maati k rang

  • Mar 16 2020 4:33PM

यशोदा के पारंपरिक गहने बन रहे फैशन

यशोदा के पारंपरिक गहने बन रहे फैशन

पवन कुमार
जिला : खूंटी

घर में सबसे छोटी थी, तो पिताजी से ज्यादा प्यार मिलता था. इसलिए जब भी पिताजी गहना बनाते थे, मैं उनके पास बैठकर काम देखती थी और उनके काम में मदद किया करती थी. इसलिए काम सीख गयी. उस समय नहीं पता था कि यह सीख मुझे भविष्य में एक अलग पहचान देगी. बुरे वक्त में मेरे काम आयेगी. इसलिए आज मैं कह सकती हूं कि हाथ का हुनर कभी बेकार नहीं जाता है. इतना बताने के बाद यशोदा देवी अतीत के पन्नों में खो जाती हैं. जीने की लालसा, आत्मविश्वास, संघर्ष और कुछ बेहतर करने की जिद का नाम है यशोदा देवी. यशोदा खूंटी जिले के मुरहू गांव में रहती हैं.

बचपन की सीख काम आयी
हुनर कभी बेकार नहीं जाता है. यशोदा ने इस बात को साबित कर दिया क्योंकि अगर उन्हें अपने पिता से आदिवासियों के गहने बनाने की कला की शिक्षा नहीं मिलती तो आज यशोदा कहीं प्राइवेट नौकरी कर रही होतीं या फिर मजदूरी कर रही होतीं, लेकिन उस कला की ही ताकत थी कि आज अपने साथ छह महिलाओं को रोजगार भी दे रही हैं. यशोदा के साथ छह और महिलाएं गहना बनाने का काम करती हैं. इससे महिलाओं को सालाना 35 से 40 हजार रुपये की आमदनी होती है. आमदनी होने पर सभी महिलाओं की जिंदगी में सुधार आया है और वो आर्थिक तौर पर सशक्त हो रही हैं.

10 साल तक किया संघर्ष
यशोदा अपने बुरे दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि उस वक्त अपना काम शुरू करने के लिए उन्होंने अपने गहने बेचकर पूंजी जमा की. इसके बाद उस पैसे से आदिवासी महिलाओं के लिए पारंपरिक गहना बनाना शुरू किया. पहले स्थानीय बाजारों में झोले में भरकर गहना ले जाती थीं और उसे बेचती थीं. खुद के पास दुकान खोलने के लिए जगह और पूंजी दोनों ही नहीं थी. इसलिए बाजार में जाकर गहना बेचती थीं. धीरे-धीरे उनके बनाये गहनों को लोग खूब पसंद करने लगे. गांव की महिलाओं ने भी पूरा साथ दिया. इसके बाद उन्हें बड़े पैमाने पर लगने वाले मेले की जानकारी मिली. पहली बार दिल्ली में आयोजित सरस मेला में दुकान लगाने का मौका मिला. इसके बाद यशोदा ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. आज देश के कई राज्यों में उनके बनाये गहने को खूब पसंद किया जाता है. मुरहू में उनकी अपनी दुकान है. इस कार्य में पति का भी पूरा सहयोग मिलता है.

ये गहने बनाती हैं यशोदा
हाथ के लिए : ठेला, पहुंची, बोंगरी, खसिया
पैर के लिए : पैरी
गला के लिए : हंसली, मतली, सीताहार
नाक के लिए : मकड़ी, चांद छूछी, रावा छूछी
कान के लिए : तरपत, चोंगा, भाला
कमर के लिए : कमरखोंसनी

आपका हुनर कभी आपको हारने नहीं देगा : यशोदा देवी
विपरीत परिस्थितियों से लड़कर आगे बढ़ीं यशोदा कहती हैं कि जिंदगी में काफी संघर्ष के बाद आज वो यहां तक पहुंची हैं. आज बड़े नेता और अधिकारी उनके पास आते हैं. गहना खरीद कर ले जाते हैं. यह मेरे हुनर का ही कमाल है. हुनर के दम पर मैंने यह उपल्बधि हासिल की है. मुरहू आजीविका ग्राम संगठन की अध्यक्ष यशोदा कहती हैं कि आपका हुनर कभी आपको हारने नहीं देता है. वो फिलहाल पिताजी के घर में रहती हैं, लेकिन अपनी जमीन खरीद कर घर बना रही हैं. अपनी बेटी को अच्छे स्कूल में पढ़ा रही हैं. वो कहती हैं कि उनकी सफलता के पीछे उनके हुनर और गांव की महिलाओं का काफी योगदान है.