gram savraj

  • Nov 20 2018 9:50AM

बांस की टोकरी बना कर करते हैं गुजारा, नयी पीढ़ी इस पेशे से दूर

बांस की टोकरी बना कर करते हैं गुजारा, नयी पीढ़ी इस पेशे से दूर

पंचायतनामा डेस्क

 

पंचायत : पतरातू
प्रखंड : चान्हो
जिला : रांची

रांची जिला अंतर्गत चान्हो प्रखंड की पतरातू पंचायत का एक गांव है पतरातू. इस गांव में बने घरों को देख कर लगता है कि गांव काफी पुराना और समृद्ध है. गांव की 100 फीसदी आबादी कृषि पर निर्भर है. गांव में ही एक टोला है, पूरब टोली. पूरब टोली में महली जाति के 25 परिवार रहते हैं. बांस खरीद कर लाना और उसका सामान बनाना इन परिवारों की आजीविका का साधन है. अधिक से अधिक बांस के सामान बना सकें, इसलिए परिवार के सदस्य अहले सुबह ही काम में लग जाते हैं. बांस का सामान बनाकर सभी परिवार अपना गुजर-बसर कर रहे हैं. इस टोले में घुसते ही बहुत सारे लोग बांस के सामान घर के बाहर बनाते हुए दिखते हैं. एक जगह ही बैठ कर लोग दिनभर काम करते रहते हैं. सभी परिवार सिर्फ बांस से बननेवाली पारंपरिक चीजें ही बनाते हैं. इनका मानना है कि अगर इन्हें प्रशिक्षण दिया जाये और बाजार उपलब्ध हो, तो वे बांस से और भी बेहतरीन चीजें बना सकते हैं.

एक दिन में बनती है 25 टोकरी
बांस की टोकरी बना रहे ग्रामीण बताते हैं कि दिनभर में लगभग 25 टोकरी बन जाती है, लेकिन इसे बनाने में काफी मेहनत लगती है. सुबह चार बजे उठ कर काम में लगना पड़ता है. दो लोग दिनभर काम करते हैं, तब जाकर 25 टोकरी बन पाती है, नहीं तो मात्र 15-16 टोकरी ही वे बना पाते हैं. एक टोकरी के पंद्रह रुपये से अधिक नहीं मिलते हैं. काम कर रहे लोग बताते हैं कि अगर बांस को काट कर छोटे-छोटे टुकड़ों में पहले से रखते हैं, तो टोकरी बनाने में अधिक देर नहीं लगती है. बांस लाने के लिए 8-10 किलोमीटर दूर जाना होता है. एक बांस खरीदने में 60 रुपये की लागत आती है और उससे 25 टोकरी बनती है.

घर से ही बिक जाती है सब्जी की टोकरी
सबसे अधिक मांग सब्जी टोकरी की होती है. यहां से सब्जी की टोकरी स्थानीय बाजारों में जाती है, जहां से उन टोकरियों में सब्जी भर कर बाहर के बाजारों में भेजा जाता है. महली टोली के परिवार ज्यादातर सब्जी की टोकरी बनाते हैं. हर रोज लगभग 150-200 टोकरी गांव से बाहर भेजी जाती है. टोकरी बिकने के बाद सभी को पैसे दिये जाते हैं. इसके अलावा घर में आकर भी कुछ लोग टोकरी खरीद कर ले जाते हैं. दुर्गापूजा, छठ और दीपावली के त्योहार में ज्यादा कमाई होती है. कुछ लोग अपने सामान लेकर रांची भी आते हैं और बेचते हैं.

अब नयी पीढ़ी नहीं करना चाहती है यह काम
बांस से सामान बनाने में काफी मेहनत है. सुबह से लेकर शाम तक एक ही जगह पर बैठ कर काम करना पड़ता है. इसके बावजूद मेहनत की तुलना में उतने पैसे नहीं मिल पाते हैं. इस कारण अब युवा पीढ़ी इस काम से दूर भाग रही है. स्थानीय युवकों का कहना है कि पारंपरिक इस्तेमाल की चीजें वो नहीं बनाना चाहते हैं. अगर उन्हें प्रशिक्षण दिया जाये और बाजार उपलब्ध कराया जाये, तो वे नयी और बेहतर चीजें बना सकते हैं. उनका मानना है कि आधुनिकता के साथ आगे बढ़ कर ही इस पेशे में वे आगे बढ़ सकते हैं. पूरब टोली में बांस के कारीगरों का एक समूह भी बना था, लेकिन अब वो खत्म हो गया है.

अपने बच्चों को इस पेशे में नहीं लाना चाहते हैं : राजेंद्र महली
बांस से टोकरी बनाकर परिवार चला रहे राजेंद्र महली कहते हैं कि लोग नहीं चाहते कि उनके बच्चे इस पेशे में आयें. इसलिए सभी अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा देते हैं. सुबह चार बजे से लेकर शाम तक काम करना पड़ता है. इसके अलावा खेती भी करते हैं. अगर सरकारी मदद मिले, तो यह काम आगे चलता रहेगा, वरना वो दिन दूर नहीं, जब पर्व-त्योहार में बांस के बने सामान देखने के लिए भी नहीं मिलेंगे. उन्होंने बताया कि एक माह का प्रशिक्षण लोगों को दिया जा रहा था, लेकिन वो प्रशिक्षण भी पूरा नहीं हुआ.

दूसरे की मजदूरी करने से बेहतर है खुद का काम करना : कपूर देवी
कपूर देवी बताती हैं कि भले ही यह मेहनत वाला काम है, लेकिन घर में बैठ कर करना बेहतर है. इससे बाहर जाकर काम करने से मुक्ति मिलती है और आने-जाने का खर्च भी बच जाता है. दूसरों के यहां काम करने से पैसे भी अधिक नहीं मिलते हैं और समय भी पूरा देना पड़ता है. कहती हैं कि ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं कि बेहतर काम कर पायें, इसलिए यह काम उन्हें अच्छा लगता है.

घर में हैं तो काम कर लेते हैं : तिशोर देवी
तिशोर देवी काफी वृद्ध हो चुकी हैं. इसके बावजूद वो बांस से टोकरी बनाने का काम करती हैं. पूछने पर कहती हैं कि घर में बैठे-बैठे मन नहीं लगता है, तो काम कर लेते हैं. एक दिन में 10 टोकरी बन जाती है. उन्हें समाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ भी नहीं मिला है, जिसका उन्हें आज भी मलाल है.