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  • Feb 18 2019 12:56PM

बुजुर्गों का मानना है : थक कर बैठ जाने का मतलब है खुद को और कमजोर कर लेना

बुजुर्गों का मानना है : थक कर बैठ जाने का मतलब है खुद को और कमजोर कर लेना

पवन कुमार

राजधानी रांची से करीब 35 किलोमीटर की दूरी पर है बेड़ो प्रखंड. इस प्रखंड की कई पंचायतों के बुजुर्गों से मिलने का मौका मिला. बुजुर्गों से बात करने पर पता चला कि उनका हौसला आज भी कायम है. बुजुर्ग कहते हैं कि भले ही शरीर से वे बुजुर्ग हैं, लेकिन आज भी ऊर्जावान हैं. वे अपनी दिनचर्या व संयमित जीवन के सहारे खुद को हमेशा फिट रखते हैं.

1. ग्राम : चनगनी
पंचायत : चनगनी
प्रखंड : बेड़ो

70 साल के बिक्रम उरांव और नये जमाने की मोटे चक्के वाली फैशनेबल साइकिल. बुजुर्ग बिक्रम और आधुनिक साइकिल की जोड़ी आपको अचंभित कर सकती है. आपको सोचने के लिए मजबूर कर सकती है कि जिस उम्र में लोग बिस्तर से उठ नहीं पाते, उस उम्र में भी वह युवाओं की साइकिल चलाते हैं. रांची जिला अंतर्गत बेड़ो प्रखंड की चनगनी पंचायत के चनगनी गांव निवासी बिक्रम अपने गांव के अास-पास अपने खेत-खलिहान में जाने और बेड़ो जाने के लिए साइकिल चलाते हुए दिख जायेंगे. नये जमाने की साइकिल के बारे में पूछने पर बिक्रम बताते हैं कि इस साइकिल को चलाने में ज्यादा मजा आता है, चलाने में आसानी होती है. वह कहते हैं शरीर को स्वस्थ रखने के लिए शरीर से काम लेना जरूरी है. इसके साथ ही शुद्ध भोजन और हवा भी जरूरी है. आजकल रासायनिक खाद के बेतहाशा उपयोग से लोगों के स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ रहा है.

अकेले खेतों में संभालते हैं काम
बिक्रम कहते हैं कि थक कर बैठ जाने का मतलब है खुद को और कमजोर कर लेना. अगर किसान कमजोर हो जायेगा, तो खेती कैसे होगी. बिक्रम बताते हैं कि वो खुद खेत में हल जोतते हैं, कुदाल चलाते हैं, सिंचाई करते हैं और खेती करते हैं. इन सब कार्यों को करने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती है. सर्दी, गर्मी व बरसात तीनों मौसम में अहले सुबह तीन बजे उठ जाते हैं. जब खेती-बारी का मौसम होता है, तो खेत में चले जाते है, नहीं तो घर में ही बैठे रहते हैं, लेकिन बिस्तर पर नहीं रहते हैं. रात में आठ बजे सो जाते हैं.

हरी सब्जियों का करते हैं सेवन
बिक्रम उरांव हरी सब्जियों का सेवन ज्यादा करते हैं. खुद के खेतों से उपजाये धान, गेहूं और मड़ुआ खाते हैं. फुटकल साग और चाकोड़ साग इन्हें बेहद पसंद है. साग का सेवन अधिक करते हैं. मसालेदार सब्जियों के सेवन से परहेज करते हैं. बाहर का खाने से भी परहेज करते हैं.

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2. 75 वर्ष की उम्र में भी आत्मविश्वास से स्वस्थ जीवन जी रहे जयनंदन साय
पंचायत : मालश्रृंग
प्रखंड : कांके
जिला : रांची

ललाट पर त्रिपुंड, लंबी दाढ़ी, धोती-कुर्ता, सामान्य कद काठी, निरोगी और फुर्तीला शरीर. गजब का आत्मविश्वास. उम्र भले ही 75 साल हो, लेकिन जज्बे से बिल्कुल जवां हैं सांगा गांव के जयनंदन साय. आज भी वह खुद को बुजुर्ग नहीं मानते हैं. सादा जीवन, स्वच्छ वातावरण, समय से कार्य करना उनकी लंबी उम्र और सेहत का राज है. इस उम्र में भी वह खेतों में कुदाल चलाते हैं. आसानी से साइकिल चला लेते हैं. पांच भाइयों में जयनंदन साय सबसे बड़े हैं.

आठ किलोमीटर दूर पैदल जाते थे स्कूल
जयनंदन साय का जन्म 24 जनवरी, 1944 को हुआ. उनके पिता शिक्षक थे. 1962 में उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास की. स्कूल के दिनों को याद करते हुए वह कहते हैं कि वो रोजाना आठ किलोमीटर दूर स्कूल में पढ़ाई के लिए जाते थे. आठ किलोमीटर का सफर पता भी नहीं चलता था. इसके अलावा खेत-खलिहानों में काम करते थे. 30 साल तक वह कंपाउंडर के रूप में कार्य कर चुके हैं.

संयमित व सादा जीवन है मूलमंत्र
जयनंदन साय सादा जीवन जीते हैं. जाड़ा, गरमी, बरसात सभी मौसम में सूर्योदय से पहले उठ जाना उनकी दिनचर्या में शामिल है. अहले सुबह उठ कर ध्यान लगाते हैं. फिर घर के बाहर टहलते हैं. रात में भी नौ बजे तक सो जाते हैं. जयनंदन साय खटिया पर सोते हैं. चौकी या पलंग पर उन्हें नींद नहीं आती है. ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण पहले मच्छर कम लगते थे, लेकिन इधर कुछ सालों से मच्छर का प्रकोप बढ़ गया है. इसके बावजूद जयनंदन मच्छरदानी का प्रयोग कभी नहीं करते हैं. घर के पहले तल्ले पर उनका कमरा है. सीढ़ी चढ़ने में उन्हें कोई परेशानी नहीं होती है. फिलहाल जयनंदन अपने घर में ही किराना दुकान चलाते हैं.

बीमारी के नाम पर होती है सिर्फ सर्दी
जयनंदन साय पूरी तरह से फिट हैं. आंखों में चश्मा लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है. सुनने में भी किसी प्रकार की समस्या नहीं है. हाथ-पैर के जोड़ों में किसी प्रकार की समस्या नहीं है. हर रोज ठंडा पानी से ही नहाते हैं. दिन भर में दो बार भोजन करते हैं. दिन में एक बार नाश्ता और और रात में खाना खाते हैं. जयनंदन बताते हैं कि ठंडा पानी से नहाने से स्वास्थ्य ठीक रहता है. हर एक व्यक्ति को खाना भी संयमित तरीके से खाना चाहिए. कभी-कभार अगर सर्दी हो जाये, तो अदरक, तुलसी पत्ता और काली मिर्च का काढ़ा बनाकर पीते हैं, जिससे सर्दी ठीक हो जाती है. नशे से कोसों दूर हैं. चाय पीने से भी परहेज करते हैं.

दिमाग से बूढ़ा होना ही बूढ़ा होने की निशानी है : जयनंदन साय
जयनंदन बताते हैं कि उन्हें आज तक कभी इस बात का अहसास नहीं हुआ है कि उनकी उम्र 75 वर्ष हो गयी है. दिमाग से बूढ़ा होना ही बूढ़ा होने की निशानी है. किसी प्रकार की कोई शारीरिक समस्या नहीं है. अगर स्वस्थ और लंबी जिंदगी चाहते हैं, तो नशा से दूर रहें, क्योंकि नशा शरीर का नाश करता है. शारीरिक श्रम अवश्य करें और खान-पान संतुलित रखें.

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3. 80 वर्ष की उम्र में कंधे पर उठाते हैं 40 किलो का वजन
ग्राम : नेहालू बरटोली
पंचायत : नेहालू कपारिया
प्रखंड : बेड़ो
जिला : रांची
मजाकिया लहजा और हर बात पर मुस्कुरा कर जवाब देना, 80 वर्षीय मंगरा मुंडा की पहचान है.
नेहालू कपारिया पंचायत अंतर्गत नेहालू गांव के बरटोली निवासी मंगरा मुंडा उम्र में सबसे बड़े हैं. मंगरा जहां भी बैठते हैं, हंसी-ठिठोली की बात निकल ही जाती है. इस खुशमिजाजी की वजह है कि मंगरा 80 साल की उम्र में भी पूरी तरह फिट हैं. गांव के सामाजिक आयोजनों में हिस्सा लेते हैं. मंगरा ने आज तक स्कूल की दहलीज नहीं लांघी है, लेकिन हाथ में मिट्टी लेकर घर की दीवार पर ककहरा लिखना सीखा देते हैं. बताते हैं कि साक्षरता अभियान के तहत उन्होंने लिखना सीखा है.

मुर्गे की बांग के साथ खुलती है नींद
मंगरा मुंडा मुर्गे की बांग के साथ बिस्तर छोड़ देते हैं. कुछ काम हो या न हो, लेकिन हर रोज सुबह उठ जाते हैं. अगर खेती-बारी का समय रहता है, तो सुबह सूर्योदय से पहले खेतों में जाकर अपना काम शुरू कर देते हैं. अगर खेतों में काम नहीं हुआ, तो घर के बाहर जाकर घूमते हैं. कहते हैं कि ताजी हवा बेहद जरूरी है.

खुद से करते हैं अपना काम
मंगरा मुंडा अपना काम खुद से करते हैं. खेत में हल चलाते हैं. कंधे में भार ढोते हैं. आस-पास के गांवों में शादी समारोह में पैदल ही चले जाते हैं. उन्हें काम करना अच्छा लगता है. मंगरा बताते हैं कि वो बीमार बहुत कम पड़ते हैं. हालांकि, जब बीमार पड़ते भी हैं, तो घरेलू उपाय से ही ठीक कर लेते हैं. आज तक चश्मा नहीं पहने हैं. खान-पान में अधिकतर माड़ साग का इस्तेमाल करते हैं और मड़ुवा रोटी खाते हैं.

खुश रहने से लंबी होती है आयु : मंगरा मुंडा
मंगरा मुंडा कहते हैं कि लंबा और सुखी जीवन जीने के लिए खुश रहना बेहद जरूरी है. हंसते रहें और हंसाते रहें. क्या होगा यह सोच कर सिर्फ चिंता में डूबे रहने से कोई फायदा नहीं है. उससे सिर्फ नुकसान होता है. इसके अलावा संयमित जीवन जीना भी बेहद जरूरी है.

3. साइकिल के सहारे हर काम करते हैं 80 वर्षीय बिरसा उरांव
ग्राम : रोगाडीह पतराटोली
पंचायत : नेहालू कपारिया
प्रखंड : बेड़ो
जिला : रांची

नेहालू कपारिया पंचायत अंतर्गत रोगाडीह गांव के पतराटोली के 80 वर्षीय बुजुर्ग हैं बिरसा उरांव. बिरसा का सुबह जल्दी उठना, घर में खाना बनाने के लिए पत्नी का सहयोग करना और फिर गायों को चराने के लिए ले जाना, यह उनकी दिनचर्या में शामिल है. इनकी सिर्फ एक बेटी है, जिसका विवाह हो गया है. इसके बाद से ही वो घर के काम में सहयोग करते हैं. इसके अलावा खेत में भी काम करते हैं. सुदूरवर्ती गांव होने के कारण स्थानीय बाजार तक पहुंचने के लिए ऑटो की व्यवस्था नहीं है. इसके कारण बिरसा उरांव साइकिल से ही करीब पांच किलोमीटर दूर बाजार जाकर सामान लाते हैं.

लेते हैं शुद्ध भोजन और ताजी हवा
बिरसा उरांव घड़ी पहनते हैं और समय के पक्के हैं. सुबह तीन से चार बजे के बीच उठ जाते हैं. सुबह उठने के बाद अपने खेतों में जाकर एक चक्कर लगा लेते हैं. खाने में हरी सब्जी और साग का सेवन ज्यादा करते हैं. मीट-मछली भी खाते हैं. मड़ुवा रोटी को ज्यादा तवज्जो देते हैं.

रासायनिक खाद के इस्तेमाल से कमजोर हो रही नयी पीढ़ी : बिरसा उरांव
बिरसा उरांव आज की युवा पीढ़ी को संदेश देते हुए कहते हैं कि लंबी उम्र और स्वस्थ जीवन के लिए शुद्ध भोजन जरूरी है. रासायनिक खाद के इस्तेमाल से लोग कमजोर हो रहे हैं और उनकी आयु भी कम हो रही है. इसलिए अगर स्वस्थ जीवन जीना है, तो हमें प्रकृति की ओर वापस लौटना पड़ेगा.

4. जिंदा रहने की जिद से स्वस्थ हैं पुशंगी
ग्राम : रोगाडीह पतराटोली
प्रखंड : बेड़ो
जिला : रांची

बेड़ो प्रखंड अंतर्गत रोगाडीह गांव के पतराटोली निवासी पुशंगी उरांइन में जीने का जज्बा गजब का है. उम्र और दुख के बोझ से भले ही कमर झुक गयी है, लेकिन इसी झुकी कमर से वो खुद का सारा काम करती हैं. कुआं और चापाकल से पानी भरती हैं. घर की साफ-सफाई करती हैं. खाना बनाने के लिए घर के बाहर खेत, बगीचे और पेड़ों के सूखे पत्ते जमा करती हैं और उसे ढोकर घर लाती हैं, तब जाकर घर में खाना बनता है. पुशंगी की उम्र करीब 90 साल है.

बेटे-बेटियों को खोने का है गम
पुशंगी बताती हैं कि पहले उनका परिवार भी भरा-पूरा था. पांच बेटे और चार बेटियां थीं, लेकिन किस्मत ने ऐसा खेल खेला कि आज कोई मां कहनेवाला नहीं बचा. सभी की मौत हो गयी है. पुशंगी अपने एक भतीजे के साथ रहती हैं. खाना-पीना भी खुद से ही बनाकर खाती हैं.

शुद्ध शाकाहारी हैं पुशंगी
पुशंगी उरांइन शुद्ध शाकाहारी हैं. बाजार जाने में असमर्थ पुशंगी अधिक से अधिक साग खाकर ही गुजारा करती हैं. इसके अलावा घर में जो भी सब्जी मिल जाती है, उसे खाती हैं. बाहर का खाना बिल्कुल नहीं खाती हैं. पुशंगी कहती हैं कि शुद्ध शाकाहारी भोजन करने से आयु लंबी होती है और व्यक्ति बीमार नहीं पड़ता है.

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5. शरीर देख कर नहीं लगता जेम्स की उम्र का अंदाजा
ग्राम : रोगाडीह पतराटोली
पंचायत : नेहालू कपारिया
प्र्रखंड : बेड़ो
गठीला शरीर, सामान्य लंबाई और पारंपरिक सिंचाई तकनीक से हाथ से पानी निकाल कर खेत में सिंचाई कर रहे जेम्स केरकेट्टा को देख कर कोई यह नहीं कह सकता है कि उनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक होगी. नेहालू कपारिया पंचायत अंतर्गत रोगाडीह गांव के पतराटोली निवासी हैं जेम्स केरकेट्टा. जेम्स बताते हैं कि उन्होंने कभी भी शारीरिक परिश्रम से खुद को दूर नहीं रखा है. अकेले ही खेत में जुताई करते हैं और सब्जी लगाते हैं. उन्होंने बताया कि जवानी के दिनों में 40 किलो वजन उठाकर अपने गांव से बेड़ो 16 किलोमीटर तक पैदल जाते थे. अब भी आसपास पांच किलोमीटर तक के दायरे में लगने वाले बाजार और मेले में जाते हैं. जेम्स की मां भी जिंदा हैं. जेम्स के तीन बेटे और तीन बेटियां हैं.

खुद के खेतों में उपजा खाना ही खाते हैं
जेम्स केरकेट्टा हर रोज सुबह पांच बजे उठ कर खेत में पहुंच जाते हैं. धान, मड़ुआ, गेहूं और सब्जियों की खेती करते हैं. खुद के खेत से उपजाये हुए चावल और सब्जियां खाते हैं. बाहर का खाना खाने से परहेज करते हैं. बाजार में कभी-कभार पकौड़ी खा लेते हैं. इसके अलावा मांस-मछली और हरी सब्जियां खाते हैं. जेम्स निर्धारित समय के अनुसार ही खाना खाते हैं और सो जाते हैं.

मेहनत और परिश्रम जरूरी है : जेम्स केरकेट्टा
जेम्स बताते हैं कि स्वस्थ शरीर के लिए व्यायाम बहुत जरूरी है. ग्रामीण क्षेत्र में तो खेतों में कार्य करते हुए शारीरिक श्रम हो जाता है, लेकिन शहरी क्षेत्रों में नहीं हो पाता है. वर्तमान समय में आधुनिक मशीनों के प्रभाव से शारीरिक श्रम लोग नहीं कर रहे हैं. इसका विपरीत असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ रहा है. पहले गोबर खाद का इस्तेमाल होता था, लेकिन अब यूरिया -डीएपी का इस्तेमाल हो रहा है. इसके कारण भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है. नयी-नयी बीमारियां आ रही हैं और लोगों की उम्र भी कम हो रही है.