mehmaan panna

  • Jan 9 2020 4:57PM

बच्चों में जरूरी है संस्कार गढ़ना : निर्मला बहन

बच्चों में जरूरी है संस्कार गढ़ना : निर्मला बहन

निर्मला बहन

कहा जाता है कि जैसा राजा, वैसी प्रजा. पहले राजाओं के चरित्र अनुकरणीय होते थे. लोग कुछ नीति से, कुछ भीति (भय) से मर्यादित रहते थे. आज राजकार्य से जुड़े लोगों पर धन को लेकर आये दिन लांछन लगते रहते हैं, तो प्रजा पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है. इससे अपराधियों को शह भी मिलती है. होना यह चाहिए था कि गरीबी दूर करने की योजनाओं के साथ-साथ सरकार चारित्रिक गरीबी दूर करने की भी योजनाएं बनाये. शहर और गांव में शिक्षालय, स्वास्थ्य केंद्र आदि खोलने के साथ-साथ उनमें नैतिक शिक्षा और नैतिक स्वास्थ्य का भी प्रकोष्ठ बनाती और लोगों के चारित्रिक उत्थान पर ध्यान देती, जिससे नागरिक चरित्रवान बनते. इससे आंतरिक शांति भी बनी रहती, लेकिन लोगों का खुद का आचरण ही आज अत्यंत संदिग्ध और निंदनीय हो गया है.

अब विचार करने की बात है कि वे भी तो कभी बच्चे थे. एक कोमल फूल की तरह वे भी धरती पर आये थे, लेकिन उनके बचपन में उन्हें भी सही गलत का ज्ञान नहीं मिल पाया था. विश्वविद्यालय, विद्यालय में भी डिग्री तो मिली, पर नैतिकता की शिक्षा नहीं मिली. जो आज शिशु हैं, उन्हें भी घर पर या स्कूल-कॉलेज में नैतिक ज्ञान न दिया जाये, तो कल उनकी भी कार्यशैली बिगड़ जायेगी.

बच्चे कल के नेता हैं, लेकिन कल वे कुछ सार्थक कर सकें, इससे पहले आज ही उन्हें नैतिक रूप से बुद्धिशाली बनाना होगा. आवश्यकतानुसार कर्मठ सेवक तब तक तैयार नहीं हो सकते, जब तक बचपन को श्रेष्ठ संस्कारयुक्त न बनाया जाये. बच्चों में व्यक्तित्व व आध्यात्मिक पाठों की छाप अवश्य मिलेगी. कोई व्यक्ति अच्छा काम करता है, तो कहा जाता है कि ये संस्कार तो इसे घुट्टी की तरह घोल कर पिलाये गये हैं. वास्तव में घुट्टी तो तरल है, उसमें सूक्ष्म संस्कारों का घुलन कैसे हो सकता है. इसका भावार्थ यही होता है कि जब इसके घुट्टी पीने के दिन थे, तब से अर्थात बचपन से ही उसे यह बात सिखायी गयी थी.

बचपन का महत्व कई कारणों से अधिक है जैसे बच्चों में अधिक स्मरण शक्ति का होना एवं सुनी हुई बात को ज्यों का त्यों दुहराने में सक्षम होना. उनकी इस स्मृति शक्ति को आध्यात्मिक ज्ञान-स्मरण और गुण-स्मरण की ओर मोड़ा जाना चाहिए. इसी प्रकार उनमें सीखने और अनुकरण करने का अदम्य उत्साह और लगन होती है. अपने से बड़े को वे स्वाभाविक आदर्श के रूप में देखते हैं. जब उन्हें कहा जाता है कि अमुक व्यक्ति आपका बड़ा है, उसे नमस्ते करो या पांव छुओ, तो वे उम्र में बड़े हर व्यक्ति को अनुकरणीय मान लेते हैं. उनकी इस अनुकरण की प्रवृत्ति को सकारात्मक रुख देने के लिए उनके सामने स्वयं आदर्श बन कर रहना और आदर्श लोगों के जीवन चरित्र का ज्ञान प्रत्यक्ष करना अति अनिवार्य है. इतिहास पढ़ कर हमें बाल्यकाल की शिक्षा द्वारा महान चरित्रों के गढ़े जाने की जानकारी मिलती है. कुछ दिन पहले उच्चाधिकारी ने अपने बचपन का अनुभव स्मरण करते हुए बताया कि जब मैं आठ-दस साल का था, तब एक दिन विद्यालय से लौटते समय किसी के घर में सफेद वस्त्रों वाली ब्रह्माकुमारी बहनें इस बात पर समझा रही थीं और अन्य नैतिक बातें भी विस्तार से सुना रही थीं. उस समय बस्ता पीठ पर लिए-लिए मैंने दीवार से चिपक कर जो कुछ सुना वह आज भी मेरे जेहन में ज्यों का त्यों है. उस क्षण भर के सत्य ज्ञान ने मुझे जीवन में बुराईयों से भी बचाया. ईश्वर की खोज के लिए उकसाया और वही प्रेरणा के रूप में मुझे पवित्र जीवन की ओर खींच कर ले आया. बड़े होने पर भी मैंने हजारों अच्छी बातें सुनी होंगी, पर उस घड़ी की शिक्षा आज तक अपना अमिट प्रभाव बनायी हुई है.

ऐसे में अभिभावकों का यह कर्तव्य है कि वे बच्चों के खान-पान, शिक्षा, स्वास्थ्य, खेलकूद, लाड़-प्यार पर जो ध्यान रखते हैं, उसके साथ-साथ उनमें नैतिकता में वृद्धि का भी ध्यान रखें. सरकार इस बात की तरफ ध्यान दें कि हर सरकारी या गैर सरकारी शिक्षा संस्थान में नैतिक और आध्यात्मिक शिक्षा को हर विषय के साथ जोड़कर और अलग विषय के रूप में अवश्य पढ़ाया जाये, तभी आनेवाली पीढ़ी उत्तरदायी और चरित्रवान बन सकेगी.