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  • Feb 27 2018 4:06PM

अब भी नाले के जमा पानी से ग्रामीण बुझाते हैं अपनी प्यास

अब भी नाले के जमा पानी से ग्रामीण बुझाते हैं अपनी प्यास

 

प्रखंड : मुसाबनी
जिला : पूर्वी सिंहभूम

वीरेंद्र कुमार सिंह


पूर्वी सिंहभूम जिले के मुसाबनी प्रखंड की माटीगोरा पंचायत में बड़ा झरना इल गांव है. चारों ओर ऊंचे पहाड़ तथा हरे-भरे जंगलों से घिरा यह गांव किसी दर्शनीय स्थल से कम नहीं है. इसकी छटा देखते ही बनती है, लेकिन इस गांव के लोग शुद्ध पेयजल के लिए आज भी तरस रहे हैं. आजादी के 70 साल बीत जाने के बाद भी इस गांव के लोग नाले के जमा किये गये पानी से प्यास बुझाने पर मजबूर हैं. इसी नाले के पानी से जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं.

गड्ढे का पानी पीने को मजबूर
ग्रामीणों के लिए पेयजल की कोई सुविधा नहीं है. यह जान कर आपको आश्चर्य होगा कि आज भी यहां के लोग गड्ढे का पानी पीने को मजबूर हैं. पहाड़ की कंदराओं से निकला पानी ही इनके जीवन का सहारा है. मई- जून के महीने में उन्हें यहां भी पानी नहीं मिल पाता. तब वह कई किलोमीटर दूर जाकर पानी लाते हैं.

दो कुएं हैं, लेकिन वो भी गर्मी में तोड़ देते हैं दम
ग्रामीणों के लिए पहाड़ी नाले से निकला पानी ही एकमात्र सहारा है. नाले से जहां लोग पानी पीते हैं, वहीं से जानवर भी अपनी प्यास बुझाते हैं यानी एक ही नाला से ग्रामीण और जानवर अपनी प्यास बुझाते हैं. गांव में एक नव प्राथमिक विद्यालय है. जहां मध्याह्न भोजन इसी नाले के पानी से बनता है. पंचायत के मुखिया कार्तिक उरांव ने पंचायत निधि से दो कुएं का निर्माण कराया, लेकिन कुआं का जलस्तर काफी नीचे चले जाने के कारण उसमें पानी नहीं रहता है. इससे उन्हें नाले के पानी पर ही निर्भर रहना पड़ता है. शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की दिशा में लागू एक भी योजना इस गांव में आज तक नहीं पहुंची. यहां कोई जल सहिया भी नहीं है.

313 लोगों पर मात्र एक चापाकल, वह भी वर्षों से है खराब
माटीगोरा पंचायत के बड़ा झरना इल गांव में कुल 60 घर हैं. वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार पंचायत की आबादी 313 है, जिसमें 136 पुरुष एवं 177 महिलाएं हैं. सभी अनुसूचित जनजाति के हैं. इनकी साक्षरता दर 50 फीसदी है. पूरे गांव में मात्र एक चापाकल है. वह भी वर्षों से खराब है. ग्रामीणों ने कई बार इसकी शिकायत बीडीओ से की, लेकिन आज तक चापाकल की मरम्मत नहीं कराई जा सकी.

पेयजल की समस्या गंभीर : कार्तिक उरांव
माटीगोरा पंचायत के मुखिया कार्तिक उरांव कहते हैं कि पंचायत निधि से जितना हो सका, उतना किया हूं. दो कुएं का निर्माण कराया गया है, लेकिन जलस्तर काफी नीचे चले जाने के कारण कुएं से पानी लेने में ग्रामीणों को काफी दिक्कत होती है. गर्मी के दिनों में ये कुएं सूख जाते हैं. पेयजल की सुविधा के लिए कई बार प्रखंड के पदाधिकारियों से गुहार लगायी गयी, लेकिन अब तक इस समस्या का समाधान नहीं किया गया है.

अपना दुखड़ा किसे सुनाऊं : मांझी सुंडी
ग्राम प्रधान मांझी सुंडी कहते हैं कि अपना दुखड़ा किसे सुनाऊं. आजादी के बाद मुखिया को छोड़ कर आज तक इस गांव में न तो कोई नेता आये और न ही कोई पदाधिकारी. भूमि संरक्षण विभाग से तालाब भी नहीं खोदा गया है. एक चापाकल है, जो वर्षों से खराब है. डीप बोरिंग की सुविधा भी नहीं है.

नाले के पानी पर आश्रित : कुंती कुई
विद्यालय की रसोईया कुंती कुई कहती हैं कि नाले के पानी को छोड़ पेयजल के लिए कोई दूसरा साधन उपलब्ध नहीं है. मजबूरन इसी पानी से मध्याह्न भोजन बनाना पड़ता है.