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  • Apr 27 2019 5:38PM

चुहाड़ विद्रोह के महानायक गंगानारायण ने अंग्रेजों के आगे कभी नहीं झुकाया सिर

चुहाड़ विद्रोह के महानायक गंगानारायण ने अंग्रेजों के आगे कभी नहीं झुकाया सिर

संजय सरदार

भारतीय इतिहास के पन्ने पर भले ही भूमिज विद्रोह को उचित स्थान नहीं दिया गया है. गंगानारायण सिंह का हंगामा या स्वाधीनता आंदोलन नामक पुस्तक में सिर्फ चुहाड़ विद्रोह करार दिया गया है, लेकिन अंग्रेजों के खिलाफ वीर शहीद गंगानारायण सिंह द्वारा किये गये आंदोलन को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. गंगानारायण सिंह वीरता के पर्याय थे. उन्होंने अपनी मां, माटी, आत्म-सम्मान तथा परंपराओं की रक्षा के लिए कभी अंग्रेजों के आगे सिर नहीं झुकाया. अपने उसूलों के साथ कभी समझौता नहीं किया. यही कारण है कि अंग्रेजों ने गंगानारायण सिंह की गिरफ्तारी के लिए इनाम की घोषणा कर रखी थी. इन्हीं के आंदोलन की देन है दक्षिणी-पश्चिमी सीमांत एजेंसी, जिसे बाद में पांचवीं अनुसूची की संज्ञा दी गयी.

बराहभूम राज, जिसे भूमिजों के पूर्वज नाथ बराह और केश बराह, बराह भूमिजों के गौत्र द्वारा स्थापित किया गया था. बराहभूम के 40वें शासक राजा विवेकनारायण सिंह के पोता और लक्ष्मण सिंह एवं ममता देवी के पुत्र गंगानारायण सिंह का जन्म 25 अप्रैल, 1790 को बराहभूम राज की तरफ पुंज सरदारी या पांच सरदारी के बांधडीह नामक ग्राम (अब सरायकेला-खरसावां जिले के नीमडीह प्रखंड) में हुआ था. बराहभूम राज उत्तराधिकारी कानून के अड़चन में फंसे लक्ष्मण सिंह को अंग्रेजों द्वारा उत्तराधिकारी से वंचित कर दिया गया, जिस कारण लक्ष्मण सिंह ने अंग्रेजों के विरोध में लड़ाई लड़ने का निश्चय किया. इस कारण कैप्टन फार्गुसन ने उन्हें गिरफ्तार कर मेदिनीपुर जेल में बंद कर दिया, जहां उनकी मृत्यु हो गयी.

अंग्रेजों की फूट डालो व राज करो की नीति
अंग्रेजों की कूटनीति के कारण बराहभूम राज में भी गृह विवाद चला. पाटरानी के पुत्र को राज का गद्दी न देकर छोटी रानी के पुत्र को अंग्रेजों द्वारा राजा का शासन दिया गया. चचेरे भाई माधव सिंह क्रूर दीवान थे. उन्होंने राजस्व की उच्च दर, जमीन की नीलामी, दारोगा पुलिस प्रथा, जंगल कानून, नमक कानून, नील की खेती आदि कानून लगाया. इसके विरोध में गंगानारायण सिंह ने भूमिज समाज की परंपरागत व्यवस्था को कायम रखने के लिए एक रणनीति बनायी. सरदार, घाटवाल, मुंडा, मानकी, पाइक, नायक, दिगारों की बैठक बुलाई और अंग्रेजों एवं दीवान माधव सिंह के अत्याचार का विरोध करते हुए बांधडीह से आंदोलन का बिगुल फूंक दिया.

गंगानारायण सिंह का विद्रोह
गंगानारायण सिंह ने अपना पहला विद्रोह घर से ही शुरू करने का निश्चय किया. इसके तहत उन्होंने अपने चचेरे भाई दीवान माधव सिंह(क्रूर, लालची, सूदखोर) की हत्या करने का फैसला किया. इसके लिए वामनी डुंगरी स्थान तय किया गया. माधव सिंह क्षेत्र से वसूले गये अनाज का भंडारण, पांच सरदारी के ग्राम सिरका में गोपी लाया के यहां करते थे. गोपी लाया को अनाज भंडारण निरीक्षण के लिए माधव सिंह को बुलाने को कहा गया. योजना के मुताबिक माधव सिंह के आने पर उसे पकड़ कर वामनी डुंगरी ले जाया गया. फिर तीर से उसके शरीर को छलनी कर दिया गया. माधव सिंह को गंगानारायण ने मौत के घाट उतार दिया. इसके बाद से हर साल 15 जनवरी को खेलाई चंडी नामक देवी की पूजा होती है.

गंगानारायण ने खुद को काल का अवतार घोषित किया
25
अप्रैल, 1832 को गंगानारायण ने बांधडीह गांव में क्षेत्र के तमाम सरदार, जमींदार, घाटवाल, दीगार, नायक एवं पाइको की एक बैठक बुलायी. इसमें तय हुआ कि जंगल महल क्षेत्र से अंग्रेजों को खदेड़ा जाये. इसके लिए एक सरदार वाहिनी का गठन कर अपने को काल का अवतार घोषित किया. एक मई, 1832 को बराह बाजार मुंसिफ कचहरी को जला दिया तथा सूदखोर महाजनों को लूटा गया. इस खबर से ब्रिटिश सरकार में खलबली मच गयी. बांकुड़ा के कमिश्नर रासेल, वर्धमान के कमिश्नर बार्डेन, मेदनीपुर के कमिश्नर ग्राहम ने गंगानारायण सिंह के विद्रोह को दबाने के लिए लेफ्टिनेंट फार्गुसन को सेनापति के रूप में कमान सौंपा. तीनों कमिश्नर इस बात से डरे हुए थे कि कहीं यह विद्रोह भयावह रूप न ले ले.

अंग्रेजों ने दिया चुहाड़ विद्रोह का नाम
धीरे-धीरे विद्रोह का दायरा बढ़ता गया. बराहभूम, कुइलापाल, धाधका, फुलकुसमा, रायपुर, सुपुर, अंबिकानगर, दामपाड़ा के साथ ही काशीपुर, आड़सा, बेगुनकुदर, सिरकाबाद, बाघमुंडी, माठा, सुइसा होते हुए धालभूम तक पहुंच गया. इन सभी का मकसद अंग्रेजों के शासन को इस क्षेत्र से खत्म करना था. 14 मई, 1832 को गंगानारायण सिंह ने अपनी सरदार वाहिनी के साथ पुन: एक हजार नारायणी सेना के साथ बराह बाजार कैंप पर अाक्रमण कर दिया. उस समय मेदनीपुर के कमिश्नर मेक डार्लेन ने गंगानारायण सिंह को पकड़नेवाले को एक हजार रुपये इनाम देने की घोषणा कर दी. दो जून, 1832 को कैप्टन मार्टिन के नेतृत्व में ब्रिटिश रेजिमेंट के एक विशाल वाहिनी ने बांधडीह में आक्रमण कर दिया. चार जून, 1832 को बेड़ादा और उसके आसपास के गांव जला दिये गये. गंगानारायण सिंह दलमा के जंगल में छिप गये और छापामार युद्ध शुरू कर ब्रिटिश रेजिमेंट पर तीनों तरफ से वार करने लगे. इस युद्ध में उन्होंने 19 सेना के जवानों को मार गिराया. 25 जुलाई, 1832 को कुइलापाल के बहादुर सिंह से सहायता लेकर एक हजार वाहिनी के साथ पूंडा पर आक्रमण करते हुए अंबिकापुर, ओंकरो, रायपुर, सुबोल, कुइलापाल, श्यामसुंदरपुर, फुलकुसमा में आक्रमण किया. इस विद्रोह को अंग्रेजों ने गंगानारायण सिंह का चुहाड़ विद्रोह या गंगानारायण सिंह का हंगामा करार दिया. कंसाई नदी कसावती में पानी भर जाने के कारण कुछ दिनों तक संघर्ष विराम रहा. फिर वार्डेन बराह बाजार से 40 किमी उत्तर चाकोलतल में गंगानारायण सिंह के साथ भिड़ंत हुई, जहां गंगानारायण के कई सरदार मारे गये. तब गंगानारायण ने रणनीति के तहत 17 सितंबर, 1832 को चाकोलतल में छाता पर्व (मेला) लगाया. उस मेले में उन्होंने लोगों से अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने का आह्वान किया. इसके बाद अंग्रेजों के बराहभूम एवं काशीपुर में थाना बलरामपुर व रघुनाथपुर पर आक्रमण किया. इसी दौरान आदरडीह व बड़ा चातरमा में गंगानारायण सिंह के साथ लड़ाई हुई.

अंग्रेजों ने बदली रणनीति
अंग्रेजों ने रणनीति बदलते हुए बराहभूम के बलरामपुर, बाड़ेदा, धाधका, आमझोर तथा धालभूम के रघुनाथ धवलदेव के खिलाफ लड़ाई छेड़ दी. दिसंबर माह में रायडीह, दिगारडीह, बाड़ेदा, बांधडीह में आक्रमण कर घरों को जला दिया तथा संपत्ति जब्त कर ली. गंगानारायण सिंह पुन: बाटालुका दलमा में अपने कुछ विश्वस्त सरदार के साथ छिप गये. जब अंग्रेज हुकूमत ने गंगानारायण सिंह को गिरफ्तार करने के लिए बराहभूम में छापामारी तथा समर्थक सरदारों की गिरफ्तारी का अादेश दी, तब उन्होंने धालभूम एवं सिंहभूम और दलमा से प्रस्थान किया. दलमा से कदमझोर, कुकुरकोचा, टावरकोचा, आघाई डांगरा, कामकोचा, सामानपुर, कुचुंग आदि में संघर्ष हुआ. तब दामपाड़ा, घाटशिला, कालिकापुर, पोटका, हल्दीपोखर को संघर्ष का क्षेत्र बनाया. सात जनवरी, 1833 को हल्दीपोखर-पोटका इलाके में गंगानारायण सिंह ने बांधडीह जुड़ी के गार्दी मुड़ा के सहयोग से अंग्रेज भक्त दिगार की हत्या कर दी.

धुसा सरदार- जंगलू सरदार
पोटका के दो वीर सारसे-बुरूहातु के रहनेवाले घुसा सरदार एवं जंगलू सरदार तथा बांधडीह जुड़ी के गार्दी मुड़ा गंगानारायण सिंह के सहयोगी बन अंग्रेजों के खिलाफ जमकर लड़ाई लड़ी थी. गार्दी मुड़ा का घर जलाकर संपत्ति जब्त कर लिया गया, जबकि घुसा एवं जंगलू को अंग्रेजों ने देवली ग्राम में फांसी दे दी, जिसका प्रमाण आज भी देखने को मिलती है.

लड़का हो एवं ठाकुर चैतन्य सिंह
गंगानारायण सिंह धलभूम के पोटका- हल्दीपोखर होते हुए लड़का कोलो (हो) से सहयोग के लिए 15 जनवरी, 1833 (आखाना यात्रा के दिन) को कोल्हान पहुंचे. लड़का सरदारों से अंग्रेजों के साथ लड़ाई करने का आग्रह किया. लड़का हो लोगों से अपने पुराने शत्रु एवं अंग्रेज के दलाल ठाकुर चैतन्य सिंह से पहले गंगानारायण सिंह को लड़ाई लड़ने को कहा. गंगानारायण सिंह सात फरवरी, 1833 को अपने कुछ सरदारों के साथ खरसावां के हिंदू शहर की ओर बढ़े, जिसका मकसद था ठाकुर को भी अंग्रेज सरकार के खिलाफ लड़ने का आग्रह करना, लेकिन ठाकुर चैतन्य सिंह को लगा कि गंगानारायण सिंह लड़का कोलों के साथ मिलकर खरसावां पर आक्रमण कर रहे हैं. इसलिए आकर्षणी गांव के पास सात फरवरी, 1833 को ठाकुर एवं गंगानारायण सिंह के सैनिकों के साथ भिड़ंत हुई, जिसमें ठाकुर के तीन सिपाही मारे गये और 13 को घायल करते हुए वीरगति प्राप्त की. इस तरह से सात फरवरी, 1833 को गंगानारायण सिंह के वीरगति प्राप्त होने के साथ ही गंगानारायण सिंह का भूमिज विद्रोह खत्म हो गया.

अंग्रेजों ने जंगल महल क्षेत्र को बांटा
गंगानारायण सिंह के शहीद होने के बाद भी अंग्रेजों को डर हमेशा सता रहा था कि अब इस क्षेत्र में शासन करना उतना आसान नहीं होगा. इसलिए सारे जंगल महल क्षेत्र को कई भागों में विभक्त कर 1834 में दक्षिण पश्चिमी सिमांत एजेंसी बनाया. जिसमें मानभूम (मानभूम, नन- रेगुलेशन, जंगल महल तथा धालभूम), लोहरदगा (छोटानागपुर, पंचपरगना एवं पलामू) तथा हजारीबाग (रामगढ़ पुरातन रेगुलेशन बहिरागत अंचल एवं खड़गडीह) आदि क्षेत्र को बांट दिया गया.