gound zero

  • Dec 21 2018 7:06PM

मिथक तोड़तीं आदिवासी महिला किसानों की ताकत देखिए

मिथक तोड़तीं आदिवासी महिला किसानों की ताकत देखिए

गुरुस्वरूप मिश्रा

किसान का नाम लेते ही अक्सर खेत में नंगे पैर, धोती-गंजी पहने, माथे पर पगड़ी बांधे बुजुर्ग का चेहरा जेहन में तैरने लगता है. किसान कहने मात्र से सिर्फ पुरुष किसान की ही तस्वीर सामने आती है, जबकि 90 फीसदी कार्य महिलाएं करती हैं. खेत की जुताई और उत्पाद को बाजार में बेचने मात्र से पुरुषों को किसान होने का पूरा क्रेडिट मिल जाता है. पितृसत्तात्मक समाज का नजरिया कहिए या बाजार का कड़वा सच. अपना सौ फीसदी देने के बावजूद महिलाएं हाशिए पर रहती हैं. वक्त बदला, लेकिन खेती-किसानी को लेकर किसानों की वो धुंधली तस्वीर आज भी नहीं बदली है. आज भी आप इस तस्वीर से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं, तो मिथक तोड़तीं झारखंड की आदिवासी महिला किसानों की ताकत जानने के बाद फख्र से आपका सीना चौड़ा हो जायेगा.

हर क्षेत्र की तरह खेती-बारी में भी महिलाएं बेहतर कर रही हैं. आदिवासी महिलाओं का तो कोई जवाब ही

नहीं. असुविधाओं और विपरीत परिस्थितियों का रोना रोने की बजाय उन्होंने जिद से खेती-किसानी के

जरिये अपनी दुनिया बदल ली. उनके चेहरे पर मुस्कान देख आपको यकीन हो जायेगा कि आज उनका

जीवन खुशहाल है. अपनी मेहनत और हौसले से जिंदगी की नयी कहानी लिखनेवाली आदिवासी

महिलाओं के संघर्ष पर हमें गर्व करना चाहिए. खेती से न सिर्फ उन्होंने अपनी जिंदगी बदली, बल्कि अन्य

महिला किसानों को भी वह प्रेरित कर रही हैं.

किसानों को दे रहीं नयी ऊर्जा

मनोरमा कुजूर, नीलिमा तिग्गा, अनीता मुर्मू, अलबिना एक्का एवं पूनम कुमारी समेत कई आदिवासी महिला किसान हमारी ताकत हैं. भोली-भाली इन महिलाओं की असली पूंजी है जिद. जिद और जुनून के बल पर इन्होंने अपनी जिंदगी बदल ली है. ये प्रेरणा हैं वैसे किसानों के लिए जो खेती से मुंह मोड़ रहे हैं या खेती-किसानी को लेकर निराश हैं. कृषि क्षेत्र में इनकी उपलब्धि किसानों को नयी ऊर्जा देती है.

 

1. खेती से मनोरमा ने संभाला परिवार
प्रखंड : कुड़ू
जिला : लोहरदगा

मनोरमा कुजूर. लोहरदगा जिले के कुड़ू प्रखंड की पिरी पंचायत के कड़ाक गांव की महिला किसान हैं. उम्र महज 27 वर्ष. इंटरमीडिएट पास हैं. छह सदस्यीय परिवार है. पिता एलेन कुजूर अस्वस्थ रहते हैं. मां, छोटी बहन और भाई के साथ रहकर परिवार चला रही हैं. सबसे खास ये कि वह अपनी छोटी बहन को पढ़ा रही हैं. पिता के अस्वस्थ होने के बावजूद खेती से उन्होंने अपने परिवार को संभाल लिया. आज खुशहाल जीवन जी रही हैं. आज इलाके में उनकी अपनी पहचान है. ये सबकुछ संभव हो पा रहा है सिर्फ खेती से.

श्रीविधि का कमाल, एक किलो बीज से उपजा 14 क्विंटल धान
मनोरमा के पास 10 एकड़ जमीन है. कुल जमा छह वर्ष का खेती का अनुभव है. सिंचाई के लिए दो कुएं हैं. धान, मकई, सब्जी, तेलहन एवं दलहन की खेती करती हैं. वह हमेशा खेती में नये प्रयोग करती हैं. श्रीविधि से धान की खेती कर उन्होंने एक किलो बीज से 14 क्विंटल धान उपजाया था. इसकी हर ओर चर्चा हुई थी. वह कहती हैं कि खेती उनका शौक है और जुनून भी. यही वजह है कि काफी सुविधाएं नहीं होने के बावजूद खेती-बारी में बेहतर कर रही हैं. बागवानी मिशन की ओर से उन्हें रांची में प्रशिक्षण मिला है. महिला किसानों के लिए रोल मॉडल हैं मनोरमा. इन्हें सम्मानित भी किया गया है.

सरकारी सुविधाएं मिलने पर और बेहतर करतीं : मनोरमा कुजूर
आदिवासी महिला किसान मनोरमा कुजूर कहती हैं कि खेती-बारी अपनी नौकरी है. इसमें काफी फायदा है. किसी के अधीन काम करना नहीं पड़ता. आदमी स्वतंत्र रहता है. उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता, तो कृषि के क्षेत्र में वह और बेहतर कर पातीं. पानी की दिक्कत है. बोरिंग और ट्रैक्टर की सुविधा मिलती, तो खेती में आसानी होती.

2. किसानों को प्रोत्साहित करतीं नीलिमा

प्रखंड : कुड़ू
जिला : लोहरदगा

नीलिमा तिग्गा. उम्र महज 35 वर्ष. लोहरदगा जिले के कुड़ू प्रखंड की कोलकीमरी पंचायत के उमरी गांव की आदिवासी महिला किसान हैं. मैट्रिक पास हैं. पिछले 10 वर्ष से वह खेती कर रही हैं. आज इलाके में इनकी अपनी पहचान है. खरीफ-रबी फसल में अच्छी उपज के लिए इन्हें सम्मानित भी किया गया है. आज आस-पास के 40-50 किसानों को वह खेती के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं.

श्रीविधि से धान का सात गुना उत्पादन
नीलिमा के पास एक एकड़ जमीन है. इसमें वह खरीफ व रबी फसल करती हैं. सब्जी का भी उत्पादन करती हैं. इसी खेती से आज वह सपरिवार खुशहाल हैं. वह बताती हैं कि पहले पारंपरिक तरीके से धान की खेती करने पर एक एकड़ में सिर्फ चार-पांच क्विंटल धान होता था. कृषि विज्ञान केंद्र, आत्मा, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके और संस्था प्रदान द्वारा प्रशिक्षित किये जाने के बाद वह श्रीविधि से धान की खेती करने लगीं. अब करीब सात गुना उत्पादन बढ़कर 35 क्विंटल हो गया है.

किसानों को करती हैं जागरूक
आकाशवाणी, रांची द्वारा प्रसारित किसानवाणी कार्यक्रम में वह शामिल हुई हैं. इसके माध्यम से भी वह किसानों को जागरूक करती हैं. वह खेती से न सिर्फ अपनी जिंदगी बदल रही हैं, बल्कि आस-पास के किसानों को भी जागरूक करने का प्रयास कर रही हैं. वह वैज्ञानिक तरीके से खेती कर और ड्रिप इरिगेशन से सब्जी का उत्पादन कर खुशहाल जीवन जी रही हैं.

वैज्ञानिक तरीके से खेती है फायदेमंद : नीलिमा तिग्गा
होलिका स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं नीलिमा तिग्गा हैदराबाद, केरल, दिल्ली समेत कई राज्यों में भ्रमण कर चुकी हैं. उनके बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ रहे हैं. वह कहती हैं कि खेती में काफी फायदा है. ड्रिप इरिगेशन से सब्जी करना बेहतर है. वैज्ञानिक तरीके से खेती की जाये, तो नौकरी करने की जरूरत नहीं है. अच्छी आमदनी होती है.

3. अनीता ने बंजर जमीन में उगाया सोना

प्रखंड : पोटका
जिला : पूर्वी सिंहभूम

48 वर्षीया अनीता मुर्मू से राज्य की महिला किसान प्रेरणा ले सकती हैं. खेती-किसानी के मायने समझना हो, तो अनीता रोल मॉडल हैं. वह पूर्वी सिंहभूम जिले पोटका प्रखंड की डोमजोड़ी पंचायत के राजदोहा की रहनेवाली हैं. अपनी जिद से चार एकड़ बंजर जमीन पर केले की फसल लहलहा कर उन्होंने साबित कर दिया कि कुछ भी नामुमकिन नहीं है. वह 34 एकड़ खेत में धान, गेहूं, फूल के साथ-साथ सब्जी की भी खेती करती हैं. फलदार वृक्ष भी लगे हैं. मत्स्य पालन, मुर्गी पालन, बत्तख पालन, मधुमक्खी पालन और गौ पालन से अपनी जिंदगी को नया रंग दे रही हैं.

बंजर जमीन पर डालीं तालाब की मिट्टी, उगला सोना
अनीता मुर्मू धुन की पक्की हैं. जिद्दी और मेहनती हैं. वह पूर्व मुखिया भी रह चुकी हैं. वर्ष 2012 से वह खेती कर रही हैं. खेती की शुरुआत में ही चार एकड़ बंजर जमीन पर केले की फसल लगाईं. इसके लिए तालाब की मिट्टी को बंजर जमीन पर रखवायीं और 350 केले के पौधे से करीब आठ हजार का मुनाफा कमायीं. दूसरी बार केले के बीच में गेंदे का फूल लगाकर भी कमाई कीं.

34 एकड़ में कर रहीं जैविक खेती
अनीता के पास 34 एकड़ जमीन है. वह जैविक खेती करती हैं. इसमें 20 एकड़ में धान, साढ़े 11 एकड़ में सब्जी और ढाई एकड़ में फलदार वृक्ष लगे हैं. ड्रिप इरिगेशन से पूरी तरह रासायनमुक्त खेती को वह बढ़ावा दे रही हैं. मछलीपालन के लिए चार डोभा है. मुर्गी पालन के तहत 450 मुर्गियां हैं. 41 बत्तख हैं. मधुमक्खी के 8 बॉक्स हैं. 9 गाय से गौ पालन कर रही हैं.

किसानों को कर रहीं प्रोत्साहित
कृषि विज्ञान केंद्र, आत्मा, बिरसा कृषि विश्वविद्यालय, कांके से प्रशिक्षण ले चुकीं आदिवासी महिला किसान अनीता 300 से अधिक किसानों को खेती-किसानी को लेकर प्रोत्साहित कर चुकी हैं.

राज्यपाल कर चुकी हैं सम्मानित
झारखंड की राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू वर्ष 2018 में इन्हें रांची में सम्मानित कर चुकी हैं. टाटा मोटर्स द्वारा बेस्ट मुखिया अवार्ड व जागरूकता के लिए पुरस्कृत किया गया है. भोपाल, नागपुर व चाईबासा में भी सम्मानित हुई हैं.

खेती-किसानी का कोई जवाब नहीं : अनीता मुर्मू
अनीता मुर्मू कहती हैं कि खेती-किसानी का कोई जवाब नहीं है. नौकरी छोड़कर लोग अब खेती कर रहे हैं. सेवानिवृत पति शंकरचंद्र मुर्मू के साथ वह खेती से खुशहाल जीवन जी रही हैं.

4.
जैविक खेती के लिए किसानों को प्रोत्साहित करती हैं एलबिना एक्का

प्रखंड : नामकुम
जिला : रांची

रांची जिले के नामकुम की आदिवासी महिला किसान एलबिना एक्का की भी खेती में अपनी अलग पहचान है. पिछले 20 साल से वह खेती कर रही हैं. मैट्रिक पास एलबिना जैविक खेती करती हैं. रासायनमुक्त खेती के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी करती हैं. सबसे खास ये कि वह महुआ लड्डू बनाने के लिए प्रोत्साहन देती हैं. इससे शराबबंदी पर नकेल कसने की दिशा में भी वह सार्थक पहल कर रही हैं.