ssakshtkaar

  • Nov 2 2018 4:09PM

जैविक खेती की ओर बढ़ रही किसानों की रुचि

जैविक खेती की ओर बढ़ रही किसानों की रुचि

रासायनिक खाद और कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति और इंसानों के स्‍वास्‍थ्‍य में लगातार गिरावट आती जा रही है. पर्यावरण पर भी इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है. ऐसे में जैविक खेती की ओर किसानों की रुचि बढ़ने लगी है. जैविक खेती के बारे में दिव्‍यायन कृषि विज्ञान केंद्र के सचिव स्वामी भवेशानंद, प्रधान वैज्ञानिक डॉ अजीत सिंह और डॉ रंजन कुमार सिंह से अरविंद कुमार मिश्रा ने विस्‍तृत बातचीत की.

सवाल : जैविक खेती क्‍या है?
जवाब : जैविक खेती कृषि की वह विधि है, जो संश्‍लेषित उर्वरकों और संश्‍लेषित कीटनाशकों के प्रयोग पर आधारित है, जो भूमि की उर्वरा शक्ति को बनाये रखने में मदद करती है. 1990 के बाद पूरे विश्व में जैविक उत्‍पादों का बाजार काफी बढ़ा है.

सवाल : जैविक खेती आवश्यक क्‍यों है?
जवाब : भारत में आजादी से पहले पारंपरिक खेती जैविक विधि से ही की जाती थी. इसमें रसायन का प्रयोग किये बिना फसलें पैदा की जाती थीं, लेकिन आजादी के बाद भारत को फसलों पर आत्‍मनिर्भर बनाने के लिए हरित क्रांति की शुरुआत की गयी. इसमें फसलों की अच्‍छी पैदावार के लिए रसायन और कीटनाशकों का अंधाधुंध प्रयोग किया जाने लगा. रासायनिक खेती से फसलों की पैदावार तो बढ़ी, लेकिन इससे मृदा की उत्‍पादन शक्ति घटती गयी. वर्तमान में रसायनों के बढ़ते प्रभाव से न केवल मृदा, बल्कि इंसानों की सेहत पर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव दिख रहा है. जैविक खेती मृदा की उर्वरा शक्ति और इंसानों की सेहत ठीक रखने के लिए बेहतर विकल्‍प है.

सवाल : पर्यावरण की दृष्टि से जैविक खेती कितना लाभप्रद है?
जवाब : भारत में प्राचीन काल से कृषि के साथ-साथ गौ पालन किया जाता था. इसका प्रमाण हमारे ग्रंथों में भी मिलता है. कृष्‍ण और बलराम इसके उदाहरण हैं, जिन्‍हें गोपाल और हलधर के नाम से भी जानते हैं यानी कृषि और गौ पालन संयुक्‍त रूप से अत्‍यधिक लाभकारी है, जो न केवल इंसानों, बल्कि पर्यावरण के लिए भी उपयोगी है. बदलते समय के साथ गौ पालन धीरे-धीरे कम हो गया और कृषि में तरह-तरह के रासायनिक खाद व कीटनाशकों का प्रयोग होने लगा. इसके कारण जैविक और अजैविक पदार्थों के चक्र का संतुलन बिगड़ता जा रहा है और वातावरण प्रदूषित होकर लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य को प्रभावित कर रहा है.

सवाल : जैविक खेती से क्‍या लाभ है?
जवाब : जैविक खेती से किसानों के साथ-साथ मृदा और पर्यावरण को लाभ होता है. सबसे पहले किसान की बात करें तो, जैविक खेती से भूमि की उत्पादक क्षमता में वृद्धि हो जाती है. कम सिंचाई की आवश्यकता होती है यानी सिंचाई अंतराल में वृद्धि हो जाती है. रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से लागत में कमी आती है और फसलों की उत्‍पादकता में भी वृद्धि होती है. मृदा की बात करें तो जैविक खेती से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है. भूमि की जलधारण क्षमता बढ़ती है. भूमि से पानी का वाष्‍पीकरण कम होता है और मिट्टी की रासायनिक, जैविक और भौतिक अवस्‍था में सुधार होता है. वर्षा आ‍धारित क्षेत्रों में जैविक खेती और अधिक लाभदायक है. जैविक विधि से खेती करने से उत्‍पादन की लागत तो कम होती ही है, इसके साथ ही कृषक भाइयों की आमदनी भी बढ़ती है. आधुनिक समय में निरंतर बढ़ती जनसंख्‍या, पर्यावरण प्रदूषण, भूमि की उर्वरा शक्ति का संरक्षण एवं मानव स्‍वास्‍थ्‍य के लिए जैविक खेती लाभप्रद है.

सवाल : जैविक खाद बनाने की क्या विधि है?
जवाब : आज सघन खेती के युग में भूमि की उर्वरा शक्ति बनाये रखने के लिए प्राकृतिक खादों का व्‍यवहार बढ़ रहा है. इन प्राकृतिक खादों में गोबर की खाद, कंपोस्‍ट, हरी खाद मुख्‍य हैं. कंपोस्‍ट बनाने के लिए फसलों के अवशेष, पशुशाला का कूड़ा करकट व गोबर को गड्ढे में गलाया और सड़ाया जाता है.

वर्मी कंपोस्ट
अब केंचुआ की मदद से वर्मी खाद तैयार की जाने लगी है, जिससे किसानों को उत्‍पादन में काफी लाभ मिल रहा है और मृदा की उत्‍पादन शक्ति भी बनी रहती है. केंचुआ मिट्टी में पाये जानेवाले जीवों में सबसे प्रमुख है. ये अपने आहार के रूप में मिट्टी तथा कच्‍चे जीवांश को खाता है और फिर छोटी-छोटी कास्टिंग्स के रूप में बाहर निकालता है. इसी कंपोस्‍ट को वर्मी कंपोस्‍ट या केंचुआ खाद कहा जाता है. वर्मी कंपोस्‍ट में साधारण मृदा की तुलना में पांच गुना अधिक नाइट्रोजन, सात गुना अधिक फास्‍फोरस, सात गुना अधिक पोटाश, दो गुना अधिक मैग्नीशियम व कैल्शियम होते हैं.

खाद बनाने के तरीके
जैविक खाद बनाने के लिए गड्ढे का आकार तीन मीटर लंबा, डेढ़ मीटर चौड़ा और एक मीटर गहरा होना चाहिए. गड्ढे की संख्‍या प्रति मवेशी होनी चाहिए. इसके लिए खर-पतवार, कूड़ा-कचरा, फसलों के डंठल, पशुओं के मल-मूत्र एवं इससे सने पुआल, जलकुंभी, पुटूस की पत्तियां जरूरी होती हैं. जैविक खाद बनाने के लिए प्रत्‍येक गड्ढे को तीन भागों में बांटकर जो भी सामग्री उपलब्‍ध हो, उसे एक पतली परत के रूप में बिछा देना है. उसके बाद गोबर का पतला घोल तैयार कर एक सतह पर डाल देना है और उसमें लगभग 200 ग्राम लकड़ी का राख बिछा देना है. प्रत्‍येक सतह पर लगभग 25 ग्राम यूरिया या पानी एवं गोमूत्र का घोल डाल दें. गड्ढे को उसी तरह तब तक भरते रहना है, जब तक उसकी ऊंचाई जमीन की सतह से 30 सेंटीमीटर ऊंची न हो जाये. उसके बाद बारीक मिट्टी की पतली परत से गड्ढे को ढंक दें तथा गोबर से लिपाई कर बंद कर देना चाहिए. इस तरह पांच से छह महीन में कंपोस्‍ट खाद तैयार हो जायेगा.

सवाल : जैविक खेती से उत्‍पादन पर कितना असर पड़ता है?
जवाब : सामान्‍यत: आम किसानों के दिमाग में एक धारणा घर कर गयी है कि जैविक खेती में लागत के अनुपात में आय नहीं मिल पाती है, लेकिन दिव्‍यायन कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से किये गये अध्‍ययनों में पता लगा है कि जैविक खेती से रासायनिक खेती के अनुपात में प्रति इकाई पूंजी पर अधिक आय प्राप्‍त होती है. मूंग पर किये गये एक अध्‍ययन में पाया गया कि रासायनिक विधि से मूंग की खेती करने पर प्रति इकाई व्‍यय पर 2.44 गुना आय होती है, जबकि जैविक विधि से 3.61 गुना आय प्राप्‍त होती है. अन्य उत्‍पादों पर अध्‍ययन के बाद पाया गया कि उरद, सरसों, धान, मिर्चा आदि की जैविक विधि से खेती करने से रासायनिक पद्धति की अपेक्षा में कम लागत से अधिक उपज प्राप्‍त की जा सकती है.