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  • Apr 27 2019 5:22PM

संताल जनजातीय समाज की रैखिक थाती : जादोपटिया लोक चित्रकला

संताल जनजातीय समाज की रैखिक थाती : जादोपटिया लोक चित्रकला

पंचायतनामा डेस्क 

जादोपटिया चित्रकला शैली वृहद समाज के बीच 1990 के दशक में आयी और पहली बार 1995 में बिहार के कला, संस्कृति, खेल-कूद एवं युवा विभाग ने इसे लोक चित्रकला के रूप में सूचीबद्ध किया. इससे पूर्व, 1990 में मैंने इस चित्रकला की खोज शुरू की. तब यह शैली लुप्त होने के कगार पर थी. वृहद समाज इससे अनजान और संताल समाज विमुख था. कलाकारों की नयी पीढ़ियों की समस्या दो जून की रोटी थी. बचे हुए कलाकार भी दो-तीन विषयों को ही चित्रित करने तक सीमित थे. उनके लिए यह कला नहीं, भिक्षाटन का माध्यम रह गया था. तब इस पेंटिंग को ग्रामीणों ने अलग-अलग नाम दे रखा था, जो इसके संपूर्ण सांस्कृतिक और कला पक्षों एवं विशिष्टताओं को अभिव्यक्त नहीं करते थे. इनमें एक नाम 'यम-शासन' भी था, जिसमें मनुष्य के कर्म के अनुसार यमलोक में उसे दंडित करने की कल्पना चित्रित की जाती है. तब मूलत: यही पेंटिंग प्रचलन में थी. तब देश में साक्षरता अभियान चल रहा था और अंधविश्वास के खिलाफ लोग खड़े हो रहे थे. ऐसे में 'यम-शासन' के प्रति समाज का उदासीन होना स्वाभाविक था

करीब चार साल की सतत खोज, चरणबद्ध सर्वेक्षण, अध्ययन और इसके कलाकार-समूह (जाति) का मानवशास्त्रीय अध्ययन के बाद मैंने इस चित्रकला शैली को 'जादोपटिया' नाम दिया और यह स्थापना दी कि 'यम-पट' इस चित्रकला शैली का मूल विषय नहीं है, अपितु 'काराम-विनति' है, जिसमें सृष्टि की उत्पत्ति की गाथा को चित्रित होती है. वैसे इस पेंटिंग के लिए 'जादोपटिया' शब्द का पहला प्रयोग मैंने 1991-92 में किया था. जामताड़ा क्षेत्र में प्राय: 80 साल के एक चित्रकार के पास 22 फीट लंबा पट मिला था. 1990 से 1994 के बीच मैंने नौ विषयगत पट संकलित किये और इस पेंटिंग के ग्यारह वृद्ध वंशानुगत कलाकारों को तलाश कर इस चित्रकला के संरक्षण, संवर्धन, प्रसार, प्रशिक्षण और विपणन (मार्केटिंग) कार्य आरंभ किया था. इस काम में मीनू आनंद ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.

जादोपटिया चित्रकला संतालों के सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों, मान्यताओं, गाथाओं और पर्व-त्योहारों पर केंद्रित पटचित्र है, जो कपड़े या कागज को जोड़ कर बनाये गये पट पर चित्रित किया जाता है. इसमें मूलत: प्राकृतिक रंगों का प्रयोग होता है. एक पट पर पहले 16 से 20 तक चित्र होते थे. अब पटों व उन पर चित्रों की संख्या घटी है. जादोपटिया कलाकार आज भी पटों को गांव-गांव जाकर दिखाते हैं. बदले में दक्षिणा पाते हैं, किंतु दो बातें सुखद हैं. एक कि अब यम-पट के अतिरिक्त दूसरे पट भी चित्रित किये जा रहे हैं और कुछ वंशानुगत कलाकार कैनवास पर भी काम करने लगे हैं. दूसरी बात कि इस पेंटिंग का व्यवसायीकरण तेजी से हुआ है, किंतु दुखद यह कि इस क्रम में इसके मूल अवयव, रैखिक विशेषता और सांस्कृतिक पक्ष विघटित हो रहे हैं.