gound zero

  • Aug 21 2017 2:06PM

... और फिर एक दिन मां चली गयी

... और फिर एक दिन मां चली गयी
चार बेसहारा बच्चों का हाल
पवन कुमार
हरे-भरे जंगल और पहाड़ी से घिरे खूबसूरत वादियों में बसा है एक गांव सीताडीह. अनगड़ा प्रखंड के बरवादाग पंचायत का यह गांव रांची-पुरुलिया मार्ग के किनारे बसा है. सड़क किनारे ही एक घर है, जो टूट कर गिर चुका है.
 
घर ने तो वक्त के थपेड़ो के आगे झुक कर अपनी हार मान ली, लेकिन टूट चुके घर और घर टूटने से पहले ही बिखर चुका परिवार अब अपने घर को समेटने में लगा है. कुछ समय पहले तक सीताडीह गांव के टूट चुके इसी घर में बुधराम लोहरा का हंसता-खेलता परिवार रहता था. बुधराम अपनी पत्नी और चार बच्चों के साथ खुशी-खुशी रहता है, लेकिन साल 2010 में इस घर की खुशियों पर मानों किसी की नजर लग गयी. बीमारी के कारण चार बच्चों के पिता बुधराम लोहरा की मौत हो गयी. जिससे घर की खुशियां खत्म-सी हो गयी. पिता की मौत के बाद पूरा परिवार टूट गया. इसी दौरान घर की छत भी दरक गयी थी. इसके बावजूद मां की ममता ने चार बच्चों को सहारा दिया. 
 
 बुधराम के परिवार के पास दो कमरे का मकान के अलावा और कोई संपत्ति नहीं थी. खेती-बारी नहीं था और ना ही मवेशी. किसी तरह मां ने रोजी-रोटी कमाना शुरू किया और बच्चों की परवरिश शुरू की. वक्त का पहिया भी तेजी से घूमा. बच्चे बड़े होने लगे. उस वक्त शायद मां की ममता की छांव में बच्चों की तरह घर भी खुद को महफूज मान रहा था.
 
फिर लगभग चार महीने पहले फरवरी 2017 में मां की ममता ने परिवार का साथ छोड़ दिया और अपने बच्चों को अकेला छोड़ कर वो कहीं चली गयी. ममता की छांव हटने के बाद पूरा परिवार ही और बिखर गया और आखिरकार घर का भी सब्र का बांध टूट गया. इसी बीच घर की छत भी टूट कर गिर गयी. बुधराम के चार बच्चों पर एक साथ दोहरी मुसिबत आ गयी. एक तो पिता का साया सर से उठना और मां का साथ छोड़ देना और दूसरी घर से बेघर हो जाना. 
 
चार भाइयों में सबसे बड़े भाई अमर ने तो पहले ही पढ़ाई छोड़ दी थी और मजदूरी करने लगा था. अब छोटे भाइयों के सामने भी यही नौबत आ गयी. सहायता के लिए भी किसी का हाथ आगे नहीं आया. पंचायत जनप्रतिनिधियों से लेकर अधिकारियों ने भी इन बच्चों की सुध नहीं ली. चारों बच्चों में सबसे कम उम्र के बच्चे की उम्र महज आठ साल है और सबसे बड़े की उम्र 19 साल. परिवार के पास दो कमरों के घर के अलावा कुछ नहीं था, वो भी अब टूट चुका है. राशन कार्ड के नाम पर एक लाल कार्ड परिवार के पास है. लेकिन, इसका लाभ भी इन बच्चों को नहीं मिल रहा है. 
 
बारिश के मौसम में तो अमर अपने अन्य भाइयों के साथ अपने रिश्तेदार के यहां रहने को मजबूर हैं. पूछने पर दूसरा भाई संजय कहता है कि शायद किस्मत को यही मंजूर है. सरकार लोगों की बेहतरी के लिए कई योजनाएं चलाती है, लेकिन जब जरूरतमंदों को ही इसका लाभ नहीं मिले, तो ऐसी योजनाओं को लागू करने का औचित्य ही क्या है.
 
इन बच्चों की स्थिति के बारे में पंचायतनामा ने रांची के उप विकास आयुक्त शशि रंजन को बताया गया. उन्होंने तत्काल अनगड़ा प्रखंड की बीडीओ और बरवादाग पंचायत के मुखिया को इस संबंध में पूरी जानकारी प्राप्त कर सूचित करने को कहा. डीडीसी ने कहा कि इन बच्चों के भलाई के लिए जहां तक होगा, सहयोग किया जायेगा.