mehmaan panna

  • Mar 17 2020 5:50PM

वरदान साबित हो रहा माइक्रो ड्रिप इरिगेशन

वरदान साबित हो रहा माइक्रो ड्रिप इरिगेशन

ज्योति रानी

सुशीला देवी रांची के इटकी ब्लॉक के सियारटोली गांव की रहने वाली हैं. समूह से जुड़ने के बाद आज वह अपने परिवार के साथ खुशहाल जिंदगी जी रही हैं. नौवीं कक्षा तक पढ़ी सुशीला की शादी वर्ष 1995 में राम कुमार साहू से हुई, जो तेल प्रसंस्करण की दुकान चलाते हैं. शादी के बाद सुशीला तीन बेटियों और एक बेटे की मां बनीं. सुशीला जब गृहिणी का जीवन जी रही थीं, तब वर्ष 2018 में उन्हें झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (जेएसएलपीएस) के तहत चल रहे स्वयं सहायता समूह के बारे में जानकारी मिली. इसके बाद वो फरवरी 2018 में उगता किरण स्वयं सहायता समूह से जुड़ गयीं. सुशीला बताती हैं कि स्वयं सहायता समूह में शामिल होने के बाद उन्होंने बचत करना शुरू किया, जो पहले नहीं करती थीं.

झिमडी परियोजना के लिए चुना गया सियारटोली गांव
जेएसएलपीएस ने झिमडी (जेएचआइएमडीआइ) परियोजना के लिए सियारटोली गांव को चुना. जापान इंटरनेशनल कॉरपोरेशन एजेंसी (जेआइसीए) द्वारा वित्त पोषित झिमडी परियोजना झारखंड के 9 जिलों में 30,000 किसानों को लक्षित कर कार्य कर रही है. परियोजना का लाभ पाने के लिए किसानों को जेएसएलपीएस द्वारा गठित एसएचजी का सदस्य होना चाहिए और उनके पास छोटे खेत कम से कम 25 डिसमिल का होना चाहिए. परियोजना बड़े पैमाने पर विभिन्न पहलुओं को लेकर कार्य करती है. इसके तहत किसानों को कृषि और उसके उत्पाद की मार्केटिंग की पूरी जानकारी दी जाती है. उसके लिए किसानों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है. परियोजना के तहत किसानों को माइक्रो ड्रिप इरिगेशन (एमडीआई), पॉली हाउस और वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए यूनिट प्रदान की जाती है. आधुनिक तकनीक से खेती और कृषि गतिविधियों के जरिये किसानों की आय में बढ़ोतरी करना इस परियोजना का उद्देश्य है. ड्रिप इरिगेशन की बेहतर तकनीक के इस्तेमाल के जरिये समुदाय की क्षमता निर्माण करना है. झारखंड जल संकट की समस्या वाला राज्य है, झिमडी परियोजना के जरिये एमडीआई खेती राज्य के किसानों के लिए वरदान साबित होगी.

एक्सपोजर विजिट से मिली प्रेरणा
जब सियारटोली गांव का चयन झिमडी परियोजना के लिए हुआ, तब सुशीला सहित गांव के महिला समूह से चुनी हुई महिला सदस्यों को कांके प्रखंड स्थित बोड़ेया गांव में एक्सपोजर विजिट के लिए ले जाया गया. जहां महिलाओं ने माइक्रो ड्रिप इरिगेशन के तहत हो रही खेती और पैदावार को देखा. एमडीआई से भी अच्छी खेती होती है. इसे जानने और समझने के बाद सुशीला ने भी एमडीआई के जरिये खेती करने का मन बनाया. हालांकि सुशीला के लिए माइक्रो ड्रिप इरिगेशन का इस्तेमाल करके खेती करना बिल्कुल नयी बात थी. इस तकनीक के माध्यम से सुशीला ने कभी सिंचाई नहीं की थी. इसके बाद पहली बार जब सुशीला ने आधुनिक तकनीकों को अपनाते हुए खेती की थी. उसने झिमडी परियोजना के तहत एमडीआई प्रणाली, पॉली नर्सरी हाउस और वर्मी कंपोस्ट का लाभ उठाने के लिए अपने एसएचजी से 10,000 रुपये का लोन लिया और इटकी सियारटोली ग्राम संगठन में जमा करने के लिए अतिरिक्त 5000 रुपये का निवेश किया.

कम लागत में हुआ ज्यादा का फायदा
एक्सपोजर विजिट से लौटने के बाद सुशीला ने शुरुआत में 25 डिसमिल जमीन में टमाटर और खीरा की खेती एक साथ की. पहली बार खेती की लागत ज्यादा लगी क्योंकि एमडीआई के तहत जब खेत में ड्रिप इरिगेशन के लिए संरचना तैयार की गयी तो उसमें खर्च बढ़ा. इसके बाद सुशीला ने मटर की खेती की. इस बार उन्हें यह फायदा हुआ कि सिर्फ बीज खरीदने के पैसे लगे.
दो महीने के अंतराल में, सुशीला ने एमडीआई के माध्यम से टमाटर और खीरे की खेती से 41,114 रुपये कमाए. इस खेती में उन्हें 90 फीसदी लाभ हुआ. इसके बाद मटर बेचकर सुशीला ने तीन महीने में 33,556 रुपये कमाये, जो खेती में लगायी गयी लागत से तीन गुना ज्यादा थी. कुल मिलाकर 6 महीने में ही सुशीला ने कृषि के जरिये 85,092 रुपये कमाये. जिसमें 53,066 रुपए का लाभ हुआ. (एमडीआई प्रणाली लगाने के लिए 15, 000 की लागत को छोड़कर).

उपलब्धियों से खुश हैं सुशीला
सुशीला अपनी उपलब्धियों से बहुत खुश हैं. उन्होंने न केवल अपना नाम कमाया, बल्कि अपने बेटे को भी टेलरिंग व्यवसाय शुरू करने में मदद की हैं. जेएसएलपीएस के डीडीयूजीकेवाई कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित होने के बाद सुशीला के बेटे अक्षय कुमार साहू ने अपने गांव में ही सिलाई का व्यवसाय शुरू किया है, जहां उसने 8 सिलाई मशीन और 8 से 10 श्रमिकों के साथ शुरुआत की है. सुशीला ने प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम के तहत 21 लाख रूपए का लोन लिया है. इसके साथ ही सुशीला अपने बेटे की इएमआई चुकाने में मदद कर रही हैं.

अब मेरे पास अपना सब कुछ है : सुशीला देवी
सुशीला बताती हैं कि पहले वह असहाय थीं, पर आज उनके पास अपना सब कुछ है. अब वो अपने परिवार को जरूरत पड़ने पर आर्थिक तौर पर मदद भी करती हैं. सुशीला बताती हैं कि वो एमडीआई तकनीक से खेती करना जारी रखेंगी. अब आगे वो कद्दू की खेती करेंगी. एमडीआई के बारे में सबसे अच्छी बात यह है कि इसमें उत्पादन में लागत बेहद कम आती है. इसके साथ ही एक साल में कम से कम तीन से चार विभिन्न प्रकार की खेती कर सकते हैं.

एमडीआई अपनाती समूह की अन्य महिलाएं
सुशीला की ही तरह उन्हीं के गांव की रहने वाली मनिला टोप्पो ने भी एमडीआई के माध्यम से टमाटर और फूल-गोभी की खेती की है. किसान होने के नाते मनीला ने एमडीआई के माध्यम से खेती करने में उल्लेखनीय परिवर्तन देखा है. उत्पादन की लागत काफी कम हो गई है. अब वो एक ही कीमत पर दो से तीन प्रकार की सब्जियां उगाने में सक्षम हैं. प्राकृतिक या अन्य कारणों से नष्ट होने वाली सब्जियों का प्रतिशत काफी कम हो गया है और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इटकी जैसी सूखी जगह के लिए एमडीआई वरदान साबित हुई है. अब किसान सिंचाइ के लिए वर्षा जल पर निर्भर नहीं हैं साथ ही उन्हें सिंचाई के लिए खेत में अधिक समय नहीं देना पड़ता है. सब्जियों की गुणवत्ता में भी बहुत सुधार हुआ है, इसलिए सब्जियों के बेहतर दाम मिल रहे हैं. मनिला अब अपनी लागत से एक एकड़ जमीन पर एमडीआई तकनीक से खेती करेंगी.

पूनम ने एमडीआई को अपनाया
सियारटोली गांव की किसान पूनम देवी के पति एमडीआई तकनीक से खेती करने को तैयार नहीं थे. इसके बावजूद पूनम ने अपनी जिद से इस तकनीक से खेती की. इनके पति पारंपरिक खेती छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे. मतभेद के कारण पारिवारिक कलह भी हुआ. इसके बाद भी पूनम ने एमडीआई अपनाकर मटर और फूलगोभी की खेती की. एमडीआई का परिणाम देखकर पूनम के पति भी खुश हैं और अब दोनों मिलकर एमडीआई से खेती करेंगे. इसके साथ ही एमडीआई के अच्छे परिणाम को देखकर सीएलएफ की अध्यक्ष किरण देवी ने एमडीआई के जरिये खेती करने के लिए आवेदन दिया है. अब उनके खेत में एमडीआई तकनीक लगायी जायेगी. एमडीआई के फायदे बताते हुए आजीविका कृषक मित्र किरण देवी बताती हैं कि इसके जरिये खेती करने से बहुत फायदे हैं. फिलहाल वो 100 किसानों को अपनी सेवा दे रही हैं जिन्होंने एमडीआई के तहत खेती की है. अब तक तकरीबन 28 किसान उनके सुझाव से एमडीआई की खेती कर रहे हैं.