gram savraj

  • Sep 4 2018 4:53PM

फुटबॉल से आदिवासी बेटियों की जिंदगी संवार रहे आनंद-हीरालाल

फुटबॉल से आदिवासी बेटियों की जिंदगी संवार रहे आनंद-हीरालाल

 पंचायतनामा डेस्क

प्रखंड : कांके
जिला : रांची

फुटबॉल महज खेल नहीं है. इससे गांव की तस्वीर भी बदल सकती है. बेटियों की जिंदगी संवर सकती है. आप शायद यकीन नहीं करेंगे, लेकिन आनंद प्रसाद गोप और हीरालाल महतो ने अपने हौसले से इसे साबित कर दिखाया है. रांची जिले के कांके प्रखंड की हुंदूर पंचायत के चारी हुजीर से इन्होंने पांच वर्ष पूर्व इस बदलाव की शुरुआत की थी. आज आठ पंचायतों में फुटबॉल से ये आदिवासी बेटियों की जिंदगी संवार रहे हैं. इससे न सिर्फ बाल श्रम एवं कम उम्र में शादी पर ब्रेक लगा, बल्कि खेल से गांव की बेटियां देश-दुनिया भी देख रही हैं.

आदिवासी बेटियों में बढ़ा फुटबॉल का क्रेज
सोनी कच्छप, अंशु कच्छप, रजनी टोप्पो, शीतल टोप्पो, प्रियंका कच्छप, अनीता कुमारी, नेहा कुमारी, नीता कुमारी, टिंकी कुमारी एवं फूल कुमारी समेत करीब चार सौ आदिवासी बेटियां फुटबॉल खेल रही हैं. ये कांके प्रखंड के आदिवासी बहुल इलाके की हैं. जहां गरीबी के कारण बाल श्रम करने की मजबूरी होती थी और कम उम्र में ही उनका विवाह कर दिया जाता था, लेकिन आनंद व हीरालाल की पहल का असर हुआ कि ग्रामीण जागरूक हुए और बाल श्रम व कम उम्र में शादी पर ब्रेक लगने लगा. अब बेटियां खेल रही हैं. पढ़ रही हैं.

आसान नहीं था लड़कियों को खेल के लिए प्रेरित करना
ओरमांझी के हुटुप के रहनेवाले आनंद प्रसाद गोप इंटरमीडिएट पास हैं. जिला स्तर पर फुटबॉल खेल चुके हैं. एक वक्त था जब गरीबी के कारण उन्हें कैंटीन में काम करना पड़ा था, लेकिन फुटबॉल का जुनून कायम था. गांव के ही साथी हीरालाल महतो ने इनका साथ दिया. वर्ष 2013 में कांके के चारी हुजीर से इसकी शुरुआत हुई. आनंद बताते हैं कि लड़कियों को फुटबॉल खेलने के लिए घर से बाहर निकालना आसान नहीं था. काफी मशक्कत के बाद ग्रामीण जागरूक हुए और 15 लड़कियों से खेल की शुरुआत हुई. पैसे भी नहीं थे. लिहाजा खुद की कमाई से कीट वगैरह की व्यवस्था की गयी. वर्ष 2014 में ऑस्कर फाउंडेशन का साथ मिला. एजुकेशन विद ए किक की सोच से बड़ा बदलाव आया. ग्रामीणों को लगने लगा कि उनकी बेटियां फुटबॉल खेल कर अच्छा कर सकती हैं.

रंग लायी मेहनत
पांच साल की मेहनत रंग लायी. फुटबॉल की नर्सरी तैयार हो गयी. आज आठ पंचायतों (हुंदूर, कुचू, सदमा, सुगनू, मेसरा, चुटू, इरबा एवं चंदवे) के 25 गांवों में 21 टीमें हैं. इसमें साढ़े छह सौ (400 लड़कियां, 250 लड़के) खिलाड़ी हैं. इनमें 15 यंग लीडर (कोच) हैं. चार लड़के एवं 11 लड़कियां हैं. रवींद्र कुमार साहू जैसे यंग लीडर खिलाड़ियों को तैयार कर रहे हैं.

दिखा चुकी हैं फुटबॉल प्रतिभा
महाराष्ट्र में स्लम सॉकर नेशनल टूर्नामेंट, यूपी में 35वें भारतीय महिला फुटबॉल फेडरेशन कप, खेलो इंडिया, 63वीं राष्ट्रीय स्कूल फुटबॉल चैंपियनशिप (2017-18), खेलगांव में आयोजित सीएपीएफ अंडर-19 फुटबॉल टैलेंट हंट टूर्नामेंट समेत अंडमान-निकोबार, झारखंड, बिहार, यूपी, ओड़िशा, मुंबई, पश्चिम बंगाल समेत विभिन्न राज्यों में मैच खेल चुकी हैं. रूस में आयोजित फुटबॉल टूर्नामेंट खेल चुकी हैं. अक्तूबर में इंग्लैंड में आयोजित होनेवाले किक लाइक ए गर्ल टूर फुटबॉल टूर्नामेंट में सात लड़कियां खेलेंगी. कई मेडल व प्रशस्ति पत्र इसके गवाह हैं.

मौका मिले, तो बेहतर प्रदर्शन करेंगे खिलाड़ी : आनंद प्रसाद गोप
आनंद प्रसाद गोप कहते हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी फुटबॉल के जरिये उन्होंने बदलाव लाने की कोशिश की है. सरकार का साथ मिले यानी खेलने का मौका व सुविधाएं उपलब्ध करायी जाएं, तो खिलाड़ी झारखंड का नाम रौशन करेंगे.

क्षमता के बाद भी उपेक्षित हैं खिलाड़ी : हीरालाल महतो
हीरालाल महतो कहते हैं कि उनके खिलाड़ियों में क्षमता है, लेकिन उन्हें मौका नहीं दिया जाता है. इस कारण उपेक्षित रह जा रहे हैं. फुटबॉल के क्षेत्र में उनके खिलाड़ी झारखंड का नाम ऊंचा कर सकते हैं.