gram savraj

  • Dec 19 2017 1:20PM

ओरमांझी का आरा-केरम गांव बन चुका आदर्श ग्राम साफ-सुथरा और नशामुक्त गांव

ओरमांझी का आरा-केरम गांव बन चुका आदर्श ग्राम साफ-सुथरा और नशामुक्त गांव

पवन कुमार
राजधानी रांची से 25 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड की टुंडाहुली पंचायत के दो गांव आरा और केरम आज आदर्श ग्राम हैं. 120 घर और आबादी करीब 600. हरे-भरे जंगलों व पहाड़ों की तराई में बसे दोनों गांवों की खूबसूरती देखते ही बनती है. हरियाली की बात हो, साफ-सफाई या नशामुक्ति की. इस गांव में प्रवेश करते ही आपको आदर्श ग्राम में होने का अहसास होगा. इसकी आबोहवा बिल्कुल बदली-बदली सी है.साधारण गांव से आदर्श ग्राम तक का सफर यकायक तय नहीं हुआ.करीब 29 साल पहले जंगल बचाने की ग्रामीणों की छोटी सी पहल धीरे-धीरे रंग लाने लगी. वक्त के साथ गांव के विकास का रंग गाढ़ा होता गया और आज गांव की फिजा ही बदल गयी है. मुस्कुराइये, आप झारखंड के नशामुक्त गांव आरा-केरम में हैं.

29 वर्ष पहले की छोटी पहल लायी रंग : ग्रामीणों ने 29 वर्ष पहले जंगल बचाने की छोटी सी पहल की थी. उस दौरान उन्हें उम्मीद भी नहीं होगी कि एक दिन गांव में इसका इतना बड़ा बदलाव दिखेगा. इस बाबत आज गांव के लोग कहते हैं कि जो बातें अच्छी लगीं, उसे सीखते हुए जीवन में उतारते चले गये और आज उनका गांव आरा-केरम आदर्श ग्राम बन गया है, लेकिन गांव के बुजुर्गों की मानें, तो वर्ष 1988 में गांववाले एकजुट हुए थे. पेड़-पौधे, जंगल औैर जंगली जानवरों के प्रति जब संवेदना जगी, तो गांव में समिति बनाकर जंगलों की रक्षा करने का संकल्प लिया गया था. इसके जरिये गांववाले एकजुट होने लगे थे. जंगल बचाने के लिए बनी समिति कब आगे बढ़ते हुए गांव का विकास करने में जुट गयी, किसी को पता ही नहीं चला. गांव में वर्ष 1988 से हर गुरुवार को बैठक होती है. गांव में यह बदलाव आसान नहीं था. नशा गांव के लोगों की रग-रग में था. चुनाव के समय तो स्थिति और भी खराब हो जाती थी, क्योंकि इस समय अधिकतर लोग नशे की गिरफ्त में होते थे.

स्वागत करता साइनबोर्ड
आरा-केरम गांव में प्रवेश करते ही साइनबोर्ड आपका स्वागत करता है, जिस पर लिखा हुआ है मुस्कुराइये, आप झारखंड के नशामुक्त गांव आरा-केरम में हैं. इस गांव की साफ-सफाई और आबोहवा आपको चकित कर देगी. यहां झगड़ों का निपटारा गांव में ही किया जाता है. जब मामले नियंत्रण से बाहर हो जाते हैं, तभी लोग कोर्ट पहुंचते हैं. ग्राम सभा इतनी मजबूत है कि सारे फैसले गांववालों की मौजूदगी में लिए जाते हैं. गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क है, लेकिन उचित देखरेख के अभाव में कहीं-कहीं टूट गयी है.

शराबबंदी को मिला महिलाओं का साथ 
शराब की बुरी लत का सीधा असर महिलाओं पर पड़ रहा था. वो घरेलू हिंसा का शिकार हो रही थीं. छोटे बच्चे और युवा भी प्रभावित थे. गांव के लोगों की मानें, तो सालभर में ग्रामीण पंद्रह लाख से अधिक की शराब पी जाते थे. पर्व-त्योहार में तो लोग 15-15 दिन तक नशे में डूबे रहते थे. कुछ बुद्धिजीवियों ने गांव में शराबबंदी करने की ठानी. गांव की महिलाओं ने उनका साथ दिया. ग्राम सभा की बैठक में लोगों से शराब छोड़ने की अपील की गयी.शराब भट्ठियों को नष्ट किया गया. डर और जागरूकता का असर हुआ. धीरे-धीरे गांव में शराब बंद हो गयी. आज यह गांव पूरी तरह नशामुक्त है.

बदलाव का दौर : ग्रामीण गांव का विकास करना चाहते थे, लेकिन उनके पास कोई योजना नहीं थी. वर्ष 2015 में मनरेगा अायुक्त सिद्धार्थ त्रिपाठी गांव पहुंचे और मनरेगा की योजनाओं से गांव में विकास करने का खाका तैयार किया. हर खेत तक पानी पहुंचे, इसके लिए योजनाबद्ध तरीके से काम शुरू हुआ. नियमित ग्राम सभा की बैठकें होने लगीं. इसके बाद गांववाले विकास कार्यों से जुड़ते चले गये.

इस गांव के बच्चे सुबह चार बजे उठते हैं
आरा-केरम के दिन की शुरुआत भी आदर्श तरीके से होती है. बच्चे सुबह चार बजे उठ जाते हैं और पढ़ाई करते हैं. इन्हें स्कूल के अलावा ट्यूशन पढ़ाने के लिए गांव के ही दो स्नातक पास युवा हैं. एक घंटे की पढ़ाई के बाद बच्चे गांव की सड़क और मुहल्ले की सफाई करते हैं, फिर बच्चे स्कूल जाते हैं. यहां ड्रॉप आउट रेट जीरो है. गांव में घुसते ही सड़क के दोनों ओर पेड़ मिलेंगे, जो गांव की महिला समूहों द्वारा श्रमदान कर लगाया गया है. अलग-अलग महिला समूहों द्वारा कई जगहों पर बांस से निर्मित कूड़ेदान लगाये गये हैं. जमा होने वाले कूड़े से भविष्य में खाद और बिजली उत्पादन करने की योजना है. यहां गोबर गैस प्लांट भी लगाये जा रहे हैं, ताकि ऊर्जा की जरूरतों को पूरा किया जा सके.

रक्षाबंधन पर पेड़ों में बांधते हैं रक्षासूत्र : वर्ष 1992 में  महादेव महतो के समझाने के बाद ग्रामीण एकजुट हुए और सुनियोजित तरीके से  जंगलों की रखवाली में जुट गये. ग्रामीण बताते हैं कि जंगलों की रखवाली करने  में उन्हें काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा, आखिरकार मेहनत रंग लायी  और बड़े क्षेत्रफल में आज घने जंगल लहलहा रहे हैं. हर वर्ष 14 फरवरी को  जंगल में मेला लगता है. यहां रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाता है. ग्रामीण  पेड़ों की पूजा करते हैं और पेड़ में रक्षासूत्र बांधते हैं.

बिना संघर्ष के मुक्ति नहीं मिलती है : बाबूराम गोप
आरा गांव के ग्रामीण बाबूराम गोप कहते हैं कि बिना संघर्ष के मुक्ति नहीं मिलती है. गांववालों ने विकास के लिए संघर्ष किया, तब जाकर आज आरा और केरम गांव आदर्श बने हैं. नशाबंदी और जंगल बचाना इस गांव की सबसे बड़ी उपलब्धि है.कुछ लोगों ने गांव के विकास को प्रभावित करने का काफी प्रयास किया. इसके बाद भी एकजुटता के बल पर उन्होंने सभी बाधाएं पार कर ली. आज सभी ग्रामीण सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं. स्वरोजगार से जोड़ने के लिए इन्हें बकरी शेड, मुर्गी शेड और गाय शेड दिया जा रहा है. अब ग्रामीण धीरे-धीरे अच्छी जिंदगी जीने लगे हैं. बाबूराम ने कहा कि सीएफटी टीम के गौरव सिंह ने भी गांव के विकास में काफी सहयोग किया है.

ग्रामसभा की ताकत का नतीजा है आदर्श ग्राम : गोपाल राम बेदिया
गोपाल राम बेदिया कहते हैं कि आज गांव की सूरत बदल गयी है. पहले ऐसा नहीं था. वह गांव के विकास को लेकर खुद के पैसे से कोडरमा के सिमरकुंडी और खूंटी के गुफु गांव गये थे. वहां पर हो रहे बदलाव और विकास कार्यों को उन्होंने समझा. उनकी मेहनत और लगन को देखकर ही मनरेगा कमीश्नर सिद्ध्रार्थ त्रिपाठी उन्हें रालेगण सिद्धी और हिबरे बाजार ले गये, जहां उन्होंने समाजसेवी अन्ना हजारे से मुलाकात की थी. अन्ना हजारे ने कहा था कि गांव को आगे बढ़ाना है, तो पागल बनना पड़ेगा. लोग कुछ भी कहें, काम करते रहना होगा. इससे उन्हें काफी प्रेरणा मिली. आज गांव में हर महीने की एक और चौदह तारीख को श्रमदान से काम होता है. अब तक श्रमदान से गांव में लगभग ढाई लाख रुपये का काम हो चुका है.