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  • Aug 16 2019 2:38PM

मछली पालन व प्रसंस्करण में स्वरोजगार की बड़ी संभावनाएं

मछली पालन व प्रसंस्करण में स्वरोजगार की बड़ी संभावनाएं

पंचायतनामा टीम 

बीएयू के मात्स्यिकी विज्ञान महाविद्यालय, गुमला की असिस्टेंट प्रोफेसर श्वेता कुमारी ने कहा की
झारखंड में मत्स्य पालन के क्षेत्र में असीम संभावनाएं हैं. यहां बड़े-बड़े जलाशय व तालाब हैं. बड़ी संख्या में डोभे बनाये गये हैं. इनमें मछली पालन कर किसान न सिर्फ अपनी आमदनी बढ़ा सकते हैं, बल्कि दूसरों को स्वरोजगार भी दे सकते हैं. ऐसे में किसानों के लिए इस क्षेत्र में बड़ा अवसर है. महिलाएं मत्स्य प्रसंस्करण के कार्य से जुड़ कर स्वरोजगार कर सकती हैं और अन्य लोगों को स्वरोजगार दे भी सकती हैं.

पंगेसियस उत्पादन में लागत कम, मुनाफा अधिक
बड़े जलाशयों में केज व पेन कल्चर के जरिए मछली पालन किया जाता है. ऐसे में केज कल्चर के माध्यम से पंगास का उत्पादन करें. इसमें लागत कम आती है और अच्छा मुनाफा होता है. अपेक्षाकृत कम समय में यह तैयार भी हो जाता है.

महिलाओं के लिए मत्स्य प्रसंस्करण
मछली पालन में महिलाओं की सहभागिता अपेक्षाकृत कम दिखती है. महिलाएं मत्स्य प्रसंस्करण के कार्य से जुड़ कर आत्मनिर्भर बन सकती हैं. आमदनी बढ़ाने के साथ-साथ वह दूसरों को भी स्वरोजगार से जोड़ सकें‍गी. फिलहाल किसानों का मछली उत्पादन पर ही जोर रहता है. मत्स्य प्रसंस्करण का कार्य नहीं किया जाता है. मछली का प्रसंस्करण कर फिश समोसा, फिश कटलेट, फिश फिंगर व मछली का अचार बनाकर बिक्री की जा सकती है. राज्य से कुपोषण दूर करने में भी इसकी अहम भूमिका होगी.