gram savraj

  • May 10 2017 12:39PM

लाल विजय शाहदेव: अ जर्नी फ्रॉम हेसापीरी टू कांन्स

लाल विजय शाहदेव: अ जर्नी फ्रॉम हेसापीरी टू कांन्स

अपने पसंदीदा करियर को ऊंची उड़ान देने के लिए सिर्फ जुनून ही काफी नहीं. जूनून के साथ कार्य कुशलता और सीखने की ललक भी जरूरी है. जीवन में अवसर बार-बार नहीं मिलते. इसलिए मिले  अवसरों पर खुद को साबित करना भी महत्वपूर्ण है. यह कहना है लोहरदगा के छोटे-से गांव हेसापीरी से मायानगरी मुंबई और फिर कांन्स फिल्म फेस्टिवल, फ्रांस तक का सफर तय करनेवाले लाल विजय शाहदेव का.

वर्ष 2016 के कांन्स (फ्रांस) फिल्म फेस्टिवल में लाल विजय शाहदेव द्वारा निर्देशित और आकृति एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के बैनर तले बनी पहली लघु फिल्म “द साइलेंट स्टेचू” का चयन किया गया. इसकी काफी सराहना भी हुई. “द साइलेंट स्टेचू” मई से दर्शकों के लिए ऑनलाइन प्लेटफार्म पर भी उपलब्ध होगी.

कांन्स तक का सफर लाल विजय के लिए काफी संघर्षपूर्ण रहा है. बचपन में ही पिता का साया सिर से हट गया. मां ने तंगहाली में लालन-पालन किया. सातवीं कक्षा तक की पढ़ाई गांव के ही स्कूल में चटाई पर बैठ कर हुई. यहीं किशोर उम्र में ही अंगरेजों के जमाने के कैमरे से फोटोग्राफी शुरू कर कैमरामैन के रूप में करियर की शुरुआत की. 1992 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा, दिल्ली द्वारा आयोजित गहन नाट्य शिविर से प्रशिक्षण लेने के बाद झारखंड के आदिवासी बहुल क्षेत्र लोहरदगा में थिएटर ग्रुप ‘आकृति’ को स्थापित किया. स्थानीय प्रतिभाओं को ढूंढ़-ढूंढ़ कर कई बड़े नाटकों का सफल व्यावसायिक मंचन किया. इनमें चरणदास चोर, सइयां भये कोतवाल, अंधेर नगरी चौपट राजा, न्यू लाइट, थैंक यू मिस्टर ग्लैड जैसे नाटक शामिल थे. लाल विजय के निर्देशन का ही कमाल था कि पीवीआर के जमाने में भी दर्शक खिंचे चले आते थे. संस्था ने लाल विजय के लिखे कई लघु नाटकों का भी मंचन किया. इसमें कर्फ्यू, अपना पराया, आजादी के मतवाले लोगों के बीच काफी चर्चित हुए. कुछ वर्षों बाद उनके मन में अंतर्द्वंद्व शुरू हो गया. उन्हें लगा कि लोहरदगा में रह कर वह न तो अपनी प्रतिभा से न्याय कर पायेंगे और न ही जीवन में वह मुकाम हासिल नहीं कर पाएंगे, जिसका सपना उन्होंने देखा था. लाल विजय ने मुंबई का रुख किया. यह बड़ा निर्णय था. एक अनजाने शहर में आकर खुद को स्थापित करना संघर्षपूर्ण था. शुरुआती दौर में काम के लिए कई सारे निर्देशकों से मिलें. काफी जद्दोजहद के बाद कुछ सीरियल्स में एक्टिंग का मौका जरूर मिला, जो मायानगरी में स्थापित होने के लिए जरूरी था. और वह धीरे-धीरे अपनी मंजिल की तरफ कदम बढ़ा चुके थे.

टीवी इंडस्ट्री में वर्ष 2000 में उन्हें यूटीवी का पहला कास्टिंग डायरेक्टर बनने का गौरव हासिल हुआ. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. हिंदी माध्यम से पढ़ाई के कारण यूटीवी में काम करना मुश्किल था. वहां हर कोई अंगरेजी में बात करता था. यूटीवी के प्रोमोटर रूनी स्क्रीव्वाला और जरीना मेहता भी कभी हिंदी में बात नहीं करते थे. एक दिन जरीना ने लाल विजय को बुलाया, तो उन्हें लगा शायद यहां से उनका दाना-पानी उठनेवाला है. उन्होंने मीटिंग में जाने के बदले काम छोड़ने का ही विचार बना लिया. लेकिन, जरीना उनके काम से काफी खुश थीं और उन्होंने लाल विजय की सैलरी दोगुनी कर दी और अपने केबिन के पास की जगह भी दी. लाल विजय रूनी स्क्रीव्वाला के भी प्रिय हो गये. यूटीवी में ही शाहदेव ने अंगरेजी और कंप्यूटर सीखा. कास्टिंग डायरेक्टर से प्रोजेक्ट हेड तक का सफर तय किया. लाल विजय कहते हैं कि आज वह जो भी हैं, उसमें सबसे ज्यादा योगदान रूनी स्क्रीव्वाला और जरीना मेहता का है.

इसके बाद लाल विजय बीआर फिल्म्स, परसेप्ट पिक्चर, क्रिएटिव आई, मिडिटेक, फायर वर्क्स, शोभना देसाई प्रोडक्शंस और बिग सिनर्जी जैसे कई बड़े प्रोडक्शन हाउस में बतौर कास्टिंग डायरेक्टर, एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर, क्रिएटिव डायरेक्टर हेड ऑफ ऑपरेशन, प्रोजेक्ट हेड के रूप में काम किया. लेखक और निर्देशक के रूप में स्टार प्लस के टीवी सीरियल ‘कहता है दिल’, शरारत, भाभी, शाका लाका बूम बूम, शगुन, शन्नो की शादी, मायके से बंधी डोर, लाखों में एक, हमारी देवरानी, स्टार वन के लिए स्पेशल स्क्वॉड, फैमिली बिजनेस, परी हूं मैं, सोनी टीवी के लिए मन में है विश्वास, थोड़ी खुशी थोड़े गम, मां एक्सचेंज, जीटीवी के लिए ममता, घर की लक्ष्मी बेटियां, रियल टीवी के लिए निंजा पांडव जैसे प्रसिद्ध सीरियल में काम कर मुंबई टीवी इंडस्ट्री में अपनी धाक जमा ली. लाल विजय अब भी संतुष्ट नहीं थे. वह हमेशा से देश के ज्वलंत मुद्दों पर कार्यक्रम बनाना चाहते थे. करीब साल पहले उन्होंने आकृति एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड प्रोडक्शन हाउस बनाया. उन्हें निर्माता-निर्देशक के रूप में कई सारे सीरियल बनाने का मौका मिला. डीडी नेशनल के लिए उन्होंने भ्रूण हत्या के खिलाफ ‘ये शादी है या सौदा’ नामक चर्चित धारावाहिक बनाया, जिसे लोगों ने काफी पसंद किया. इमोशनल कॉमेडी ‘घंटेश्वर प्रसाद घंटेवाले’ लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ. समाज में लड़के और लड़कियों की समानता पर ‘बेटा भाग्य से बिटिया सौभाग्य से’ का प्रसारण 2016 में डीडी नेशनल के प्राइम टाइम में हुआ. ‘सलाम इंडिया’ नामक सीरियल प्रेरणादायक कहानियों पर आधारित है, जिसका प्रसारण डीडी किसान पर प्रत्येक गुरुवार और शुक्रवार को रात नौ बजे हो रहा है. लाल विजय कहते हैं कि मुंबई ने उन्हें बदल दिया. बड़े निर्देशकों से निर्देशन के गुर सीखे. जब कांन्स फिल्म फेस्टिवल में जाने का मौका मिला, तो समझ में आया कि इनसान कहीं भी पैदा हो, कहीं भी पले बढ़े, अगर वह काम के प्रति गंभीर है, तो उसे आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता. उन्होंने कहा कि मेरे लिए सबसे संतुष्टि की बात यह है कि जिन कलाकारों को कभी 1500 रुपये दैनिक पर काम कराया, आज वह बड़े स्टार हैं. लाल विजय कहते हैं कि मायानगरी का रुख सिर्फ इसलिए नहीं करना चाहिए कि किसी ने कह दिया कि आप बहुत खूबसूरत हैं. मुंबई में आगे बढ़ने का कोई फिक्स फार्मूला नहीं है. यहां आनेवाला सिर्फ एक्टिंग करने के बारे ही सोचता है, जबकि ऑफ स्क्रीन के काम में ज्यादा संभावनाएं हैं. लाल विजय तरक्की की ऊंचाई पर पहुंच कर अब अपनी जड़ों की तरफ लौट रहे हैं. फ्रांस पहुंचकर उन्हें मुंबई नहीं, अपना गांव हेसापिरी याद आ रहा था. आदिवासी लड़के याद आ रहे थे. खेल के मैदान याद आ रहे थे, जहां वह खेलते थे. मां याद आ रही थी, जिनकी तपस्या ने उन्हें कभी भी हार न मानने की शक्ति दी. लाल विजय झारखंड में भी काम कर रहे हैं. सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म ‘मनु का सरेंडर’ के री-प्रोडक्शन का काम चल रहा है. सितम्बर-अक्तूबर में इसी वर्ष रांची में शूटिंग होगी. इससे पहले मई में रांची और लोहरदगा में सलाम इंडिया की शूटिंग करेंगे. वह स्थानीय कलाकारों को भी प्रोत्साहित करने की बात कहते हैं. लाल विजय कहते हैं, खुद पर विश्वास रखें, संघर्ष करते रहें, मंजिल जरूर मिलेगी. 

बी-पॉजिटिव

विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in