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  • Jan 17 2019 6:41PM

आदिवासी समाज की बेटियां अपनी जिद से खींच रही हैं बदलाव की मोटी लकीर

आदिवासी समाज की बेटियां अपनी जिद से खींच रही हैं बदलाव की मोटी लकीर

गुरुस्वरूप मिश्रा

बिटिया. माई-बाबू की लाडली. घर-आंगन की शोभा. मां, बहन, पत्नी समेत और भी बहुत कुछ. रिश्तों के तानाबाना के बीच अहम किरदार हैं बेटियां. वक्त के साथ सोच बदली है. मान्यताएं बदली हैं. बोझ बनने वाली बेटियां अब अभिमान बन गयी हैं. मेरी बेटी, मेरा अभिमान बदलते दौर की सच्चाई है, लेकिन कड़वा सच ये कि आज भी भ्रूण हत्या, बाल श्रम, बाल तस्करी, बाल शोषण-उत्पीड़न, बाल विवाह, दहेज हत्या एवं बेइंतहा जुल्म की शिकार हो रही हैं बेटियां. ऐसे में प्रकृति के पुजारी आदिवासियों का समाज बेटियों के मामले में देश का मॉडल है. जहां न दहेज का दानव है. न भ्रूण हत्या. जहां बेटियां बोझ नहीं, अभिमान होती हैं. खुले दिल से बेटियों का स्वागत होता है. देश आज भी बिटिया को लेकर आदिवासी समाज से काफी कुछ सीख सकता है. झारखंड की आदिवासी बेटियां हर क्षेत्र में जिद से बदलाव की मोटी लकीर खींच रही हैं. साबित कर रही हैं कि वे छोटे गांव से जरूर हैं, लेकिन प्रतिभा में किसी को भी मात देने का माद्दा रखती हैं

1. उड़नपरी : गोल्डन गर्ल्स रच रहीं इतिहास
फ्लोरेंस बारला (18 वर्ष) और आशा किरण बारला (13 वर्ष). ये दोनों आदिवासी बेटियां सगी बहन हैं. रोजलिया आइंद की ये बेटियां देश की गौरव हैं. सादगी ऐसी कि इन गोल्डन गर्ल्स को देख आप इनकी सफलता पर यकीन नहीं कर पायेंगे. ये उड़नपरी हैं. दौड़ती नहीं, उड़ती हैं. ये सीसीएल की लाडली हैं. झारखंड स्टेट स्पोर्ट्स प्रोमोशन सोसाइटी (जेएसएसपीएस) इनकी जिंदगी बदल रही है. गांव की गलियों में दौड़ने वाली ये भोली-भाली बेटियां अब देश के लिए सोना जीत रही हैं. आगे भी बेहतर प्रदर्शन कर देश का नाम रोशन करने की इनकी तमन्ना है.

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ओलंपिक 2020 में फ्लोरेंस का हुआ चयन
गुमला जिले के कामडारा प्रखंड की रेंडवा पंचायत के नावाडीह की ये दोनों बेटियां गोल्ड मेडल जीत चुकी हैं. रांची में 11वीं में पढ़ाई कर रहीं फ्लोरेंस (400 मीटर दौड़) का चयन ओलंपिक 2020 के लिए हुआ है. वह ओलंपिक एथलीट हेमा दास के साथ एनएसएनआइएस (पटियाला) में ट्रेनिंग ले रही हैं. वर्ष 2018 में 34वें जूनियर नेशनल चैंपियनशिप (रांची) में 400 मीटर दौड़ (56:09 सेकेंड) में स्वर्ण पदक जीत चुकी हैं.

झारखंड की पीटी ऊषा बनना चाहती है आशा
रांची में छठी कक्षा में पढ़ रहीं आशा 600 मीटर दौड़ में देशभर में अव्वल हैं. लगातार अपना ही रिकॉर्ड तोड़ रही हैं. विशाखापत्तनम में नेशनल इंटर डिस्ट्रिक्ट मीट (एनआईडीएम)-2017 में (01:42 मिनट) के साथ गोल्ड मेडल, तिरूपति में नेशनल इंटर डिस्ट्रिक्ट मीट (एनआइडीएम)- 2018 में (01:38 मिनट) के साथ गोल्ड मेडल और रांची के खेलगांव में आयोजित 34वें जूनियर नेशनल एथलेटिक्स चैंपियनशिप- 2018 में (01:34 मिनट) के साथ गोल्ड मेडल लाकर आशा ने इतिहास रचा है. आशा कहती हैं कि वह झारखंड की पीटी ऊषा बनना चाहती हैं. उनके सपनों को उड़ान देने के लिए जेएसएसपीएस के प्रति आभार प्रकट करती हैं. जेएसएसपीएस के कैप्टन संजय घोष व आशु भाटिया बताते हैं कि दोनों बेटियों की खेल प्रतिभा देख सीसीएल उन्हें सभी सुविधाएं मुहैया कराकर तरास रही है. दोनों बहनों का कोई जोड़ नहीं है.

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2. ओडिसी डांसर : छोटे गांव की बड़ी प्रतिभा
युक्ति प्रिया उरांव. उम्र महज 15 वर्ष. छोटी उम्र, बड़ी प्रतिभा. यह आदिवासी बेटी कई कलाओं में माहिर है. वह डांस करती हैं. ब्लैक बेल्टर भी हैं. पेंटिंग व फोटोग्राफी की भी शौकीन हैं. मां अंजू उरांव के ओडिसी नृत्य के सपनों को पूरा कर रहीं युक्ति पांच वर्ष की उम्र से ही खेलगांव के झारखंड कला मंदिर में प्रशिक्षक सबिता मिश्रा से ओडिसी नृत्य सीख रही हैं. वर्ष 2011 में रांची में आयोजित बसंतोत्सव में प्रथम स्थान पर रहीं. वर्ष 2016 में भुवनेश्वर में आयोजित ओडिसी इंटरनेशनल और रांची के राष्ट्रीय खादी एवं सरस महोत्सव में अपनी नृत्य प्रतिभा दिखा चुकी हैं. रांची में दसवीं कक्षा में पढ़ रहीं युक्ति लोहरदगा जिले के सेन्हा प्रखंड अंतर्गत अरू गांव की हैं. वह ओडिसी नृत्य में देश का नाम रोशन करना चाहती हैं.

3. बाल पत्रकार : बालिका वधू बनने से बचा लिया
रानी टुडू और मति मंडी. ये आदिवासी बेटियां देखने में बिल्कुल सामान्य हैं. छोटी सी उम्र है, लेकिन इनके हौसले बुलंद हैं. बाल पत्रकार हैं. समाज में बदलाव की मोटी लकीर खींच रही हैं. पूर्वी सिंहभूम जिले के चाकुलिया प्रखंड के राजकीय मध्य विद्यालय, मुटूरखाम में पढ़ रही हैं. सामान्य बेटियों की तरह ये सिर्फ पढ़ ही नहीं रही हैं, बल्कि बाल पत्रकार की सामाजिक जिम्मेदारी भी निभा रही हैं. इनके हौसले को सलाम कीजिए. इनकी सजगता से सहेली काजल (काल्पनिक नाम) बालिका वधू बनने से बच गयी.

राजकीय मध्य विद्यालय, मुटूरखाम में सातवीं कक्षा में पढ़ रही काजल आज खुश है. उसके चेहरे पर मुस्कुराहट है. पढ़ कर आगे बढ़ना चाहती है. काजल की जिंदगी बदली है, तो इसकी वजह हैं बाल पत्रकार रानी टुडू और मति मंडी. सही वक्त पर इन दोनों बेटियों ने काजल का साथ नहीं दिया होता, तो वह बालिका वधू बन गयी होती. कम उम्र में शादी से न तो वह पढ़ पाती और न आगे बढ़ पाती. उसकी जिंदगी बर्बाद हो गयी होती.

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पिता काजल की शादी करने पर तूले थे. दादाजी, मां समेत घर के लोग भी राजी थे. दुखी थी तो सिर्फ काजल. एक दिन काजल के चेहरे पर उदासी देख स्कूल की सहेलियों ने जब इसका कारण पूछा, तो उसका जवाब सुन सभी दंग रह गये. काजल बोली कि पापा मेरी शादी करा रहे हैं, लेकिन मैं पढ़ना चाहती हूं.

बाल विवाह पर तत्काल रोक को लेकर गंभीरता दिखाते हुए बाल पत्रकार रानी और मति ने अपने स्कूल के प्रधानाध्यापक, शिक्षक और संकुल संसाधन सेवी के साथ काजल के घर पहुंच कर घर वालों को पहले समझाया. बाल विवाह निषेध अधिनियम का हवाला देकर कानूनी भय भी दिखाया. आखिरकार प्रयास रंग लाया. बाल विवाह रुक गया. काजल के दादाजी ने कहा कि अब किसी कीमत पर काजल की शादी नहीं होने देंगे. वह अभी पढ़ेगी. पढ़ाई के बाद ही उसकी विदाई होगी.

यूनिसेफ (झारखंड) की प्रमुख डॉ मधुलिका जोनाथन कहती हैं कि बाल पत्रकार कार्यक्रम के तहत तैयार की गयी लड़कियां बाल पत्रकार के रूप में बड़ा बदलाव ला रही हैं