gound zero

  • Sep 18 2018 1:10PM

माटी की उपेक्षा से मुश्किल में हैं कुम्हार

माटी की उपेक्षा से मुश्किल में हैं कुम्हार

वीरेंद्र कुमार सिंह

जिला : पूर्वी सिंहभूम 

 

झारखंड के कुम्हार बदहाल हैं. आधुनिकता की धमक से गांव-जवार से जुड़ी कुम्हारों की देसी विधा खतरे में पड़ गयी. वक्त की तेज रफ्तार में उपेक्षित माटी की कारीगरी बाजार में इस कदर पिछड़ गयी कि कुम्हारों को माटी की कमाई से पेट पालना मुश्किल होने लगा. झारखंड माटी कला बोर्ड का गठन इसी उद्देश्य से हुआ कि राज्य के कुम्हारों के दिन बहुरेंगे, लेकिन इसकी गति भी तेज नहीं दिखती. आज भी कई कुम्हारों को दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करनी पड़ रही है. पूर्वी सिंहभूम जिले में कुम्हार की आबादी लगभग एक लाख है. जिले के पोटका, घाटशिला, चाकुलिया, बोराम, पटमदा, मुसाबनी प्रखंड में कुम्हार निवास करते हैं. इनका मुख्य पेशा आज भी मिट्टी निर्मित सामानों को बनाना है. यह इनका पुश्तैनी कारोबार है. करीब 95 फीसदी कुम्हार खेतिहर मजदूर हैं. मिट्टी के कामों के बाद मजदूरी कर अपना जीवन-यापन करते हैं. मात्र तीन से चार फीसदी लोग ही नौकरी में हैं.

पूंजी के अभाव में कुम्हारों की टूटी कमर
इसका मुख्य कारण कुम्हारों का शैक्षणिक व राजनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि पूंजी का अभाव है. आदिम कुम्हार महासंघ के महासचिव उत्तम भक्त का मानना है कि कुम्हारों के सामने आज भी विकट परिस्थिति मौजूद है. आधुनिकता के इस दौर में पुश्तैनी कारोबार सिमटने लगा है. प्लास्टिक उद्योग ने इस पेशे को काफी प्रभावित किया है. पहले लोग मिट्टी के कुल्हड़ में चाय पीते थे. अब उसकी जगह प्लास्टिक कप का उपयोग कर रहे हैं. दीपावली के समय भी दीये के बदले चाइनीज बल्बों का प्रयोग होने लगा है. इससे मुकाबला करने में असमर्थ कुम्हारों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती चली गयी.

सही समय पर मिट्टी नहीं मिलना सबसे बड़ी समस्या
कुम्हारों के लिए मिट्टी अहम है, लेकिन सही समय पर मिट्टी नहीं मिल पाने के कारण कुम्हारों को सामान बनाने में काफी कठिनाई होती है. दूसरों की जमीन से मिट्टी लाने या मन-मुताबिक मिट्टी नहीं मिलने पर उन्हें मजबूरन मिट्टी खरीदनी पड़ती है. अगर मिट्टी मिल भी जाये, तो मिट्टी से बने बर्तनों को सुखाना मुश्किल होता है. खासकर बारिश के मौसम में काफी परेशानी होती है. कुम्हार बाहुल्य गांवों में लकड़ी डिपो भी नहीं है. तैयार बर्तन व खिलौनों के बनाने के बाद अब बाजार में उसे बेचने की समस्या आती है.

सरकार से मांग
आदिम कुम्हार महासंघ के महासचिव उत्तम भक्त कुम्हारों को अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखने की मांग सरकार से करते हैं. कहते हैं कि कुम्हारों का सारा रीति-रिवाज यहां के अनुसूचित जाति से मिलता है. इसलिए उन्हें भी अनुसूचित जाति की श्रेणी में रखा जाये. कुम्हारों के मिट्टी निर्मित बर्तन, खिलौने, दीये आदि को पकाने के लिए भट्ठा शेड बनाया जाये. इसके अलावा लकड़ी या सस्ती दरों पर कोयला मुहैया कराया जाये. मछुआ आवास की तर्ज पर कुम्हारों को भी प्राथमिकता देकर आवास दिया जाये. विशेष योजना के द्वारा कुम्हारों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाया जाए. उत्पादित वस्तुओं को बाजार उपलब्ध कराया जाये.