maati k rang

  • Nov 28 2019 4:54PM

विरासत में मिले पारंपरिक झूमर संगीत को आगे बढ़ा रहीं दीपा

विरासत में मिले पारंपरिक झूमर संगीत को आगे बढ़ा रहीं दीपा

शचिंद्र कुमार दाश
जिला: सरायकेला-खरसावां 

पश्चिमी संस्कृति के कारण भले ही भारतीय संगीत की लय, ताल और सुर में बदलाव आया हो, लेकिन गांव व कस्बों के कलाकार आज भी विरासत में मिले पारंपरिक गीत-संगीत को बचाने का हर मुमकिन प्रयास कर रहे हैं. ऐसा ही एक नाम हैं सरायकेला-खरसावां जिले के उदालखाम की रहनेवाली लोक कलाकार दीपा कुमारी. 18 साल की दीपा विरासत में मिले झूमर संगीत को आगे बढ़ाने में लगी हुई हैं. दीदी गे झूमर नाचे मना ना करिहा..., श्रावन भादर मासे, रीमी-झीमी पानी खसे..., सुन गे बाबूर मांय, चार भुजन आने जाये... आज भी ये कुरमाली झूमर कोल्हान के हर झूमर प्रेमियों की जुबां पर है. दीपा के इस गीत को सुनने के लिए आज भी संगीतप्रेमी आतुर रहते हैं. झूमर के प्रति अटूट लगाव के कारण ही वर्ष 2019 में प्रभात खबर की ओर से चाईबासा में आयोजित अपराजिता सम्मान समारोह में उभरते लोक गायक के रूप में दीपा कुमारी को सम्मानित भी किया गया था

विरासत में मिली झूमर कला
शिवा लोककला झूमर समिति से जुड़ीं दीपा मर्यादाओं में रह कर अब तक झारखंड, ओड़िशा, पश्चिम बंगाल, दिल्ली, हरियाणा व छत्तीसगढ़ के विभिन्न शहरों में तीन सौ से अधिक स्टेज प्रोग्राम पेश कर चुकी हैं. कुरमाली झूमर गाने के साथ-साथ साथी कलाकारों के साथ नृत्य भी करती हैं. फिलहाल वह स्नातक की पढ़ाई भी कर रही हैं. दीपा को यह कला करीब 12 साल की उम्र में अपने पिता झूमर सम्राट संतोष महतो और बड़े भाई सुदांशु महतो से मिली है. दीपा के दादा कृष्णा महतो भी झूमर कलाकार थे. दीपा बताती हैं कि उनके पिता संतोष महतो झारखंड के नामी झूमर लोक कलाकार हैं. उन्होंने हमेशा दीपा को आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया.

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झूमर अकादमी व प्रशिक्षण की व्यवस्था हो
झूमर को विशुद्ध रूप से लोकगीत बताने वाली दीपा का मानना है कि झूमर संगीत जीवन के उतार-चढ़ाव का आईना है. इसमें जीवन का हर रंग समाहित है. दीपा की इच्छा है कि झूमर की सतरंगी छटा विदेशों तक पहुंचे. इस नृत्य कला को सरकारी संरक्षण मिले और आनेवाली पीढ़ी के लिए झूमर अकादमी की स्थापना कर प्रशिक्षण की व्यवस्था हो.

जमीनी कलाकारों को मिलती है काफी इज्जत : दीपा कुमारी
दीपा ने बताया कि प्रभात खबर ने अपराजिता सम्मान देकर उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया. इस कला से जुड़े लोग शोहरत की बुलंदियों तक भले ही नहीं पहुंच सके हों, परंतु इस लोककला से जुड़े जमीनी कलाकारों को काफी इज्जत मिलती है. दीपा का मानना है कि मेहनत व परिश्रम के बल पर ही खेतों की मेड़ से निकला यह रास्ता एक दिन विश्व के रंगमंच तक जरूर पहुंचेगा. आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं है. इसके बावजूद विरासत में मिली इस कला को सहेजने का कार्य कर रही हैं. झूमर संगीत को बुलंदियों तक ले जाने की तमन्ना है.