mehmaan panna

  • Aug 19 2019 5:44PM

आदर्श गांव से सीखें दूसरे गांव के लोग

आदर्श गांव से सीखें दूसरे गांव के लोग

आरा-केरम गांव में 60 एकड़ जमीन में 3000 ट्रेंच कम बंड (बड़ा गड्ढा) की व्यवस्था की गयी है. यह बहते पानी को रोकने में कारगर साबित हो रहे हैं. आज भी यहां के लोगों द्वारा महीने में दो दिन श्रमदान किया जाता है, ताकि व्यवस्था को और बेहतर किया जा सके. केरम गांव के ग्राम प्रधान रामेश्वर बेदिया प्रधानमंत्री द्वारा गांव की चर्चा किये जाने से काफी खुश हैं. रामेश्वर कहते हैं कि मुझे बेहद खुशी होती है कि हमारे गांव का नाम हो रहा है. इसके पीछे हम सबकी मेहनत है. हम पानी सोखने वाला ट्रेंच बना रहे हैं. गांव के लोग एक-एक बूंद पानी बर्बाद नहीं होने पर विशेष जोर दे रहे हैं. रांची के जिलाधिकारी राय महिमापत रे के अनुसार, आरा-केरम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वहां सभी लोग एकजुट होकर काम करना जानते हैं. राज्य सरकार से मिले निर्देश के आलोक में प्रशासन ने ग्रामीणों में चेतना जगायी. सबसे पहले गांव को शराबमुक्त किया और फिर सभी खेती में जुट गये. आज वहां के लोग ऑर्गेनिक खेती कर रहे हैं. इस गांव से अन्य गांवों को सीख लेनी चाहिए

महीने में दो दिन श्रमदान है अनिवार्य
इस गांव ने सामूहिकता की भावना के साथ आगे बढ़ने की भावना विकसित की है. प्रत्येक महीने के एक व 14 तारीख को गांव के लोग श्रमदान करते हैं. केरम गांव में पेड़ काटने से परहेज तो किया ही जाता है, यहां तक कि पेड़ के पत्ते भी यूं ही नहीं तोड़े जाते. पौधरोपण के साथ-साथ गांव व सड़कों की सफाई का पूरा ध्यान रखा जाता है. दिलचस्प बात यह है कि ये गांव नशा तथा खुले में शौच से पूरी तरह मुक्त है. यहां ग्रामीण अपने पशुओं को खुला नहीं छोड़ते. आरा और केरम गांव नशाबंदी, लोटाबंदी, चराइबंदी व कुल्हाड़ी बंदी है. जलछाजन व जल संवर्द्धन के जरिये कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भर इस गांव में मछली पालन की भी शुरुआत हुई है. लोगों की मेहनत तथा सरकार के सहयोग से दो साल में ही इन गांवों की तकदीर बदल गयी है.

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रालेगण सिद्धि के भ्रमण ने खोली आंखें
मनरेगा के तहत कुल 55 डोभा बनाये गये हैं. अब इनमें मछली पालन भी होता है. गांव में मनरेगा के तहत कई काम हुए हैं. केरम के ग्राम प्रधान रामेश्वर बेदिया के अनुसार, वन आधारित जीविकोपार्जन वाले इस गांव में आज न कोई पेड़ काटे जाते हैं और न ही पत्ते तोड़े जाते हैं. गांव में जंगल बचाने के लिए वन रक्षा बंधन कार्यक्रम आयोजित हुआ था. बदलाव की असली बयार अन्ना हजारे के गांव रालेगण सिद्दि की यात्रा के बाद ही बही. जनवरी 2017 में आरा व केरम के 35 ग्रामीणों ने रालेगण सिद्धि का भ्रमण किया था. झारखंड सरकार ने इसकी व्यवस्था की थी. बकौल रामेश्वर इस यात्रा ने हम सबकी आंखें खोल दी. इसी के बाद से इन गांवों में स्वच्छता, नशामुक्ति, बेहतर खेती व श्रमदान ने जोर पकड़ा.

ड्रिप इरिगेशन आधारित खेती से अर्थोपार्जन
वर्ष 2018 से ड्रिप इरिगेशन आधारित खेती शुरू हुई. खेतों में टमाटर, शिमला मिर्च व दूसरी सब्जियां लगती हैं. करीब पांच डिसमिल जमीन पर शिमला मिर्च की खेती से गांव के रामदास महतो को डेढ़ लाख रुपये की आय हुई थी. इसी तरह से अन्य किसानों को भी लाभ मिला है. अब तक इस वर्ष ग्रामीणों ने यहां पांच लाख के तरबूज का उत्पादन किया है. शिमला मिर्च से तीन लाख रुपये तक कमाये हैं. पशुपालन से 15-20 लाख की आय हुई है. दरअसल, इस गांव में बेहतरी के दूसरे उदाहरण भी हैं. सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई पंप व पैक हाउस (छोटे गोदाम टाइप) भी यहां हैं. ग्रामीण विकास के आजीविका मिशन के नौ महिला स्वयं सहायता समूह महिलाओं को आर्थिक ताकत दे रहे हैं.

1000 आदर्श ग्राम बनाने का लक्ष्य
दोनों गांव के लोगों ने मिलकर विकास की गाथा लिखी है. मुख्यमंत्री रघुवर दास ने कहा है कि राज्य में 1000 गांव इसी गांव की तर्ज पर बनेंगे. नवंबर 2017 में मुख्यमंत्री इस गांव का भ्रमण कर चुके हैं. उन्होंने कहा था कि आरा-केरम गांव ने झारखंड में आदर्श ग्राम के रूप में अपनी पहचान बनायी है. गांव के लोगों से मिलकर खुशी हुई और ये जानकर अच्छा लगा कि नशा मुक्त होने के साथ ही इनकी सोच भी बदल गयी है. हमारा लक्ष्य है 2019 तक इस गांव में एक भी बीपीएल परिवार न रहें. इसी गांव के आधार पर 1000 गांवों को आदर्श ग्राम बनाया जायेगा. छोटे-छोटे काम करके हम बड़ा लक्ष्य हासिल कर सकते हैं. आरा और केरम गांव के लोगों ने यह करके दिखाया है.

मुख्यमंत्री रघुवर दास का ग्राम विकास की योजनाओं पर खासा फोकस है. खासकर किसानों की आय दोगुनी करने और गांवों में हरियाली लाने की मुहिम को लेकर वे प्रतिबद्ध हैं. डोभा निर्माण, जन वन योजना, जलशक्ति अभियान, वन सह नदी महोत्सव जैसे कई कार्यक्रम इसकी बानगी है. एक महत्वपूर्ण बैठक में उन्होंने सभी डीसी और वरिष्ठ अधिकारियों से एक-एक गांव गोद लेने की अपील की थी. जनभागीदारी से विकास योजनाओं को लागू कराने पर जोर दिया था. हर रविवार को डीसी को गांव में जाकर लोगों से मिलने की नसीहत दी थी. कई मायने में उनकी इस अपील का असर राज्य के कई गांव में दिखने लगा है. उम्मीद की जानी चाहिए कि आनेवाले समय में आरा-केरम जैसे और भी गांवों की कामयाबी के किस्से सामने आयेंगे और झारखंड की नयी पहचान स्थापित करेंगे.