gram savraj

  • Mar 4 2019 4:49PM

जीरो बजट फार्मिंग से युधिष्ठिर महतो की बंजर जमीन उगलने लगी सोना

जीरो बजट फार्मिंग से युधिष्ठिर महतो की बंजर जमीन उगलने लगी सोना

जैविक खेती से बंजर जमीन पर लगी फसल लहलहा उठीउत्पादन भी उम्मीद से कहीं ज्यादा हुआ.इससे उत्साहित किसान युधिष्ठिर महतो का चेहरा खिल उठाढाई दशक तक उनकी साढ़े तीन एकड़ बंजर जमीन परती रहीजीरो बजट फार्मिंकमाल कहिए. अब परती जमीन सोना उगल रही है. रांची जिले का ओरमांझी प्रखंड खेती के लिए पूरे राज्य में प्रसिद्ध है. इस प्रखंड में राज्य के कई बड़े किसान हैं. इस क्षेत्र की मिट्टी उपजाऊ है. युधिष्ठिर महतो ओरमांझी प्रखंड की करमा पंचायत अंतर्गत रुक्का गांव के हैं. रांची से लगभग 15 किलोमीटर दूर इस इलाके की अधिकांश आबादी कृषि पर निर्भर है. रुक्का डैम के किनारे होने के कारण किसानों को सिंचाई में काफी सुविधा होती है

 खेती छोड़ अपनाया था व्यवसाय
युधिष्ठिर महतो का जन्म किसान परिवार में हुआ. इसलिए बचपन से ही खेती-बारी करते और देखते आये हैं, पर वो दौर कुछ और था. उस समय खेती में मुनाफा नहीं था. बस अपने खाने-पीने के लिए खर्च निकल जाता था. इसके बाद युधिष्ठिर जब बड़े हुए, तो उन्हें यह अहसास हुआ कि खेती मुनाफा का काम नहीं है. कोई भी किसान परिवार खेती करके समृद्ध नहीं हो पा रहा है. इसलिए व्यवसाय की तरफ रुख किया. युधिष्ठिर ने बीएससी (लेबोरेटरी टेक्निशियन) किया, जिसके कारण अपोलो हॉस्पिटल, इरबा (अब मेदांता) में उन्हें काम भी मिल गया. इसके बाद धीरे- धीरे उन्होंने खुद का एक नर्सिंग कॉलेज खोला है.

जैविक खेती की मिली जानकारी
अपना व्यवसाय करते हुए युधिष्ठिर को जैविक खेती के बारे में जानकारी मिली. उन्होंने जीरो बजट फार्मिंग के बारे में जानकारी हासिल की और अपनी बंजर पड़ी जमीन पर खेती करने का फैसला किया. युधिष्ठिर बताते हैं कि ढाई दशक बाद फिर से उन खेतों में खेती करना आसान नहीं था, वो भी जीरो बजट फार्मिंग, पर आधुनिक तकनीक ने युधिष्ठिर का काम आसान कर दिया. युधिष्ठिर ने अपने खेतों में ड्रिप इरिगेशन लगाया और कुल साढ़े तीन एकड़ जमीन में सब्जियों की खेती शुरू की.

तीन गुना हुआ मुनाफा

युधिष्ठिर बताते हैं कि खेती करने में उन्हें कुल 50 हजार रुपये की लागत आयी, लेकिन अभी तक वो डेढ़ लाख रुपये की सब्जियां बेच चुके हैं. यह खेती उन्होंने पूर्ण जैविक तरीके से की है. ऊर्वरक के लिए गोबर खाद का इस्तेमाल किया है. कीटनाशक के तौर पर अपने खेत के आस-पास स्थित जंगली झाड़ियों के पत्ते और नीम के पत्ते का इस्तेमाल किया है. युधिष्ठिर मानते हैं कि जिन पत्तों में कीट नहीं लगते हैं, उनका इस्तेमाल कीटनाशक के तौर पर किया जा सकता है.

क्या है जीरो बजट प्राकृतिक खेती
जीरो बजट प्राकृतिक खेती के तहत किसान खुद तैयार की गयी खाद व अन्य चीजों का इस्तेमाल अपने खेती के दौरान कर सकते हैं. इससे खेती करने में किसी प्रकार के रासायनिक उर्वरकों व कीटनाशकों का इस्तेमाल करने की जरूरत नहीं पड़ती है. इस प्रक्रिया के तहत खेती करने में कोई राशि खर्च नहीं करनी पड़ती है और कम लागत में अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है. हाइब्रिड बीज पर निर्भरता कम करने के लिए हमें अपने खेत के बीज को संरक्षित करना पड़ेगा.

सब कुछ हमारे आस-पास है, बस पहचानने की जरूरत है : युधिष्ठिर महतो
सफल किसान युधिष्ठिर महतो बताते हैं कि किसान जीरो बजट फार्मिंग के लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं. इसके लिए सबसे पहले हमें बीज को संरक्षित करने की जरूरत है. इससे बीज हमें खरीदना नहीं पड़ेगा. खेत में स्थित खर-पतवार सड़ने के बाद ऊर्वरक का काम करेंगे. इसके अलावा किसान गोबर का प्रयोग जरूर करें. कीटनाशक के तौर पर यह जरूरी नहीं है कि सिर्फ नीम के पत्ते का इस्तेमाल करें. किसान उन तमाम पौधों की पत्तियों का इस्तेमाल कर सकते हैं, जो उनके खेत के आस-पास हैं. इनमें कीटों का प्रकोप नहीं होता है. बनतुलसी, अकवंद, थेथरेक पत्तों का भी इस्तेमाल किया जा सकता है. इस तरह से किसान जीरो बजट फार्मिंग के लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं.