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  • Apr 2 2019 5:03PM

वोट कर देश गढ़ रहीं किन्नरों को अपने अस्तित्व के लिए आज भी करनी पड़ रही है जद्दोजहद

वोट कर देश गढ़ रहीं किन्नरों को अपने अस्तित्व के लिए आज भी करनी पड़ रही है जद्दोजहद

गुरुस्वरूप मिश्रा

लोकतंत्र के महापर्व को लेकर झारखंड के 2.21 करोड़ वोटरों में उत्साह है. वोट कर देश गढ़ने में महिला और पुरुष मतदाताओं के साथ-साथ समाज की मुख्यधारा में शामिल होने को लेकर संघर्षरत किन्नर (थर्ड जेंडर/ट्रांसजेंडर) भी बराबर की भूमिका निभाती हैं. वर्षों मशक्कत के बाद आम आदमी की तरह इन्हें थर्ड जेंडर के रूप में वोट देने का अधिकार तो मिल गया, लेकिन देश की आजादी के सात दशक बाद भी सरकारी सुविधाओं से महरूम किन्नरों को आज भी अपने अस्तित्व के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है. लोकसभा चुनाव की सियासी सरगर्मी है

जेंडर बजट के इस दौर में भी थर्ड जेंडर (किन्नर) की सुध लेेनेवाला कोई नहीं है. आम आदमी की भीड़ में भी अकेली हूं. विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपनी अलग दुनिया में रहने को मजबूर हूं. वर्षों के लंबे संघर्ष के बाद वोट देने का अधिकार तो मिल गया, लेकिन अभी भी हमारी दुनिया नहीं बदली. लोकसभा चुनाव है. हमेशा की तरह वोट दूंगी. आज भी एक अदद छत को मोहताज हूं. सरकारी सुविधाओं से कोसों दूर पाबंदी की बेड़ियों में जकड़ी हूं, क्योंकि मैं किन्नर हूं.

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दर्द से सने ये बोल संजना किन्नर के हैं. एक सांस में वह अपनी बिरादरी की व्यथा-कथा सुना जाती हैं. पूर्वी सिंहभूम जिला अंतर्गत जमशेदपुर के टेल्को थाना क्षेत्र स्थित जेमको महानंदा बस्ती में किराये के मकान में रह रहीं संजना दसवीं पास हैं. शुभकामना फाउंडेशन की सचिव हैं. अपने सुमदाय के लोगों को जागरूक कर उनकी आवाज बुलंद कर रही हैं. कहती हैं कि ट्रेन, शादी में नृत्य या खुशी के मौके पर बधाई मांगने की बजाय स्वरोजगार कर सम्मान की जिंदगी जीना चाहती हूं, लेकिन बैंक से लोन भी नहीं मिलता है. लाचार होकर पापी पेट के लिए फिर अपने पेशे में लौट जाती हूं. आम इंसान की तरह उन्हें भी प्रधानमंत्री आवास, राशन व चिकित्सा की सुविधा मयस्सर हो, तो काफी राहत मिलेगी.

रंग देखा, नहीं देखा दर्द
घर में मांगलिक अवसर हों, ट्रेन या सार्वजनिक स्थलों पर ताली बजा कर बख्शीश मांगते किन्नरों को आपने अक्सर देखा होगा, लेकिन उनका दर्द नहीं देखा होगा. अमूमन हेयदृष्टि से देखी जानीवाली किन्नरों के जीवन दर्द पर आप सहसा यकीन नहीं कर पायेंगे. जमशेदपुर स्थित गोलमुरी के टिनप्लेट निवासी अमरजीत सिंह (27 वर्ष) मैट्रिक पास हैं. कहते हैं कि सामाजिक भेदभाव से जीना मुश्किल हो जाता है. आगे पढ़ तक नहीं पाये. तमाम प्रयास के बाद भी उनका वोटर कार्ड तक नहीं बन सका. पहचान का संकट है. चाह कर भी वोट नहीं कर पाते. अब तक कोई सरकारी सुविधा तक नसीब नहीं हुई. काश! हमें भी इंसान समझा जाता.

हुनर है, मौका नहीं मिलता
स्वयं सेवी संस्थाओं के सहयोग से कई किन्नर सिलाई-कढ़ाई समेत अन्य स्वरोजगार कर समाज की मुख्यधारा में शामिल होने की जद्दोजहद कर रही हैं. नौवीं पास गोलमुरी के टिनप्लेट में रहनेवाले आनंद सिंह (21 वर्ष) कहते हैं कि कई ट्रांसजेंडर हुनरमंद हैं, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिलता. कुछ खुशनसीब को अपने परिवार के साथ रहने को मिल जाता है, लेकिन अधिकतर बधाई घर या किराये में रहने को मजबूर रहते हैं. वोटर कार्ड नहीं रहने से वोट भी नहीं कर पाते. सामूहिक रूप से रहने के लिए एक छत और सुरक्षा मिले.

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मुख्यधारा में लाने का प्रयास
एफपीए इंडिया, जमशेदपुर की शाखा प्रबंधक पद्मा कुमारी सुप्रीम कोर्ट के आदेश के आलोक में ट्रांसजेंडरों के कल्याण के लिए वेलफेयर बोर्ड के गठन को अहम बताती हैं. कहती हैं कि ओड़िशा की तरह झारखंड में भी शीघ्र वेलफेयर बोर्ड का गठन हो. किन्नरों के लिए अलग बजट हो, ताकि इन्हें भी सरकारी योजनाओं का लाभ मिल सके. इन्हें संगठित कर, जागरूक करते हुए स्वरोजगार से जोड़ कर मुख्यधारा में लाने का प्रयास कर रही हूं.

झारखंड में 212 किन्नर करेंगी वोट
निर्वाचन आयोग द्वारा एक जनवरी 2019 को जारी अंतिम सूची में ट्रांसजेंडर मतदाताओं की संख्या 307 थी. मतदाता पुनरीक्षण में कई किन्नरों के नाम हट गये. अब इनकी संख्या घट कर 212 रह गयी है. राज्य में सबसे अधिक 53 ट्रांसजेंडर (किन्नर) वोटर पूर्वी सिंहभूम जिले में हैं, जो कुल ट्रांसजेंडर मतदाता का 25 फीसदी है, जबकि रामगढ़, चतरा व खूंटी में एक-एक किन्नर मतदाता हैं. इसके अलावा राज्य के छह जिले पाकुड़, जामताड़ा, देवघर, सिमडेगा, पलामू और गढ़वा में एक भी ट्रांसजेंडर मतदाता नहीं हैं.

भारत में मिला थर्ड जेंडर का दर्जा
सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2014 में लिंग के तीसरे वर्ग के रूप में ट्रांसजेंडर को मान्यता दी है. ट्रांसजेंडरों को शिक्षा एवं स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने के लिए केंद्र एवं राज्यों को निर्देश देते हुए कहा है कि सामाजिक रूप से पिछड़े इस समुदाय को आरक्षण मिले. विशेष दर्जा दिया जाये और बच्चे गोद लेने का अधिकार भी मिले.

बेहतर सियासतदां साबित हुई हैं किन्नर
झारखंड में किन्नरों की संख्या आठ हजार से अधिक है, लेकिन मतदाता सूची में अधिकतर का नाम दर्ज नहीं हो सका है. राज्य की सियासत में इनकी बिरादरी का जनप्रतिनिधि नहीं होने के कारण भी ये उपेक्षित हैं, जबकि देश के दूसरे हिस्से में आम लोग इन्हें वोट देकर विजयी बनाते रहे हैं.
1998
में मध्य प्रदेश के शहडोल जिले की सोहागपुर विधानसभा सीट से शबनम मौसी विधायक बनीं
2003
में जेजेपी अर्थात जीती जिताई पार्टी नाम से किन्नरों का राजनीतिक दल बना
2004
में चित्तौड़गढ़ में ममता बाई निर्दलीय पार्षद बनीं. इनके काम से लोग खुश हुए. 2009 में वह बेगूं की नगरपालिका चेयरमैन बन गयीं. 2013 में एनपीपी के टिकट पर विधायक का चुनाव भी लड़ीं
2005
में शबनम मौसी के नाम से बॉलीवुड में फिल्म भी बनी थी
2012
में चुनाव आयोग ने किया था ट्रांसजेंडर या अन्य वोटर्स के लिए अलग कॉलम का प्रावधान
2015
में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में मधु किन्नर महापौर बनीं

एक नजर इधर भी
लोकसभा चुनाव में झारखंड में महज 212 किन्नर करेंगी वोट
छह साल में झारखंड में 34 फीसदी ट्रांसजेंडर मतदाता बढ़े
2013
में महज नौ वोटर, 2019 में इनकी संख्या थी 307
आज भी बड़ी संख्या में ट्रांसजेंडरों को वोटर बनने का इंतजार है
सुप्रीम कोर्ट से किन्नरों को थर्ड जेंडर का दर्जा अप्रैल 2014 में मिला
किन्नरों के कल्याण के लिए वेलफेयर बोर्ड के गठन का आदेश
ओड़िशा में थर्ड जेंडर वेलफेयर बोर्ड का हो चुका है गठन
झारखंड में अब तक नहीं हुआ थर्ड जेंडर वेलफेयर बोर्ड का गठन