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  • Nov 28 2019 5:06PM

खेती कर रामदास ने अपने बेटे को बनाया इंजीनियर

खेती कर रामदास ने अपने बेटे को बनाया इंजीनियर

 पवन कुमार

ग्राम: आरा-केरम

प्रखंड: ओरमांझी
जिला: रांची 

रांची जिले के ओरमांझी प्रखंड के आदर्श ग्राम आरा-केरम के किसान रामदास महतो एक मिसाल हैं. उन्होंने खेती-किसानी करते हुए पिछले 30 सालों में बहुत कुछ हासिल किया है. अपनी मेहनत और आत्मविश्वास से न सिर्फ अपने संघर्षपूर्ण जीवन को आरामदायक बनाया, बल्कि अपने बेटे को इंजीनियर भी बनाया है. आज इलाके में इनकी अपनी पहचान है. ये सब कुछ इतनी आसानी से नहीं हुआ है. आदर्श ग्राम के किसान रामदास महतो को इसके लिए काफी मेहनत करनी पड़ी है. उनकी मेहनत रंग लायी. रामदास महतो ने भले ही पारिवारिक कारणों से मात्र पांच कक्षा तक ही पढ़ाई की है, लेकिन अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति वह हमेशा सजग रहे हैं. यही कारण है कि आज उनका बड़ा बेटा इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरा कर चुका है, वहीं एक बेटी बीआइटी से पॉलिटेक्निक कर रही है. एक बेटी बीएड और सबसे छोटा बेटा आइएससी की पढ़ाई कर रहा है.

पहले मजदूरी कर घर चलाना था मुश्किल
आज से करीब 30 साल पहले रामदास महतो ने खेती-बारी की शुरुआत की थी. खेती-बारी करने से पहले वो दैनिक मजदूर थे. रोज मजदूरी करते थे, तब जाकर परिवार को भोजन नसीब होता था, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते चले गये, घर का खर्च बढ़ता चला गया. इसके बाद परिवार चलाना व बच्चों की पढ़ाई करने को लेकर पैसों की कमी होने लगी. पैसों की कमी के कारण बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होने लगी, जिससे रामदास काफी चिंतित रहने लगे. इसी दौरान गांव के ही कुछ लोगों ने उन्हें खेती-बारी करने की सलाह दी. इसके बाद रामदास ने खेती-बारी करने की ठानी और करीब 30 साल पहले टमाटर और खीरा लगाने के साथ खेती की शुरुआत की. उस समय खेती से नफा-नुकसान का अनुमान नहीं लगा पा रहे थे, लेकिन किसी तरह घर का खर्चा चल जा रहा था. धीरे-धीरे खेती-बारी की बारीकियों को समझने लगे और फिर मौसम के हिसाब से खेती करना शुरू किया. इसका फायदा हुआ और आमदनी भी होने लगी.

खेती-बारी से मिली राहत
खेती-बारी से जुड़ने के बाद रामदास की आर्थिक स्थिति में कुछ सुधार होने लगा और बच्चों की पढ़ाई-लिखायी में भी थोड़ी राहत मिलने लगी. मौसम के हिसाब से वह टमाटर, खीरा, प्याज, फरसबीन, धनिया पत्ता और शिमला मिर्च की खेती करने लगे. सब्जियों की बिक्री के लिए ओरमांझी बाजार और रांची नजदीक है. वहां जाकर वो अपनी सब्जियां बेचने लगे. खेती-बारी से थोड़ा लाभ हुआ, तो उन्होंने एक गाय खरीद लिया. गाय के दूध से आमदनी बढ़ी और जिंदगी पटरी पर लौटने लगी.

उत्तर प्रदेश जाकर बहुत कुछ सीखा
साल 2014 में रामदास को एक एनजीओ के माध्यम से आधुनिक खेती-बारी की तकनीक सीखने के लिए उत्तर प्रदेश के कुछ गांवों में जाने का मौका मिला. रामदास कहते हैं कि वहां जाकर पहली बार यह लगा कि खेती भी इतनी अच्छी तरह से हो सकती है. अगर बेहतर तकनीक का इस्तेमाल किया जाये, तो खेती-किसानी में काफी फायदा है. यहां आधुनिक तकनीक से टमाटर की खेती के अलावा खीरा, शिमला मिर्च और फूलगोभी की खेती करने के तरीकों को देखा और सीखा. भ्रमण के दौरान बताया गया कि मात्र 15 डिसमिल जमीन में लगे पॉली हाउस में खेती से बंपर उत्पादन हो रहा है. एक टमाटर के पौधे से पैंसठ किलो टमाटर की उपज होती है. इस दौरान ड्रीप एरिगेशन की भी जानकारी मिली.

उन्नत तकनीक से खेती पर जोर, हुआ फायदा
उत्तर प्रदेश भ्रमण के दौरान उन्नत तकनीक से खेती-बारी की बारीकियों को समझने के बाद रामदास जब गांव आये, तो उन्होंने अपने खेतों में भी इसे आजमाया. उन्होंने 25 डिसमिल जमीन में शिमला मिर्च की खेती की, इससे उन्हें 15 हजार रुपये का मुनाफा हुआ. इसके बाद दोबारा 25 डिसमिल में शिमला मिर्च की खेती की और इस बार रामदास को 20 हजार रुपये का मुनाफा हुआ है. इसी बीच जनवरी 2017 में खीरे की खेती में रामदास को 12 हजार रुपये का नुकसान हुआ, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपने खेत में ड्रीप एरिगेशन तकनीक अपनाया. इसके लिए खुद से 15 हजार रुपये खर्च किये और मोटर, पाइप आदि समानों की खरीदारी की. पहली बार ड्रीप एरिगेशन से फायदा नहीं हुआ और फसल भी बर्बाद हो गयी. फसल बर्बाद होने पर उनकी खामियों को जाना और फिर से सितंबर महीने में रामदास ने 65 डिसमिल जमीन में शिमला मिर्च की खेती की. फसल लगाने के बाद अब तक शिमला मिर्च बेच कर वो खर्च काट कर दो लाख रुपये की कमायी कर चुके हैं. करीब 50 रुपये प्रति किलो की दर से उन्होंने शिमला मिर्च की बिक्री की है. अभी भी खेतों में काफी फसल लगी है. इन फसलों से रामदास को प्रति सप्ताह 10 हजार रुपये मिलने का अनुमान है. उन्होंने पांच डिसमिल जमीन में टमाटर लगाया और इससे करीब 20 हजार रुपये की आमदनी हुई. रामदास के मुताबिक, उन्होंने टमाटर के एक पौधे से लगभग 30 किलो टमाटर प्राप्त किया है. शिमला मिर्च की खेती के बाद अब रामदास की योजना अपने खेतों में तरबूज लगाने की है, क्योंकि इससे भी अच्छा मुनाफा होता है.

खुद कम पढ़े, लेकिन जानते हैं शिक्षा का महत्व
भले ही रामदास ने पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई की है, लेकिन वह शिक्षा का महत्व जानते हैं. उन्होंने बच्चों को शिक्षा का माहौल दिया. शिक्षा के प्रति सजग रहनेवाले रामदास ने अपने बच्चों की पढ़ाई में कभी कोई कोताही नहीं बरती. सबको बहेतर शिक्षा देने की कोशिश की है.

खेती-बारी से पटरी पर लौटी जिंदगी
30
सालों की मेहनत के बाद अब रामदास की जिंदगी पटरी पर लौट आयी है. रामदास ने खेती-बारी करते हुए खुद का पक्का मकान भी बनाया है. गाय भी खरीद ली है और घर में खुशहाली है. पहले जमीन कम होने के कारण खेती-बारी करने में दिक्कत होती थी, पर रामदास ने एक एकड़ जमीन भी खरीद ली है. उनके पास एक बाइक भी है. इतना सब कुछ रामदास ने सिर्फ खेती-बारी के जरिये ही किया है. सरकारी सुविधा के नाम पर किसान क्रेडिट कार्ड मिला है. मनरेगा योजना के तहत एक कुआं मिला है, हालांकि फसल बर्बाद होने पर भी आज तक फसल बीमा का लाभ रामदास को नहीं मिला है. वह अपने खेतों में रासायनिक खाद की बजाय जैविक खाद का उपयोग करते हैं और उसका लाभ भी उन्हें मिल रहा है.

खेती-किसानी से भी आप पा सकते हैं मुकाम : रामदास महतो
सरकारी योजनाएं समेत कई अन्य मुद्दों पर स्पष्ट राय रखनेवाले रामदास महतो कहते हैं कि खेती करना उनके लिए फायदेमंद रहा. उन्नत तकनीक से खेती करके किसान खुशहाल हो सकते हैं. उनकी गरीबी खत्म हो सकती है, हालांकि खेती-बारी करने के दौरान कठिनाइयों भी आती हैं, लेकिन उसका सामना करने के लिए तैयार भी रहना पड़ता है. कहते हैं कि अगर कभी आपको नुकसान हुआ, तो यह कभी नहीं सोचें कि सब कुछ खत्म हो गया. आप अपनी कमियों को जानें और उन कमियों को दूर कर फिर से खेती-बारी में जुट जायें. मुनाफा जरूर होगा. हां, खेती-बारी के लिए मौसम को समझना बेहद जरूरी है. मौसम से ही बाजार तय होता है और सब्जियों के दाम मिलते हैं. खेती-बारी में मुनाफा कमाने के लिए मौसम के अनुसार मेहनत भी करनी पड़ती है, तब जाकर आप मुकाम पा सकते हैं.