maati k rang

  • Nov 8 2019 6:44PM

अखरा कर कोना से भाषा और संस्कृति बचाने में जुटे नंदलाल

अखरा कर कोना से भाषा और संस्कृति बचाने में जुटे नंदलाल

अरबिंद कुमार मिश्रा

रांची के चुटिया इलाके में कला-संस्‍कृति की पौधशाला खुद--खुद तैयार होती है. यहां की मिट्टी ने कई कलाकार दिये हैं, जिन्होंने न केवल अपने राज्‍य का नाम रौशन किया है, बल्कि विदेशों में भी अपनी धमक दिखायी है. इसी मिट्टी में जन्‍मे पद्मश्री मुकुंद नायक आज एक विशाल वट वृक्ष हैं, जिनकी छांव में कला-संस्‍कृति मजबूती के साथ फलफूल रही है. मनपूरन नायक व देवदास विश्वकर्मा जैसे कलाकार इसी मिट्टी से जुड़े हैं. अब इस कड़ी में एक और नाम नंदलाल नायक के रूप में जुड़ गया है. इनकी पहचान एक अंतरराष्‍ट्रीय कलाकार के रूप में है. अपने पिता मुकुंद नायक की विरासत को ये आगे बढ़ा रहे हैं. नंदलाल ने अपनी पहचान ढोल वादक, उभरते हुए म्‍यूजिक डायरेक्‍टर व फिल्‍म डायरेक्‍टर के रूप में बनायी है.

पिता की गोद में संगीत की ली तालिम
नंदलाल ने गोस्‍नर कॉलेज से पढ़ाई की है, लेकिन सांस्‍कृतिक शिक्षा इन्हें घर पर ही मिली. पिता मुकुंद नायक के मार्गदर्शन में संगीत की प्राथमिक शिक्षा ली. इन्हें बड़े कलाकारों की गोद में खेलने का मौका मिला.

मधु मंसूरी के गीत ने किया आंदोलित
जब अपनी भाषा और संस्‍कृति को लेकर लोगों के दिलों में आग धधक रही थी. झारखंड अलग राज्‍य और अपनी पहचान को लेकर लोग आंदोलित थे. जल-जंगल-जमीन की बात हो रही थी. वैसे में कई गीत और कविताओं ने आंदोलन में जान फूंकने का काम किया. उस समय मधु मंसूरी का एक गीत काफी प्रसिद्ध था, 'धइन जनम पाला रे झारखंडिया, रीझ रंग में धधाय गेला नवरंगिया.' इस गीत ने नंदलाल नायक को काफी प्रभावित किया. एक ओर पिता मुकुंद नायक के शृंगार रस के गीतों ने उन्हें प्रभावित किया, वहीं मधु मंसूरी के इस गीत ने अंदर तक उन्हें झकझोर कर रख दिया. कम उम्र से ही वे इस गाने को चिल्‍ला-चिल्‍ला कर गाया करते थे 'रीझ रंग में धधाय गेला नवरंगिया मन, धइन जनम पाला रे झारखंडिया मन. हक मांगेक ले तक तोके लाज लागेला, सिंया भुइयां के लुइट होबैं....'

छोटी उम्र में ही बने अंतरराष्‍ट्रीय बाल कलाकार
नंदलाल नायक ने बताया कि 80-90 के दशक में पिताजी का विदेश दौरा शुरू हुआ. उस समय उन्हें भी विदेश जाने का मौका मिला. उस समय तक वह नागपुरी गीत-संगीत में रम चुके थे. छोटी उम्र में ही अंतरराष्‍ट्रीय बाल कलाकार बनने का सौभाग्‍य मिला. पिता की टीम में मधु मंसूरी हंसमुख (कका) व रामदयाल मुंडा जैसे प्रसिद्ध कलाकार थे. एक नर्तक, वादक व गायक के रूप में उनके साथ विदेश जाने का मौका मिला. इनकी पहली विदेश यात्रा ताइवान की थी.

विदेश यात्रा ने बदला नजरिया
नंदलाल नायक ने बताया कि विदेश यात्रा ने दुनिया को देखने का नजरिया ही बदल दिया. 1994 में फॉड स्कॉलर बनकर अमेरिका जाने का मौका मिला. इससे पहले 1973 में डॉ रामदयाल मुंडा फॉड स्कॉलर थे. अमेरिका में रह कर नंदलाल ने अपनी भाषा-संस्‍कृति पर लंबे समय तक काम किया. इस बीच बेनेटोन में एक ऐसा कार्यक्रम हुआ था, जिसमें 60-62 देश के लोग जुटे थे. उस कार्यक्रम में वाद्ययंत्र बजाने का मौका मिला. इसी कार्यक्रम ने उन्हें रातों-रात स्‍टार बना दिया. उनके प्रदर्शन से लोग इतना प्रभावित हुए कि उन्‍हें दो साल के लिए कॉन्‍ट्रैक्‍ट पर साइन कराया और एक करोड़ रुपये दिये. उन्‍हें इस दौरान अमेरिका छोड़ इटली जाना पड़ा. नंदलाल नायक 18 वर्षों तक विदेश में रहते हुए संयुक्त राज्य अमेरिका, जापान, घाना, जर्मनी, इटली, ऑस्ट्रिया के संगीतकारों और फिल्म निर्माताओं के साथ अपनी भाषा-संस्‍कृति को लेकर विमर्श करते रहे.

घांसी बाजा पर रिसर्च और फिल्‍म धुमकुड़िया का ख्‍याल
नंदलाल नायक अमेरिका से वापस रांची एक रिसर्च के सिलसिले में आये. अमेरिकन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया स्‍टडी से उन्‍हें घांसी बाजा पर फेलोशिप दिया गया. फेलोशिप के काम से जब वो गोइलकेरा गांव पहुंचे, तो एक 16 साल की बच्‍ची ने उनके जीवन में नया बदलाव ला दिया. गांव की एक बच्ची का 20 से 25 बार बेचा जाना, दुष्कर्म करना और फिर उसकी हत्या कर देना. इस घटना ने उन्हें अंदर से हिला कर रख दिया. दो साल बाद अमेरिका से वापस आने और उस बच्ची के नहीं रहने की जानकारी मिलने पर काफी दु:खी हुआ. उसी बच्ची की कहानी ने उन्‍हें फिल्‍म धुमकुड़िया बनाने के लिए प्ररित किया. इसमें ट्रैफिकिंग के दंश को दिखाने का प्रयास किया गया है.

हॉलीवुड-बॉलीवुड फिल्मों में दे चुके हैं संगीत
नंदलाल नायक अंग्रेजी फिल्‍मों के साथ-साथ कई बॉलीवुड फिल्‍मों में प्‍यूजिक दे चुके हैं. 2005 में बनी हिंदी फिल्‍म एमू में म्‍यूजिक दिया है, जिसे नेशनल अवॉर्ड मिला. 2009 में नागपुरी फिल्‍म बाहा में म्‍य‍ूजिक दिया और गाने भी गये. 2018 में बनी नागपुरी फिल्‍म लोहरदगा में म्‍यूजिक दिया और गाने गाये तथा 2019 में बनी नागपुरी फिल्‍म फुलमनिया में म्‍यूजिक दिया. इस फिल्‍म को काफी पसंद किया गया.

अखरा को लिया गोद
नंदलाल नायक यहां की भाषा-संस्‍कृति को बचाने को लेकर प्रयासरत हैं. अपने पिता के नाम पर एक फाउंडेशन बनाया है. इसी के तहत उन्‍होंने 25 अखरा को गोद लिया है. इस अभियान का नाम 'अखरा कर कोना' है. नंदलाल कहते हैं कि आज हमारी संस्‍कृति संकट के दौर से गुजर रही है. यहां आधुनिक गीत-संगीत तेजी से अपना पांव पसार रहे हैं. लोग अपने पारंपरिक गीत-संगीत को भूलते जा रहे हैं. इसी दिशा में एक प्रयास है अखरा कर कोना. उन्होंने कहा कि डॉ रामदयाल मुंडा हमेशा कहा करते थे कि 'जे नाची से बांची'. मैं इसमें एक लाइन जोड़ना चाहता हूं कि जब तक नचाने वाले नहीं बचेंगे, तो नाचेगा कौन. इसलिए उनका प्रयास है कि अखरा को फिर से गुलजार किया जाये.