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  • Apr 2 2019 5:15PM

कुलवे है आदर्श अक्षय ग्राम, लेकिन टीबी को लेकर है जागरूकता का अभाव

कुलवे है आदर्श अक्षय ग्राम, लेकिन टीबी को लेकर है जागरूकता का अभाव

पवन  कुमार

गांव में रोजगार की कमी है. कृषि और पत्थर खनन ही ग्रामीणों का मुख्य पेशा है. 50 फीसदी ग्रामीण पत्थर खनन का कार्य करते हैं, जिसके कारण फेफड़े से संबंधित बीमारियों की चपेट में आने का खतरा अधिक रहता है. पत्थर खनन के कारण दिनभर धूल में रहने से ग्रामीण टीबी की बीमारी की चपेट में जल्दी आ जाते हैं, लेकिन उन्हें टीबी बीमारी की कोई जानकारी भी नहीं होती है. राजधानी रांची से लगभग 40 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड की बाड़े पंचायत में स्थित है कुलवे गांव. सुदूरवर्ती गांव होने के कारण यह थोड़ा पिछड़ा हुआ है. गांव में बिजली है. अखबार पहुंचता है. घरों में टेलीविजन है. एक प्राइमरी स्कूल है और एक आंगनबाड़ी केंद्र भी है, लेकिन टीबी संबंधित बीमारी के प्रति वे जागरूक नहीं हैं.

टीबी के प्रति सरकारी योजनाओं की नहीं है जानकारी
कुलवे गांव में आदर्श अक्षय ग्राम का बोर्ड तो लगा दिया गया है, लेकिन ग्रामीणों को टीबी बीमारी के बारे में जानकारी नहीं है. ग्रामीणों को मालूम ही नहीं है कि टीबी के मरीजों को सरकार की ओर से मुफ्त में दवाओं के साथ-साथ पैसे भी दिये जाते हैं, ताकि मरीज स्वस्थ भोजन ले सकें. जानकारी के अभाव में ग्रामीण कई बार अप्रशिक्षित डॉक्टरों के चक्कर में पड़ जाते हैं, जिसके कारण बीमारी की सही पहचान नहीं हो पाती है और टीबी की बीमारी जानलेवा हो जाती है. डॉट्स केंद्र की जानकारी भी मरीजों को नहीं है. न ही ग्रामीण इससे अवगत हैं. आदर्श अक्षय ग्राम के बोर्ड में स्पष्ट लिखा हुआ है कि टीबी बीमारी से संबंधित अधिक जानकारी के लिए ग्रामीण मुखिया और ग्राम प्रधान से संपर्क कर सकते हैं. हैरत ये कि मुखिया और ग्राम प्रधान को आदर्श अक्षय ग्राम के तहत लगाये गये बोर्ड की भी जानकारी नहीं है.

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नहीं मानते हैं डॉक्टरों की सलाह
ग्रामीणों से बातचीत के दौरान यह बात भी सामने आयी कि मरीज और उनके परिजन डॉक्टरों की सलाह की भी अनदेखी करते हैं. टीबी मरीजों को डॉक्टर शराब नहीं पीने की सलाह देते हैं, लेकिन मरीज शिक्षा और जानकारी के अभाव में दवा चलने के दौरान भी शराब पी लेते हैं. साथ ही मरीज मुंह में कपड़ा लेकर नहीं खांसते या छींकते हैं, जिसके कारण मरीज के परिजनों को भी टीबी बीमारी होने की संभावना बढ़ जाती है.

एक नजर में कुलवे गांव
बुढ़मू प्रखंड स्थित बाड़े पंचायत के अंतर्गत पड़नेवाले कुलवे गांव में लगभग 80 घर है. आबादी लगभग 500 है. गांव में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र नहीं है. आंगनबाड़ी है. एक प्राथमिक विद्यालय है. साफ-सफाई को लेकर ग्रामीणों में जागरूकता का अभाव है. गांव की नालियां भी सही नहीं हैं. ग्रामीणों को डॉट्स केंद्र की भी जानकारी नहीं है. उचित देख-रेख और पैसे के अभाव में ग्रामीण प्रखंड मुख्यालय स्थित प्रखंड अस्पताल में नहीं जाकर अप्रशिक्षित डॉक्टर के चंगुल में फंस जाते हैं, क्योंकि वे आस-पास आसानी से उपलब्ध होते हैं. सरकारी डॉक्टर के पास जाने के लिए उन्हें बुढ़मू जाना पड़ता है.

झारखंड में 36,861 टीबी के मरीज
टीबी को लेकर देश और राज्य के आंकड़े काफी गंभीर है. खासकर खनन क्षेत्रों की स्थिति तो बहुत दयनीय है. विश्व स्वास्थ्य संगठन के द्वारा जारी किये गये 2018 के आंकड़ों के मुताबिक, विश्व में टीबी से होनेवाली मौत में सबसे ज्यादा मौत भारत में होती है. दुनिया में टीबी के मरीजों की संख्या का 64 प्रतिशत सिर्फ सात देशों में है, जिनमें भारत सबसे ऊपर है. भारत के बाद इंडोनेशिया, चीन, फिलीपींस, पाकिस्तान, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका है. टीबी इंडिया रिपोर्ट के द्वारा वर्ष 2017 में जारी किये आंकड़ों के मुताबिक, पूरे देश में सरकारी स्त्रोत के माध्यम से 14,44,175 मरीजों की पहचान की गयी, जबकि निजी अस्पतालों में आये टीबी के मामलों के मुताबिक 3,83,784 मरीजों की पहचान की गयी. झारखंड में सरकारी अस्पतालों के माध्यम से 36,861 टीबी के मरीजों की पहचान की गयी, जिनमें से 32,756 का इलाज शुरुआती दौर में शुरू हो गया. निजी क्षेत्र के माध्यम से 7267 टीबी के मरीजों की पहचान की गयी.

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टीबी मरीजों के लिए सरकारी योजना
टीबी का इलाज मुफ्त में होता है. बेहतर खान-पान के लिए मरीज को हर माह 500 रुपये दिये जाने का प्रावधान है. इसके साथ ही जो भी व्यक्ति मरीज को छह माह की दवा खिलाता है, उसे 1000 रुपये और दो साल तक दवा खिलाने के लिए 5000 रुपये सरकार की ओर से दिये जाने का प्रावधान है. यह योजना एक अप्रैल 2018 से लागू है. इससे पहले यह प्रावधान था कि अनुसूचित जाति बहुल जिलों में जो भी टीबी के मामले आयेंगे, वहां के मरीजों को 750 रुपये प्रतिमाह दिये जायेंगे, चाहे मरीज किसी भी जाति का हो.

डॉक्टर के पास जाने से कतराते हैं ग्रामीण : देवशरण शुडवार
कुलवे गांव की वार्ड संख्या सात के वार्ड सदस्य देवशरण शुडवार कहते हैं कि शिक्षा और जागरूकता के अभाव में ग्रामीण टीबी की अनदेखी करते हैं और शुरुआती दौर में इलाज शुरू नहीं करते हैं. ग्रामीणों को अस्पताल तक पहुंचाने की सुविधा भी नहीं है. कई बार तो खुद के पैसे से वो मरीजों को अस्पताल ले जाते हैं.

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एक मरीज को ठीक किया, दो को दवा खिला रहे हैं: सुधन देवी
कुलवे गांव की आंगनबाड़ी सेविका सुधन देवी बताती हैं कि उन्होंने गांव के ही लालू उरांव को टीबी होने पर दवा का पूरा कोर्स खिलाया था, जिससे वो ठीक हो गये हैं. इसके साथ ही दो और मरीज राजेश लोहरा और सुखनाथ महतो को दवा खिला रही हैं. इस काम के लिए वो कोई पैसे नहीं लेती हैं. इन्हें सरकारी योजनाओं की जानकारी भी नहीं है, पर कहती हैं कि अगर उनके प्रयास से किसी की जान बच जाती है, तो इससे अच्छी बात क्या होगी.

झारखंड में टीबी के आंकड़े डराने वाले हैं : दिवाकर शर्मा
टीबी उन्मूलन और टीबी बीमारी को लेकर कार्य करनेवाली संस्था रीच के झारखंड प्रतिनिधि दिवाकर शर्मा की मानें, तो झारखंड में हजारों की संख्या में टीबी के मरीज हैं, पर कई मामले अस्पतालों तक नहीं पहुंच पाते हैं. कई मामलों में मरीज की पहचान नहीं हो पाती है. टीबी से ठीक हुए लोगों की भी भूमिका बहुत बड़ी है. परिवार और समाज दोनों मरीजों के साथ भेदभाव न करके इलाज को आसान बना सकते हैं.