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  • Jun 13 2019 2:40PM

पर्यावरणविद् डॉ नीतीश प्रियदर्शी ने कहा,अर्बन डेजर्ट की तरफ बढ़ रहे हैं हम

पर्यावरणविद् डॉ नीतीश प्रियदर्शी ने कहा,अर्बन डेजर्ट की तरफ बढ़ रहे हैं हम

जल हमारे लिए बेहद जरूरी है. इसे बचाना चाहिए. यह बात हम सभी जानते हैं, लेकिन जल संरक्षण के लिए सही तरीके से कौन काम करता है और कौन नहीं. इस सोच को बदलना होगा. हर किसी को जल संरक्षण पर जोर देना होगा. पृथ्वी पर पानी की कमी नहीं है, लेकिन मीठा पानी या पीने योग्य पानी बहुत कम है. इसका संरक्षण और सुनियोजित तरीके से इस्तेमाल करना बेहद जरूरी है. जिस तरीके से शहरीकरण हो रहा है, कंक्रीट के जंगल बढ़ रहे हैं. नदियां सिमट रही हैं. तालाब विलुप्त हो रहे हैं. भूगर्भ जलस्तर कम हो रहा है, इसलिए अब यह कहा जा रहा है कि धीरे-धीरे हम अर्बन डेजर्ट (शहरी मरुभूमि) की ओर बढ़ रहे हैं. जिस तरीके से हालात हर रोज सामने आ रहे हैं, उससे यह अंदाजा लगाया सकता है कि अगर तुरंत हम नहीं चेते और कोई ठोस कदम नहीं उठाये गये, तो आनेवाले दिनों में परिणाम और गंभीर हो सकते हैं

बेहतर रणनीति नहीं होने के कारण बढ़ा भूगर्भ जल पर दबाव
पिछले 25-30 वर्षों से भूगर्भ जल पर दबाव बढ़ा है. राजधानी रांची की बात करें, तो पहले रांची शहर में नियमित पानी की आपूर्ति होती थी. कुओं में सालोंभर पानी रहता था. काफी संख्या में तालाब थे. रांची के बीच से कई छोटी-छोटी नदियां गुजरती थीं, जिसके कारण जलस्तर काफी बढ़िया था. काफी संख्या में पेड़ भी थे, पर पिछले 25 से 30 वर्षों में तेजी से शहरीकरण हुआ. तालाब विलुप्त हो गये. नदियों पर अतिक्रमण हुआ. जनसंख्या बढ़ी, तो पानी आपूर्ति में भी कमी आयी. पानी आपूर्ति में कमी आने पर कुंओं पर बोझ बढ़ा. कुएं सूखने लगे. तब लोग बोरिंग पर निर्भर होने लगे. यही कारण है कि आज राजधानी रांची के कई इलाकों में भूगर्भ जलस्तर बहुत नीचे चला गया है.

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ऐसे करें पानी का संचयन
बारिश का पानी मीठे जल का बेहतर स्त्रोत होता है. इसके संचयन से ही हम भूगर्भ जलस्तर को सुधार सकते हैं. फिलहाल 60 फीसदी बारिश का पानी यूं ही बेकार होकर बह जाता है. इसे रोकने के प्रयास करने होंगे. शहर में विलुप्त हो चुकी नदी और तालाब को जिंदा करना होगा. बरसाती नदियों पर चेकडैम बनाकर पानी को रोकना होगा. पक्की नालियों के निर्माण पर रोक लगानी होगी. पार्क या दूसरे सार्वजनिक स्थान और घरों के आसपास की खाली जमीन का पक्कीकरण करने से बचना होगा, ताकि पानी जमीन के अंदर जा सके. नगर निगम द्वारा वाटर हार्वेस्टिंग के लिए जिन इलाकों में शुरुआत की गयी है, उन इलाकों के जलस्तर की जांच करनी होगी, तब जाकर पता चलेगा कि यह तकनीक कितनी कारगर हुई है. नहीं तो दूसरे विकल्प की शुरुआत करनी होगी. किसानों को सिंचाई के लिए सामूहिक सिंचाई प्रणाली का इस्तेमाल करना होगा. शुद्ध पेयजलापूर्ति सुनिश्चित करनी होगी, ताकि बोरिंग पर निर्भरता और लोड कम हो सके. घनी आबादी वाले क्षेत्रों में जो भी वेट लैंड एरिया है, उस पर अतिक्रमण से बचना होगा. हमें यह समझना होगा कि बोरिंग का पानी बैंक से निकाले जा रहे पैसे की तरह है. अगर हम सिर्फ निकालते रहे और डालने की नहीं सोचे, तो पानी खत्म हो जायेगा.

भूमिगत जल की जांच हो
जमीन के अंदर जो पानी है, वह कितने सालों से वहां जमा है, उस पानी की हमेशा जांच होनी चाहिए.
जांच के बाद ही उस पानी का इस्तेमाल करना चाहिए, क्योंकि शुद्ध पेयजल नहीं मिलने से लोग कई प्रकार की गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.

आर्सेनिक व फ्लोरोसिस प्रभावित जिले
राज्य के कई जिले आर्सेनिक व फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं. राजधानी रांची का पत्थलकुदवा और साहिबगंज आर्सेनिक से प्रभावित हैं, वहीं पलामू, गढ़वा, सिल्ली व ओरमांझी क्षेत्र फ्लोरोसिस से प्रभावित हैं.