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  • Sep 2 2019 4:40PM

खेलगांव में हरिवंश टानाभगत के नाम से है स्टेडियम, एक शौचालय के लिए भी तरस रहे हैं इनके वंशज

खेलगांव में हरिवंश टानाभगत के नाम से है स्टेडियम, एक शौचालय के लिए भी तरस रहे हैं इनके वंशज

पवन कुमार
प्रखंड: मांडर

जिला: रांची 

हरिवंश टानाभगत का घर कौन है? पूछने पर ग्रामीण इशारा करते हुए बताते हैं कि जो सबसे ऊंचा इमली का पेड़ दिख रहा है, वही हरिवंश टानाभगत का घर है. घर तक पहुंचने के लिए बारिश के मौसम में कीचड़ भरे रास्तों से गुजरना पड़ता है. घर तक पहुंचते हुए जेहन में यह सवाल बार-बार तैरता है कि जिस हरिवंश टानाभगत ने स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ते हुए लाठियां खायीं. उनकी पहचान आज गांववालों की नजर में महज एक इमली पेड़ की ऊंचाई के बराबर रह गयी है.  हां, दुनिया को दिखाने के लिए रांची के खेलगांव में हरिवंश टानाभगत के नाम पर लाखों रुपये का स्टेडियम तो बना दिया गया, लेकिन एनएच 75 के किनारे सड़क चौड़ीकरण की भेंट चढ़ी उनकी प्रतिमा को स्थापित करने के लिए 10 गुना 10 के आकार की जमीन तक नहीं मिल पा रही है. परिवार मुफलिसी में जीवन बीता रहा है. रांची जिला मुख्यालय से लगभग 30 किलोमीटर दूर मांडर प्रखंड अंतर्गत एक गांव है करकरा. गांव की मिट्टी ने हरिवंश टानाभगत जैसे पुत्र को जन्म तो दिया, लेकिन इस गांव को इसके बदले कुछ ज्यादा नहीं मिल सका. हरिवंश टानाभगत के नाम पर इस गांव में सिर्फ उनका परिवार भर है.

गांव में 10 टानाभगत परिवार
करकरा गांव में 10 टानाभगत परिवार रहते हैं, जो हरिवंश टानाभगत और उनके भाइयों के वंशज हैं. हरिवंश टानाभगत छह भाई और दो बहनों में सबसे बड़े थे. उनके तीन बेटे और तीन बेटियां हैं. उनके पिता का नाम भवानी टानाभगत था.

घर तक पहुंचने के लिए नहीं है पक्की सड़क
करकरा गांव में पीसीसी सड़कें हैं, लेकिन हरिवंश टानाभगत के वंशजों के घर तक पहुंचने के लिए नाले के बहते हुए पानी के बीच कीचड़ से गुजर कर जाना पड़ता है. आंगन में बड़ा सा इमली का पेड़ है. इनके सामने वाले घर में देसी शराब बनती है, वहां पीने वालों का तांता लगा रहता है. आंगन के आस-पास सूकर टहलते रहते हैं. एक स्वतंत्रता सेनानी के घर का यह हाल अपने आप में कई सवाल खड़े करता है, क्योंकि इसी आंगन और इमली के पेड़ के नीचे हरिवंश टानाभगत ने अपना पूरा जीवन बिताया था.

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सरकारी योजनाओं का है इंतजार
हरिवंश टानाभगत के पुत्र विश्वनाथ टानाभगत और बहू रेणु गाड़ी आज भी खुले में शौच जाने को मजबूर हैं, क्योंकि उनके घर में शौचालय नहीं है. रेणु गाड़ी के मुताबिक, शौचालय के लिए मुखिया से बार-बार आग्रह के बावजूद उनके घर में शौचालय का निर्माण नहीं कराया गया है. 10 में से अाठ परिवारों के यहां अभी भी शौचालय नहीं है. पांच परिवारों को उज्ज्वला योजना का लाभ मिला है. कच्चा मकान होने के बावजूद प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिला है. वृद्धा पेंशन भी नहीं मिलती है. सिर्फ आश्वासन मिलता है. पूरा परिवार आजीविका के लिए खेती पर निर्भर है. खेती के लिए केसीसी लोन मिला है. उसे चुकाने में भी परेशानी हो रही है

रोजगार की समस्या
हरिवंश टानाभगत के पोते महाबीर भगत ने बताया कि खेती-बारी के अलावा उनके पास रोजगार का कोई साधन नहीं है. परिवार में किसी के पास सरकारी नौकरी नहीं है. वो खुद खेती-बारी के साथ-साथ रांची में मजदूरी करते हैं. विश्वनाथ टानाभगत के दो बेटे और दो बेटियां हैं. चारों ने मैट्रिक तक पढ़ाई की है. बेटियों की शादी हो चुकी है. बेटे नानी घर में रहकर काम करते हैं. उन्होंने बताया कि उनकी पत्नी आंगनबाड़ी सेविका है, जिससे घर चलता है. महाबीर ने बताया कि आर्थिक तंगी के कारण दादा जी की साइकिल को भी कबाड़ी में बेच देना पड़ा.

नियमों का करते हैं पालन
विश्वनाथ टानाभगत बताते हैं कि इतनी समस्या होने के बावजूद वो टानाभगत के नियमों का पूरी तरह पालन करते हैं. हर रोज नहाना और पूजा करना परिवार के सभी सदस्यों की दिनचर्या में शामिल है. वे इतना जरूर कहते हैं कि भूखे पेट भजन नहीं होता है. इसलिए अब नियमों का पालन करने में परेशानी हो रही है. हरिवंश टानाभगत के वंशज के नाम पर समाज में प्रतिष्ठा तो है, लेकिन आर्थिक समस्याएं भी कम नहीं हैं.

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दो अक्तूबर को कैसे होगी पूजा
हरिवंश टानाभगत की एक प्रतिमा उनके घर के कोने में पड़ी है. प्रतिमा जर्जर हो चुकी है. उसे बनाने की जरूरत है. दूसरी प्रतिमा जो एनएच 75 के किनारे स्थापित की गयी थी. वो सड़क चौड़ीकरण की भेंट चढ़ गयी. वह भी दूसरे के घर में रखी हुई है. सड़क के पास जमीन नहीं मिलने के कारण प्रतिमा को दोबारा स्थापित नहीं किया गया है. विश्वनाथ टानाभगत और उनके परिवार को चिंता सता रही है कि दो अक्तूबर को वे हरिवंश टानाभगत की पूजा कैसे करेंगे.

टानाभगत की सूची में नहीं है नाम
विश्वनाथ टानाभगत ने आवेदन पत्र दिखाते हुए कहा कि उनके परिवार का नाम टानाभगत की सूची में नहीं है, जिसके कारण उन्हें लाभ मिलने में परेशानी हो रही है. उन्होंने बताया कि कई बार उन्होंने आवेदन दिया, लेकिन अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई. हरिवंश टानाभगत ने मांडर प्रखंड क्षेत्र में इलाके के विकास के लिए कई कार्य किए थे. मांडर कॉलेज की स्थापना कराने, सोनचिपी में टानाभगत आवासीय विद्यालय खुलवाने और मांडर में को-ऑपरेटिव बैंक खुलवाने में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी.

पिताजी की सीख का कर रहे पालन : विश्वनाथ टानाभगत
विश्वनाथ टानाभगत ने कहा कि पिताजी ने हमेशा अच्छी राह पर चलने की सीख दी थी. उन्होंने कहा था कि हमेशा बच्चों को अच्छी शिक्षा देना. किसी जीव की हत्या कभी मत करना. स्वच्छ रहना. जीवन के अंतिम दिन भी वह खाना खाकर हाथ धोने बाहर गये थे, हर रोज वो सुबह तैयार होकर साइकिल से मांडर जाते थे. आज भी हम उनके बताये रास्ते पर चल रहे हैं.

हरिवंश टानाभगत के पोते की पहचान पर गर्व : महाबीर टानाभगत
महाबीर टानाभगत बताते हैं कि जब भी कोई उन्हें कहता है कि वो हरिवंश टानाभगत के पोते हैं तो गर्व महसूस होता है, पर उसका लाभ कुछ नहीं मिल पा रहा है. मैट्रिक पास करने के बाद से ही वो मजदूरी करने के लिए रांची जाते हैं. बाहर में खाना खाते हैं. नियमों का पालन सही तरीके से नहीं कर पाते हैं. सरकारी लाभ के तौर पर इन्हें उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन मिला है. शौचालय बना है. लाल कार्ड के जरिये राशन मिलता है.

सुविधाएं मिलतीं, तो खुशी होती : रेणु गाड़ी
हरिवंश टानाभगत की बहू रेणु गाड़ी आंगनबाड़ी चलाती हैं. उन्होंने कहा कि सरकारी सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पाने के कारण वो दुखी हैं. पीला कार्ड नहीं होने के कारण उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ नहीं मिल पाया है. टानाभगत के सारे नियमों का घर में पालन होता है. इसके अलावा पूजा करने के लिए वो बेड़ो के खक्सी टोली स्थित समाधि स्थल भी जाती हैं.