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  • Aug 18 2018 9:44AM

वन सुरक्षा समिति के संघर्ष से लहलहा रहे हैं जंगल

वन सुरक्षा समिति के संघर्ष से लहलहा रहे हैं जंगल

 पवन कुमार

पंचायत : उमेडंडा
प्रखंड : बुढ़मू
जिला : रांची 

राजधानी रांची से लगभग 45 किलोमीटर दूर बुढ़मू प्रखंड में घने जंगलों के बीच स्थित है उमेडंडा गांव. प्रकृति ने उमेडंडा पंचायत को असीम खूबसूरती दी है और यहां के जंगल इसकी खूबसूरती में चार चांद लगाते हैं. इस पंचायत में कुल पांच राजस्व गांव हैं, पर सबसे ज्यादा वन क्षेत्र उमेडंडा गांव के हिस्से आता है. पंचायत के एक छोर से रामगढ़ जिले की सीमा शुरू होती है. दूसरी ओर सारले पंचायत की सीमा है. सिर्फ उमेडंडा गांव के 1700 एकड़ में घने जंगल हैं. पेड़ की कटाई रोकने के बाद जंगल और घना होता जा रहा है. जंगल में साल, केंद, बेल, पियर, पिठोर, आंवला, हर्रा, बहेड़ा समेत अन्य जंगली पेड़-पौधे और जड़ी-बूटियां पायी जाती हैं. जंगल में मोर, बंदर जैसे पशु-पक्षी भी पाये जाते हैं. पंचायत के दूसरे गांव एरूद में 200 एकड़ और चलनिया के 150 एकड़ में वन क्षेत्र है, लेकिन उन गांवों में जंगलों को बचाने के लिए कोई काम नहीं हो रहा है.

एक दशक पहले हुई शुरुआत
साल 2005 में इस गांव में वन सुरक्षा समिति का गठन हुआ. इसके बाद जंगलों को बचाने पर जोर दिया गया. उस समय से उमेडंडा में वन को बचाने और उसकी देखरेख करने के लिए वन सुरक्षा समिति का गठन किया गया था. साल 2005 से पहले यहां के जंगल को देख कर ऐसा लगता था कि वो अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं. गांव से सटे जंगल के बड़े हिस्से में एक भी बड़े पेड़ नहीं बचे थे. सिर्फ झाड़ियां ही जंगल में बची थी, पर ग्रामीणों की एकजुटता व इच्छाशक्ति से आज यहां ऊंचे-ऊंचे पेड़ दिखते हैं. पहले स्थानीय लोगों द्वारा लकड़ी काटना जारी था. जंगलों को बचाने के लिए कोई भी आवाज नहीं उठती थी. इसके बाद गांव में पदयात्रा पहुंची और लोग वन को बचाने के लिए जागरूक हुए.

नियमित तौर पर होती है समिति की बैठक
हर महीने की 20 तारीख को वन सुरक्षा समिति की बैठक होती है, जो आज भी जारी है. वनों को बचाने के लिए लोगों ने साल 2015-16 में बनलोटवा गांव से पदयात्रा की शुरुआत की थी. 20 अप्रैल को पदयात्रा उमेडंडा गांव पहुंची थी. इसके बाद से हर साल 20 अप्रैल को यहां वन रक्षा बंधन मनाया जाता है. इस दौरान कार्यक्रम का आयोजन कर लोगों को जंगलों को बचाने के लिए जागरूक भी किया जाता है.

सरकारी योजनाओं का दिख रहा असर
उमेडंडा में पेड़ के कटाव में भारी कमी आयी. इसके पीछे सरकारी योजनाओं की सफलता को वजह मानते हैं. पहले लोग मिट्टी के घर बनाते थे, जिसके कारण लकड़ी का इस्तेमाल होता था और लोग लकड़ी के लिए जंगलों का रुख करते थे. पर, अब सरकारी योजनाओं के जरिये लोगों को पक्का मकान बनाने के लिए पैसे मिल रहे हैं और दूसरे लोग भी पक्का मकान बना रहे हैं. उज्ज्वला योजना के जरिये लोगों को गैस सिलेंडर दिया जा रहा है, इसके कारण भी लकड़ी की खपत कम हो रही है और पेड़ बच रहे हैं.

पेड़ है, तो संसार है : सेनापति किस्पोट्टा
उमेडंडा वन सुरक्षा समिति के उपाध्यक्ष सेनापति किस्पोट्टा कहते हैं कि वर्तमान दौर में जिस तरीके से प्राकृतिक संपदाओं का दोहन हो रहा है, उस पर अगर रोक नहीं लगाया गया, तो हमारी भावी पीढ़ी के लिए बहुत बड़ी समस्या पैदा हो जायेगी. पहले पूरे क्षेत्र में डीप बोरिंग के कारण जलस्तर काफी कम हो गया था, लेकिन जैसे-जैसे जंगल घना हो रहा है, जलस्तर में भी सुधार हो रहा है. जंगलों को बचाना बहुत जरूरी है, क्योंकि पेड़ है, तो संसार है. इस बात को सभी लोगों को समझना होगा.

लोगों को जागरूक करना जरूरी : रामदेव मुंडा
उमेडंडा पंचायत के मुखिया रामदेव मुंडा कहते हैं कि वन सामुदायिक संपत्ति है. इसलिए इसके बचाव और रख-रखाव के लिए सामूहिक सहयोग की जरूरत है. लोगों को वन और पेड़ों के प्रति संवेदनशील होना होगा, तभी जाकर हम जंगलों को बचा पायेंगे. ग्रामसभा की बैठक में ग्रामीणों को जंगल बचाने और पेड़ लगाने के लिए प्रेरित किया जाता है.

बढ़ रहा है जंगल का क्षेत्रफल : सिद्धेश्वर गंझू
उमेडंडा के नेवदा टोली के स्वयं सहायता समूह के पूर्व अध्यक्ष सिद्धेश्वर गंझू बताते हैं कि उनलोगों ने करीब 20 साल पहले जंगल को बचाने के लिए समूह का गठन किया था और काम करना शुरू किया था. उस समय समूह ठीक से चला और वन बचाने को लेकर काम भी हुए, लेकिन बाद में सभी का ध्यान हटता गया और काम बंद हो गया, हालांकि नयी वन सुरक्षा समिति काफी अच्छे तरीके से काम कर रही है और वन क्षेत्र बढ़ रहा है.