए पेयजल एवं स्वच्छता विभाग, झारखंड की ओर से साल 2013 में जलकर लेने का अधिकार दिया गया है. इसके तहत मुखिया ग्राम जल स्वच्छता समिति का गठन कर जरूरत के हिसाब से राशि तय कर ग्रामीणों से पैसे ले सकते हैं, ताकि चापाकल बनाने के लिए पंचायतों के पास अतिरिक्त फंड की सुविधा हो. वर्ष 2013 के पत्र के आलोक में ग्राम जल स्वच्छता समिति को जल शुल्क और जल प्रदूषण पर शुल्क लेने का अधिकार है.

जल संचयन के उपाय
ग्रामीण क्षेत्रों में जल संचयन के लिए कम खर्च में वैकल्पिक उपाय किये जा सकते हैं. इसके तहत गांव के बेकार पड़े सार्वजनिक कुओं का इस्तेमाल जल संचयन के लिए किया जा सकता है. सिर्फ पानी के बहाव का रास्ता कुआं तक लाना होगा. इससे खर्च की बचत होगी, क्योंकि शॉकपिट के लिए गड्ढे खोदने की जरूरत नहीं पड़ेगी. कुआं भूगर्भ जल संचयन का एक बेहतर माध्यम है. खराब पड़े चापाकलों का इस्तेमाल भी जल संचयन के लिए किया जा सकता है. शॉकपिट के लिए एक बोरिंग की जरूरत पड़ती है. खराब पड़े चापाकल की बोरिंग का इस्तेमाल इसके लिए किया जा सकता है. बस इसके लिए शॉकपिट का गड्ढा बनाना पड़ेगा. वहां से निकलनेवाले पानी को पाइप के जरिये चापाकल तक पहुंचाना पड़ेगा. इसके निर्माण में होनेवाले व्यय के लिए मुखिया अनटाइड फंड का इस्तेमाल कर सकते हैं. इन उपायों से जलस्तर में काफी बढ़ोतरी हो सकती है.

पंचायत प्रतिनिधियों को निभानी होगी जिम्मेदारी
जल संचयन जरूरी है. इसके लिए ग्रामीणों के साथ-साथ पंचायतों को भी सामने आना होगा. पानी बचाने के लिए हर व्यक्ति को जागरूक करना होगा. जलस्त्रोत का बेहतर तरीके से प्रबंधन करना होगा. सार्वजनिक सिंचाई व्यवस्था किसानों के लिए करनी होगी. नदियों में चेकडैम बनाकर बरसात के पानी को रोकना होगा. पेड़ लगाने होंगे, तब जाकर हमारी आनेवाली पीढ़ी को पानी के लिए परेशान नहीं होना पड़ेगा.