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  • May 4 2019 5:01PM

उमेडंडा गांव, जहां आज भी फल-फूल रही है लोककला

उमेडंडा गांव, जहां आज भी फल-फूल रही है लोककला

पवन कुमार
जिला: रांची

कहीं सीखा नहीं. बस घर में पिताजी को और अखरा में लोगों को गाते हुए सुनता था. देखते-देखते सीख गया. वो दौर ही अलग था जब पर्व-त्योहार और शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में लोकगीत और संगीत ही ग्रामीणों के मनोरंजन का साधन हुआ करते थे. ये बातें मशहूर नागपुरी लोक गायक महीवार नायक ने कहीं. रांची से लगभग 45 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड अंतर्गत उमेडंडा एक सुदूरवर्ती गांव है, जहां हर घर-परिवार में लोककला जीवित है.

कला को संजो कर रख रहा गांव
हरे-भरे जंगलों से घिरे इस गांव में आधुनिकता धीरे-धीरे हावी हो रही है, पर अभी भी ग्रामीण लोकगीत और संगीत को बड़े ही चाव से सुनते हैं. समाज में पुराने रीति-रिवाज अभी भी जीवित हैं. यह गांव खास इसलिए भी है, क्योंकि इस गांव में शहनाई वादक, बांसुरी वादक, मांदर वादक, ढोल वादक समेत लोक गायक यानी हर तरह के कलाकार आपको मिल जायेंगे. इस गांव ने अभी तक लोककला को संजो कर रखा है. यहां की युवा पीढ़ी कलाकार है. एक शहनाई वादक हैं, जो बूढ़े हो गये हैं. इस गांव में सारंगी बजाने वाले भी हैं.

10 साल की उम्र से लोकगीत गाने लगे महावीर नायक
महावीर नायक बताते हैं कि पहले उनके घर में उनकी मां और पिताजी दोनों ही लोकगीत गाते थे. उनके पिताजी उन्हें कंधे पर बैठा कर अखरा ले जाया करते थे. वहां पर लोकगीत सुनते थे. इसका प्रभाव धीरे-धीरे उनके ऊपर पड़ा और उन्होंने लोकगीत गाना शुरू कर दिया. पहली बार 10 साल की उम्र में उमेडंडा स्कूल में गाने का मौका मिला. उस वक्त वहां पद्मश्री मुकुंद नायक, महाबली खान, यशोदा देवी जैसे दिग्गज बैठे हुए थे, लेकिन उन्होंने अच्छा गाया. इसके बाद 12 वर्ष की उम्र में रातू में आयोजित कार्तिक मेले में गाने का मौका मिला. फिर इसके बाद धीरे-धीरे मौका मिलता गया और आगे बढ़ते गये. 15 वर्ष की उम्र से आकाशवाणी में गाना शुरू किया. फिर आजाद अंसारी से मुलाकात हुई. उनके घर में रहकर संगीत की बारीकियों को समझा. इस बीच पढ़ाई जारी रखा और नागपुरी से स्नातक की डिग्री ली. अब कई जगहों पर जाकर स्टेज शो करते हैं. अब महावीर की आजीविका का साधन ही लोककला है. महावीर नायक एकमात्र युवा हैं, जो ठेठ भाषा में गाते हैं.

सैंकड़ों शादियों में बज चुकी है सोमरा नायक की शहनाई की धुन
उमेडंडा के पास का ही एक गांव है मक्का. इस गांव के सोमरा नायक पिछले 40 साल से शहनाई बजा रहे हैं. अपने मामा से सोमरा नायक ने शहनाई बजाना सीखा था. इसके बाद मंडा पूजा में बजाने लगे. शहनाई के साथ-साथ सोमरा नगाड़ा भी बजाते हैं. शहनाई बजाने के लिए वो रांची के अलावा धनबाद भी जा चुके हैं. सोमरा बताते हैं कि पहले की तरह लोगों में अब उमंग नहीं है. आधुनिक पीढ़ी शहनाई सीखना नहीं चाहती है. अभी तक पांच लोगों को शहनाई सीखने के लिए प्रशिक्षण दे चुके हैं, लेकिन एक को छोड़ अन्य प्रशिक्षणार्थी इसमें दिलचस्पी नहीं दिखा रहे हैं.

जसमन व लखन क्रमश: ढाक और नगाड़ा बजाने के हैं उस्ताद
जसमन नायक और लखन नायक क्रमश: ढाक और नगाड़ा बजाते हैं. लखन पिछले 35 साल से नगाड़ा बजा रहे हैं . लखन बताते हैं कि पहले नगाड़ा की धुन पर लोग थिरकते थे, पर अब नगाड़ा बस नेग के लिए रह गया है. घर से ही नगाड़ा सीखनेवाले लखन ने कहा कि अब की पीढ़ी, तो नगाड़ा बजा लेती है, पर वो पुरानी धुन नहीं बजा पाते हैं. जसमन नायक पिछले 50 साल से ढाक बजा रहे हैं. घर में सुन कर ही उन्होंने ढाक बजाना सीखा था. बचपन में वो बाल्टी बजाया करते थे.

स्टेज पर बजती है सुरेश की बांसुरी की धुन
महावीर नायक की टीम में बांसुरी वादक केदली गांव के सुरेश महतो बताते हैं कि बचपन से ही कला के प्रति उनका झुकाव था. गांव में ही बचपन में रियाज करते थे. इसके बाद गांव में रहकर और अलग-अलग कार्यक्रमों में जाकर मांदर बजाना सीखा. फिर स्टेज शो में जाने लगे और वहां पर की-बोर्ड और बांसुरी बजाना सीखा. अब वो छह साल से बांसुरी बजा रहे हैं. सुरेश महतो ने एमए किया है और नेट क्वालीफाइ कर बीएड कर रहे हैं.

बैजनाथ बजाते हैं खुद से बनायी सांरगी
उमेडंडा नेवदा टोली के बैजनाथ उरांव सारंगी बजाते हैं. 10 साल तक बैजनाथ ने सांरगी बजायी है. अब उनके बाद कोई नहीं है, जो सारंगी बजाना जानता हो. उन्होंने बताया कि वो खुद से सारंगी बना भी लेते हैं. फिलहाल सांरगी टूट गयी है. बैजनाथ बताते हैं कि सारंगी बजाने से रोजी-रोटी नहीं चल पाती है. इसलिए वो राजमिस्त्री का काम करते हैं.

ठेठ गायक के तौर पर उभरता युवा कलाकार छोटू उरांव
उमेडंडा नेवदा टोली के छोटू उरांव ठेठ और आधुनिक नागपुरी गीत के उभरते हुए कलाकार हैं. छोटू ने अब तक गायकी का कोई प्रशिक्षण नहीं लिया है. बस लोगों को गाते हुए देखा, सुना और सीख गये. छोटू 14 साल की उम्र से गाना गा रहे हैं. कई बार आस-पास के गांवों में भी जाकर गीत गाते हैं. आजीविका के लिए छोटू राजमिस्त्री का काम करते हैं.