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  • Jun 13 2019 3:38PM

साहसिक बनने की प्रेरणा देता फिरकल नृत्य

साहसिक बनने की प्रेरणा देता फिरकल नृत्य

बीरेंद्र कुमार सिंह
पूर्वी सिंहभूम

कोल्हान क्षेत्र में बसी विभिन्न जनजातियों में एक भूमिज समुदाय की जनजाति है. सभी समुदाय व जातियों की अपनी-अपनी भाषा व संस्कृति है. भूमिज समुदाय का अपना नृत्य भी है, जिसे फिरकल नृत्य के नाम से जाना जाता है. यह मकर संक्रांति के दूसरे दिन आखन यात्रा यानी शुभ यात्रा के रूप में मनाया जाता है. हर साल पारंपरिक व सांस्कृतिक नियमानुसार शिकार के लिए प्रस्थान करते हैं, जिसे सेंदरा भी कहा जाता है. शिकार के लिए प्रस्थान करने से पहले अपने इष्ट देवता की पूजा-अर्चना करते हैं, ताकि शिकार के दौरान उन्हें किसी प्रकार की हानि या कोई दुर्घटना न हो. अपने हाथों में ढाल, तलवार, तीर-धनुष, भाला आदि के साथ ढोल, नागरा, चर्चरी, वाद्य यंत्र के सहारे गीत-संगीत के साथ शिकार करने की युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते हैं, जो इनकी फिरकल परंपरा को दर्शाता है. नृत्य दल में 15 से 20 सदस्य होते हैं. फिरकल को वीर रस का नृत्य भी कहा जाता है.

फिरकल नृत्य की ऐसे हुई उत्पत्ति
पहले आदिम जनजाति के लोग जंगलों में रहते थे. तब भाषा का विकास नहीं हुआ था. अपनी अभिव्यक्ति को दर्शाने व आपस में बातचीत शारीरिक संकेत के आधार पर ही करते थे. ये लोग कहीं भी समूह में रहते थे. कपड़े के बदले शाल वृक्ष के खाल एवं पत्तों से अपने अंग को ढंकते थे. हथियार के रूप में पत्थर एवं लकड़ी का औजार उपयोग में लाते थे. जीवन-यापन के लिए शिकार करना ही इनका मुख्य पेश था. दिनभर जंगल में विचरण के बाद शाम को महिला-पुरुष अपने समूह में लौटने के बाद आपस में चर्चा करते थे. यह चर्चा वे अपने शारीरिक अंग को हिला कर ही करते थे. यह उनकी एक तरह से शारीरिक भाषा होती थी. आगे चलकर एक-दूसरे से बात करने का शारीरिक संकेत का तरीका ही फिरकल नृत्य के रूप में चर्चित हो गया. फिरकल का मुख्य रूप से युद्ध नृत्य प्रसिद्ध है. फिरकल नृत्य का मुख्य वाद्य यंत्र चर्चरी, नागरा, घंटी, सिंघा एवं झुनझुना होता है. जंगली जनजीवन पर आधारित छाप इनकी पोशाक होती है. इसके अलावा धोती, गंजी एवं पगड़ी का भी ये उपयोग करते हैं. नृत्य में ढाल, तलवार व तीर का उपयोग करते हैं.

झारखंड स्थापना दिवस में मिला पहला स्थान
पूर्वी सिंहभूम जिला अंतर्गत पोटका प्रखंड के जानमडीह में वीर आदिम खेरवार समिति है. इसके सचिव रघु सरदार हैं. यहां फिरकल नृत्य में लोग काफी अभिरुचि रखते हैं. आदिम खेरवार समिति के द्वारा यहां फिरकल नृत्य का प्रशिक्षण दिया जाता है. 15 से 20 सदस्यों की एक टीम होती है. यहां पर सुभाष सरदार व रघु सरदार लोगों को प्रशिक्षण भी देते हैं. आख्यान यात्रा के दिन, माघ पूजा एवं ग्रामीण सांस्कृतिक कार्यक्रम में फिरकल नृत्य का विशेष रूप से प्रयोग होता है. जमशेदपुर स्थित गोपाल मैदान में झारखंड के प्रथम स्थापना दिवस का आयोजन वर्ष 2001 में किया गया था. फिरकल नृत्य ने लोगों का मन मोहते हुए पहला स्थान प्राप्त किया था. अंतरराष्ट्रीय व्यापार मेला दिल्ली, उज्जैन, ओडिशा, छत्तीसगढ़, गोवा, हरियाणा के अलावा देश के कई राज्यों में फिरकल नृत्य का प्रदर्शन किया गया है.

सरकार से मिले सहयोग, तो यह और आगे बढ़ेगा : रघु सरदार
फिरकल नृत्य के विशेषज्ञ रघु सरदार कहते हैं कि यह उन्हें विरासत में मिला है. दादा व पिताजी भी इस नृत्य से जुड़े थे. इस कारण मेरा भी लगाव इस नृत्य से हो गया. इस नृत्य में युद्ध कला का प्रदर्शन होता है, लेकिन कुछ टीस है, जो आज भी बरकरार है. कहते हैं कि सरकार द्वारा पर्याप्त सुविधा नहीं मिलती है. अगर सरकारी सुविधा मिले, तो फिरकल कला को और आगे बढ़ाया जा सकता है.

लुप्त होते फिरकल नृत्य को बचाने की जरूरत : सुभाष सरदार
जानमडीह निवासी सुभाष सरदार भूमिज भाषा के शिक्षक के साथ-साथ फिरकल नृत्य के विशेषज्ञ भी हैं. कहते हैं कि फिरकल नृत्य हमें साहसी बनने की प्रेरणा देता है. यह पारंपरिक नृत्य है. इसे हमलोग लुप्त होने से बचा सकते हैं, हालांकि आज की युवा पीढ़ी पाश्चात्य संस्कृति को बढ़-चढ़ कर अपना रही है. इसके बावजूद भूमिज गांवों में फिरकल नृत्य को काफी सराहा जाता है.