gram savraj

  • Aug 21 2017 1:37PM

अब भी लाभकर नहीं किसान

अब भी लाभकर नहीं किसान

डॉ नवीन कुमार

भारत गांवों में बसता है. कृषि प्रधान देश के अधिकांश लोग आज भी कृषि पर आश्रित हैं. कृषि को लेकर शुरू से आज तक कई प्रयोग एवं क्रांति हुए. इसका कुछ क्षेत्र विशेष में फायदा भी हुआ. बावजूद इसके व्यापक पैमाने पर आज भी किसानों के चेहरे से खुशी गायब है. किसान हमारे देश में पूजे जाते हैं, इसके बाद भी स्थिति भयावह ही बनी हुई है. प्रेमचंद का एक उपन्यास है गोदान. इसमें कृषक जीवन की महागाथा का चित्रण हुआ है. इस उपन्यास में प्रेमचंद का पात्र होरी, जो इस उपन्यास का नायक है. एक सीमांत किसान है. 

उपन्यास के शुरू में होरी कहता है कि किसानों में जो मरजाद है, वो दुनिया के किसी चीज में नहीं. और यही होरी जब व्यवस्था से टकराते हुए चारो चित गिरता है और अपने ही खेत में मजदूरी करने को विवश हो जाता है, तब बहुत भावुक होकर कहता है कि मजदूरी करना पाप थोड़े ही ना है. ऐसे भी पहले हमारे यहां खेती का सबसे उन्नत माना जाता था. इस उपन्यास के नायक होरी के सिर्फ एक ही सपने होते हैं कि वो किसान क्या, जिसके दरवाजे पर एक गाय ना हो. पूरी जिंदगी एक गाय के जुगत में महाजनों की सूदखोरी में पड़ कर सब कुछ गवां बैठता है, लेकिन अपने दरवाजे पर एक गाय नहीं रख पाता है. ठीक है कि यह उपन्यास 1936 में लिखी गयी. 

आजादी के पहले की दास्तां है. किसानों की स्थिति का एक बड़ा ही मार्मिक वर्णन किया गया है. उस समय देश आजाद नहीं था, तो कृषि पर संकट के बादल मंडराते थे. लेकिन, अब ऐसा लगता है कि किसान ना आजादी के पहले लाभकर थे और ना ही आजादी के बाद. यही कारण है कि किसान अब खेती-किसानी छोड़ कर धीरे-धीरे दूसरे रोजगार की तलाश में लग गये. मूल रूप से आज भी ऐसा किसान परिवार, जो पूरी तरह से कृषि पर ही आश्रित हैं और उसके परिवार को होली-दशहरे जैसे प्रमुख त्योहारों पर भी नये कपड़े नसीब नहीं हैं. 

बचपन में हमलोग एक कविता पढ़ते थे. नहीं हुआ है अभी सवेरा, पूरब की लाली पहचान, चिड़ियों के जगने से पहले, खाट छोड़ उठ गया किसान, नहीं कभी त्योहार ना छुट्टी, है उसको आराम कहां. आज काफी समय गुजर गये ये सब देखते-देखते. आज बैलों की जगह टैक्टर ने ले लिया है. 

किसानों के चेहरों की झुरियां कम होने का नाम नहीं ले रहा. चालीस की उम्र में किसानों की साठ जैसे शरीर की बनावट हो गयी. आजादी के पहले भी किसान कर्ज के तले दबा रहता था और जमींदारी व महाजनी व्यवस्था का शिकार होता था तथा समाज की मरजाद को बनाये रखने के लिए कर्ज भी लेता था. तभी तो प्रेमचंद ने कहा था कि समाज की जरूरत गरीब लोगों के लिए होती है. अमीर लोग समाज को अपने पैरों तले रौंद कर चलते हैं.

आजादी के बाद भी आज भारत के कई एक राज्यों के किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हैं. हर रोज किसानों के लिए नये-नये नियम बन रहे हैं. कर्ज माफी हो रही है. फिर भी किसान इतने बड़े आत्मघाती कदम उठा रहे हैं. जिस देश का अन्नदाता खुश नहीं है, उस देश के लोगों को गंभीर चिंतन की आवश्यकता और जमीनी स्तर पर उनके दर्द को समझने की जरूरत है. आज कृषि पर संकट का ही दुष्परिणाम है कि किसानों के बच्चे-बच्चियां अच्छी शिक्षा नहीं ले पा रही है. गांव में बच्चियों से पूछो, तो साफ कहती है कि पढ़-लिख कर क्या होगा. बाद में चूल्हा-चौका ही तो करनी है. 

इन बच्चियों की बातों को सुन दंग भी रहता हूं और सोचने को मजबूर भी होता हूं. मुख्य शहर को छोड़ ग्रामीण परिवेश का जायजा लेने पर आज भी किसानों की स्थिति विकराल देखने को मिलती है. आर्थिक तंगी जीवन की सारी घटनाओं में रंग में भंग कर देती है. आज भी किसान अपनी गरीबी को ईश्वर की नियति मान कर जी रहे हैं. रबी फसल का घाटा-नफा जोड़ते हैं, तब तक खाद और बीजवाले उधार चुकता के लिए आ धमकते हैं. कभी-कभी तो हालत यहां तक बन आती है कि घर में बच्चियों की शादी के लिए रखे धन को भी कृषि कार्य में लगा देना पड़ता है. सिर्फ इस उम्मीद से कि अगला फसल तैयार हो जाने पर फसल बेच कर शादी की तैयारी कर ली जायेगी, तब तक फसल अतिवृष्टि या अनावृष्टि के चपेट में आ जाता है. ऐसी स्थिति में किसान अपनी बेटी के लिए मनचाहा वर की तलाश ना कर बाल विवाह या फिर किसी अधेड़ के साथ ब्याहने को मजबूर हो जाते हैं. 

वर्तमान में फसल बीमा का लाभ लेना पत्थर पर दूब जमाने जैसा है. कृषि पर संकट होने से गांव के सामाजिक बसावट पर अंतर आने लगता है. 

आज किसानी का विकल्प डेयरी होने लगा है. देखा जाता है कि किसानों के घर में दूध भले ही तिलक करने को नसीब नहीं होते हों, फिर भी कुछ पैसे पाने की चाहत में किसान दूध को लेकर डेयरी फार्म में चले जाते हैं. अब 70 साल होने को है. अब किसानों के हालात सुधारने और जमीनी हकीकत को टटोलने की जरूरत है. कृषि ऋण माफी भी कृषि समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. अगर सही रूप में किसानों को सहायता करनी है तो ऐसे तरीकों पर विशेष जोर दिया जाये, जिससे उनके खेतों में उपजे फसल को सही बाजार और कीमत मिल सके.

मेरा मानना है कि कर्ज देना या फिर उसे माफ कर देना, दोनों की कृषि समस्या का समाधान नहीं हो सकता है. अधिक जरूरी है इस तंत्र में सुधार की. केंद्र सरकार किसानों की आय दोगुनी करने की बात कह रही है, जो स्वागत योग्य कदम माना जा सकता है. साथ ही किसानों को अपनी फसल सीधे बेचने की सुविधा देने के लिए आदर्श किसान बाजार बनाने के साथ-साथ विलेज-नॉलेज सेंटर की गतिविधियों को बढ़ाने पर जोर देना होगा, तभी किसानों को खेती-किसानी के संकट से उबारा जा सकता है.  

(लेखक प्लस टू उच्च विद्यालय सुंदरपहाड़ी, गोड्डा के प्रभारी प्राचार्य हैं.)