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  • Jan 17 2020 6:52PM

मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के आदर्श ग्राम टकरा: सुनहरे अतीत से धुंधले वर्तमान को रोशन करने में जुटे ग्रामीण

मरांग गोमके जयपाल सिंह मुंडा के आदर्श ग्राम टकरा: सुनहरे अतीत से धुंधले वर्तमान को रोशन करने में जुटे ग्रामीण

पवन कुमार
जिला: खूंटी 

पक्की सड़क के किनारे ठूंठ पेड़ पर अंग्रेजी में लिखा हुआ है टकरा. यह मरांग गोमके स्वर्गीय जयपाल सिंह मुंडा का गांव है. जिस तरह से यह पेड़ ऊंचा और मोटा होते हुए भी ठूंठ हो गया, उसी तरह इस गांव की भी हालत है. गांव की जड़ें तो मजबूत हैं. सरकारी योजनाएं पहुंच रही हैं, लेकिन हरे-भरे पेड़ के बावजूद फलहीन हैं. ग्रामीण बताते हैं कि एक दौर था जब इस गांव ने देश को कई वीर सैनिक दिये. इस गांव के हर घर में वीर जवानों की गाथा सुनने को मिल जायेगी. यह वही गांव है जिसने देश को जयपाल सिंह मुंडा जैसा हॉकी खिलाड़ी दिया. इनकी कप्तानी में भारत ने 1928 के ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीता था. इसके साथ ही जयपाल सिंह मुंडा झारखंड आंदोलन के सबसे बड़े नेता थे. गांव की दशा को सुधारने के लिए सरकार ने गांव को आदर्श ग्राम घोषित किया. आदर्श ग्राम के तहत आधारभूत संरचनाओं का भी निर्माण कराया, पर उचित देखरेख के अभाव में इन संरचनाओं का सदुपयोग नहीं हो पा रहा है. ग्रामीण अभी भी मूलभूत सुविधाओं के लिए जूझ रहे हैं.

घर की दीवारें भर बाकी, समाधि स्थल का इंतजार

जयपाल सिंह मुंडा का घर आज खंडहर बन कर रह गया है. इनके परिवार वाले यहां नहीं रहते. जो गांव में रहे, वो आर्थिक रूप से इतने मजबूत नहीं थे कि जयपाल सिंह मुंडा के पैतृक आवास की सही तरीके से देखभाल कर सकें. उसकी मरम्मत करा सकें. रख-रखाव के अभाव में उनका पैतृक आवास ढह गया. अब सिर्फ दीवारें ही बाकी रह गयी हैं. हालांकि, उनके एक बेटे ने घर के बगल में ही एक नया मकान बनाया है. इशारे से टूटे हुए घर के एक कोने को दिखाते हुए गांव की एक महिला कहती हैं कि मरांग गोमके का कमरा इसी जगह पर था. वहीं समाधि स्थल की बात करें, तो जयपाल सिंह के लिए समाधि स्थल तक का निर्माण नहीं किया गया है. उनके ही परिवार से जुड़े जॉन कच्छप कहते हैं कि जयपाल सिंह मुंडा के पार्थिव शरीर को गांव के कब्रिस्तान में ही दफनाया गया था.

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आंगनबाड़ी में कम आते हैं बच्चे

टकरा गांव स्थित आंगनबाड़ी केंद्र में बच्चों की संख्या कम है. बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र तक लाने का प्रयास किया जाता है, लेकिन बच्चे नहीं आ पाते हैं. ग्रामीणों के मुताबिक, बच्चों को घर में ही खिचड़ी मिल जाती है. इस कारण आंगनबाड़ी केंद्र आने से परहेज करते हैं. आंगनबाड़ी सेविका जयामनि कच्छप बताती हैं कि अधिकतर ग्रामीण आंगनबाड़ी से जुड़ी योजनाओं का लाभ नहीं लेना चाहते हैं. उनमें जानकारी का अभाव है. कुछ ग्रामीण ऐसे भी हैं, जो योजनाओं का लाभ उठा रहे हैं.

पाइपलाइन से जलापूर्ति नाकाफी

आदर्श ग्राम बनने के बाद टकरा गांव में जलापूर्ति के लिए वाटर टैंक लगाया गया, जहां से पानी की आपूर्ति की जाती है. तीन साल पहले यह जलापूर्ति योजना शुरू हुई थी. फिलहाल 62 घरों में पानी की आपूर्ति की जाती है. ग्रामीण बताते हैं कि पानी की आपूर्ति सिर्फ नाम के लिए है. हर रोज घरों तक पानी नहीं पहुंचता है. नियमित रूप से जलापूर्ति नहीं होती है. इसके अलावा स्वच्छ पेयजल के लिए गांव में सौर ऊर्जा संचालित टैंक भी लगाये गये हैं.

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रात में गांव होता है रोशन

टकरा गांव की सड़कें रात में सोलर लाइट की दूधिया रोशनी से नहायी होती हैं. सोलर स्ट्रीट लाइट को लेकर गांव में अच्छा काम हुआ है. हर चौक-चौराहों पर सोलर लाइट लगायी गयी है. इसके कारण रात में ग्रामीणों को घूमने में परेशानी नहीं होती है. जंगली इलाका होने के कारण पहले बिजली नहीं होने से परेशानी होती थी, पर पर्याप्त संख्या में सोलर स्ट्रीट लाइट लग जाने से अब अंधेरे से मुक्ति मिल गयी है. गांव में बिजली की भी सुविधा है.

शिक्षा और स्वास्थ्य

आदर्श ग्राम होने के बावजूद टकरा गांव में बुनियादी शिक्षा का अभाव है. यहां संत पॉल उच्च प्राथमिक विद्यालय है. यहां भी बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं. शिक्षकों की कमी है. स्कूल के पास अपना खेल का मैदान नहीं है. पेयजल की समस्या है. स्कूल के शिक्षक की कमी होने के कारण बच्चे दूसरे स्कूलों में जा रहे हैं. स्कूल में 43 बच्चे-बच्चियां हैं. हर रोज उन्हें मिड डे मील मिलता है. स्वास्थ्य सुविधा बेहतर है. आयुष्मान भारत योजना के तहत गांव में स्वास्थ्य केंद्र बना हुआ है. केंद्र में एएनएम हर दिन आती हैं. ग्रामीणों को यहां से दवाइयां भी नि:शुल्क मिलती हैं.

अधूरा है शौचालय निर्माण

टकरा गांव में खुले में शौचमुक्त गांव लिखा बोर्ड आपका स्वागत करता है. हालांकि, गांव की स्थिति इसके ठीक विपरीत है. गांव में शौचालयों की स्थिति पूरी कहानी खुद-ब खुद बयां करती है. अधिकतर शौचालयों का निर्माण कार्य अधूरा है. इसके कारण ग्रामीण खुले में शौच करने के लिए मजबूर हैं. कुछ ग्रामीण ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने पैसे से शौैचालय का निर्माण कराया है.

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सिर्फ बच्चियां खेलती हैं हॉकी

जिस टकरा गांव ने देश को हॉकी ओलंपिक में पहला स्वर्ण पदक दिलाने वाला कप्तान दिया, उस गांव में हॉकी आज सिर्फ बच्चियों तक ही सिमट कर रह गयी है. सुनील होरो की मदद से गांव की 40 बच्चियां गांव में ही हॉकी का अभ्यास करती हैं. उन्हें खेल के उपयोगी सामान सुनील होरो ही मुहैया कराते हैं. गांव के ही मैदान में बच्चियां खेलती हैं. जयपाल सिंह मुंडा के बाद गांव से कोई भी बड़ा खिलाड़ी उभरकर सामने नहीं आया.

शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत : महानंद जुनैल कच्छप

गांव के शिक्षक महानंद जुनैल कच्छप कहते हैं कि आदर्श ग्राम घोषित करने के बाद भी टकरा में जिस तरह की शिक्षा व्यवस्था होनी चाहिए, वैसी नहीं है. आगे की पढ़ाई के लिए बच्चों को गांव से बाहर जाना पड़ता है. जो सक्षम हैं, वो निजी स्कूलों में जाते हैं. एक स्कूल है भी, तो भवन की कमी है. इसके साथ ही शिक्षकों की भी कमी है.

कला भवन का इस्तेमाल महिलाएं कर रही हैं : सालोमी तिर्की

गांव की महिला सालोमी तिर्की बताती हैं कि टकरा का जब आदर्श गांव के लिए चयन हुआ, तो कई सारी उम्मीदें बंधी थीं. धीरे-धीरे ये उम्मीदें धुंधली पड़ती गयीं. जो भी संरचनाएं बनीं, वो देखभाल के अभाव में अनुपयोगी हैं. कला भवन की भी उचित देखभाल नहीं हो रही है. अब तो गांव की महिलाएं यहां पर लाह की चूड़ी बनाने का काम करती हैं.

ग्रामीणों में जागरूकता का अभाव है : जॉन कच्छप

जॉन कच्छप जयपाल सिंह मुंडा के परिवार से ही आते हैं. उन्होंने बताया कि गांव में सरकारी योजनाओं का लाभ ग्रामीण उठा रहे हैं, लेकिन जिस दिशा में योजनाएं धरातल पर उतरनी चाहिए, वैसी स्थिति नहीं है. इसके लिए ग्रामीणों में जागरूकता भी बहुत जरूरी है.