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  • Feb 5 2020 4:48PM

टपक सिंचाई से किसानों की बढ़ी उपज व कमाई

टपक सिंचाई से किसानों की बढ़ी उपज व कमाई
टपक सिंचाई से तैयार हो रही फसल.

आजीविका डेस्क

जिला: लोहरदगा 

लोहरदगा जिला अंतर्गत कुड़ू प्रखंड के नवाटोली गांव की 49 वर्षीया एम्लेन बागे को खेती-किसानी के बारे में कुछ भी पता नहीं था, लेकिन साल 2017 में झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी (ग्रामीण विकास विभाग ) द्वारा क्रियान्वित की जा रही झारखंड टपक सिंचाई परियोजना से जुड़ कर उन्होंने कृषि कार्य शुरू किया और आज एक सफल महिला किसान के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं.

क्या है टपक सिंचाई परियोजना

झारखंड में कृषि विविधिकरण के साथ-साथ किसानों को पर्याप्त मुनाफा हो सके, इसके लिए कई सरकारी योजनाएं चलायी जा रही हैं. जापान अंतरराष्ट्रीय सहयोग एजेंसी (जाइका) द्वारा वित्त पोषित टपक सिंचाई परियोजना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है, जिसे जेएसएलपीएस द्वारा राज्य के नौ जिलों में लागू किया जा रहा है. इसके तहत सखी मंडल से जुड़े 30 हजार किसान परिवारों को सहायता पहुंचाने का लक्ष्य है. इसके जरिये महिला किसानों को एमडीआइ (माइक्रो ड्रिप इरिगेशन) किट, पॉली नर्सरी हाउस और वर्मी कंपोस्ट यूनिट मुहैया करवाई जाती है, ताकि उनकी सिंचाई और उर्वरक संबंधी सभी जरूरतें आसानी से पूरी हो सकें. इसके साथ ही, बागवानी और उत्पाद की मार्केटिंग पर गहन प्रशिक्षण का भी प्रावधान है. कृषि और बागवानी विकास के साथ-साथ गरीबी उन्मूलन और महिला सशक्तीकरण इस प्रोजेक्ट के मुख्य उद्देश्य हैं. इस परियोजना की मदद से मुख्य बागवानी फसलों के औसत उत्पादन और हर परिवार के सालाना औसत आय के दोगुना होने का अनुमान है.

सखी मंडल से मिली मजबूती

एम्लेन का जीवन संघर्ष भरा रहा है. साल 2006 में अपने पति की असमय मृत्यु से वे बिल्कुल बेसहारा हो गयी थीं. हालांकि उनके पास एक छोटी सी स्टेशनरी की दुकान थी, लेकिन आमदनी न के बराबर थी और उनके परिवार का जैसे-तैसे गुजारा हो रहा था. फिर वे 2013 में मुक्ति महिला मंडल से जुड़ीं और 2013-2016 तक सक्रिय महिला के तौर पर भी कार्य करती रहीं. इसके बाद वे साल 2018 में नारी किसान उत्पादक समूह से जुड़ीं और इसके सक्रिय महिला के रूप में कार्य कर रही हैं. इसी बीच उन्होंने साल 2015 में 20 हजार रुपये का लोन लेकर अपनी दुकान बढ़ाई और स्टेशनरी आइटम के साथ-साथ शृंगार-प्रसाधन सामग्रियां बेचना शुरू किया, जिससे उनकी आमदनी में इजाफा हुआ. दुकान से वे हर महीने पांच-छह हजार रुपये तक कमा लेती हैं और अपना लोन भी वापस कर चुकी हैं.

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कृषि में आजमाया हाथ, मिली बड़ी सफलता

एम्लेन की दुकान पहले की तुलना में अच्छी चल रही थी, लेकिन परिवार के लिए यह आमदनी पर्याप्त नहीं थी. इसी दौरान उन्हें अपने सखी मंडल के माध्यम से टपक सिंचाई परियोजना के बारे में जानकारी मिली, हालांकि उनके पास खेती के लिए अपनी जमीन तक नहीं थी, लेकिन जेएसएलपीएस द्वारा लागू किये जा रहे इस प्रोजेक्ट से वे इतनी प्रभावित हुईं कि उन्होंने 70 डिसमिल जमीन किराये पर लेकर दिसंबर 2017 से सब्जी की खेती शुरू की. प्रति फसल दो हजार रुपये किराया के रूप में देती हैं. पहली फसल के रूप में उन्होंने टमाटर की खेती की, जिसमें उन्हें अच्छा मुनाफा हुआ. इससे उत्साहित होकर उन्होंने दूसरी फसल के तौर पर तरबूज की खेती की, जिसमें उन्हें टमाटर के मुकाबले ज्यादा लाभ हुआ. उन्होंने करेला और मटर की भी खेती की और अच्छा मुनाफा कमाया.

एम्लेन बागे की कृषि से कमाई : (मार्च 2018-जनवरी 2020 तक)

फसल                  कुल लागत (रुपये में)              शुद्ध मुनाफा (रुपये में)

टमाटर                       5,500                                17,000

तरबूज                        7,500                                32,000

मटर                           1,200                               14,000

आजीविका ने जीने की राह दिखायी : एम्लेन

एम्लेन बताती हैं कि खेती के लिहाज से बिल्कुल नौसिखिया थी, लेकिन इस परियोजना के तहत वर्मी शेड व नर्सरी घर मुहैया हुआ. इस दौरान कृषि संबंधी काफी जानकारी भी मिली. इससे बेहतर ढंग से खेती होने लगी. एकेएम दीदी से भी समय-समय पर फसल चयन से लेकर कृषि तकनीक के बारे में जरूरी सलाह मिलती रही. उचित सलाह व उन्नत तकनीकों के सहारे उपज में बढ़ोतरी हुई. इससे मुनाफा भी बढ़ा. इससे दो साल के अंदर एम्लेन की आर्थिक स्थिति में सुधार आना शुरू हो गया. इसके लिए जेएसएलपीएस के प्रति आभार जताते हुए कहती हैं कि आजीविका ने उसे एक पहचान दी. आज उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई कर पा रहे हैं. वर्तमान में एक अन्य महिला के साथ मिल कर उन्होंने मशरूम की खेती शुरू की है.

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महिला किसानों को मिल रहा लाभ

2017 में शुरू की गयी टपक सिंचाई परियोजना से जुड़े किसानों की संख्या में दिन--दिन वृद्धि हो रही है. वर्तमान में कुड़ू प्रखंड क्षेत्र के कुल 363 किसानों को पंजीकृत किया गया है. इनमें से अब तक 144 किसानों को एमडीआइ किट, 3500 पौधों की क्षमता वाला पॉली नर्सरी शेड और वर्मी कंपोस्ट यूनिट मुहैया करवाया जा चुका है. इससे एक तरफ जहां किसानों की उपज में बढ़ोतरी हुई है, वहीं उनकी आमदनी भी काफी बढ़ी है.

माइक्रो ड्रिप से उपज व मुनाफा दोनों में बढ़ोतरी : फूलमनी आइंद

नवाटोली गांव की महिला किसान फूलमनी आइंद को इस परियोजना से काफी लाभ मिला है. उनके पास लगभग 50 डिसमिल खेती योग्य जमीन है, जिस पर वे माइक्रो ड्रिप के तहत खेती कर रही हैं. पिछले दो साल में वे टमाटर, मिर्च, तरबूज और लौकी की खेती कर लगभग 65 हजार रुपये कमा चुकी हैं. साथ ही जनवरी 2019 से आजीविका कृषक मित्र के रूप में भी कार्य कर रही हैं. फूलमनी बताती हैं कि माइक्रो ड्रिप का इस्तेमाल कर खेती करने से काफी मुनाफा हुआ है. कहती हैं कि माइक्रो ड्रिप इरिगेशन के बारे में जब किसानों को बताया जाता है, तो पहले उनकी बातों पर वे ध्यान नहीं देते हैं, लेकिन बार-बार बताने पर क्षेत्र के किसानों को भरोसा होने लगा है. अब पंचायत क्षेत्रों में माइक्रो ड्रिप इरिगेशन को अच्छा रिस्पांस मिल रहा है. इससे पानी की काफी बचत होती है और कम मेहनत में अच्छी पैदावार भी होती है.

वर्तमान में पंचायत क्षेत्र में 16 महिला किसानों का पंजीकरण हो चुका है. सात महिला किसान माइक्रो ड्रिप इरिगेशन के इसके माध्यम से खेती कर रही हैं. न सिर्फ इनकी फसलों की उपज बढ़ी है, बल्कि उनकी आमदनी भी बढ़ी है. इस परियोजना की वजह से किसानों का विभिन्न फसलों के प्रति रुझान बढ़ा है. साथ ही पारंपरिक खेती के मुकाबले इस तकनीक से खेती करने में लागत मूल्य कम आता है और जैविक खाद का इस्तेमाल होने से स्वास्थ्य पर भी कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता है. किसान इस परियोजना को लेकर काफी उत्साहित हैं.