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  • Jan 28 2018 5:29PM

ये बोल-सुन नहीं सकते, लेकिन इनकी प्रतिभा हैरत में डाल देगी

ये बोल-सुन नहीं सकते, लेकिन इनकी प्रतिभा हैरत में डाल देगी

 सुकेश कुमार


पश्चिमी सिंहभूम जिले के चाईबासा के डिलियमार्चा में आशा किरण मूकबधिर आवासीय विद्यालय है. इसमें पढ़नेवाले बच्चे मूकबधिर हैं. वे बोल-सुन नहीं पाते, लेकिन इनकी खेल प्रतिभा और कल्पनाओं की उड़ान आपको हैरत में डाल देगी. फिलहाल यहां 87 विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे हैं. राज्यपाल ने इस विद्यालय को प्लस टू का दर्जा देने की घोषणा की थी, लेकिन अभी तक इसे दसवीं कक्षा के दर्जे का ही इंतजार है.

पढ़ाई के साथ-साथ खेल पर भी जोर
इस विद्यालय में इन्हें न सिर्फ पढ़ाया जाता है, बल्कि पेंटिंग, खेल समेत अन्य गतिविधियों में भी अव्वल बनाने पर जोर दिया जाता है. 87 विद्यार्थियों में 47 छात्रा एवं 40 छात्र हैं. पहली से नौवीं कक्षा तक पढ़ाई होती है. इन्हें भोजन, आवास और परिवहन समेत अन्य सुविधाएं नि:शुल्क दी गयी हैं. स्कूल का संचालन सृजन महिला विकास मंच करता है. इसकी संस्थापक नरगिस खातून हैं.

स्मार्ट क्लास से इन्हें बनाया जा रहा स्मार्ट
बच्चों को स्मार्ट बनाने के लिये सभी कक्षाओं को स्मार्ट क्लास का रूप दिया गया है. इन कक्षाओं में अत्याधुनिक उपकरण लगे हैं. इस स्कूल के बच्चे सोशल साइट्स के माध्यम से विभिन्न जगहों से जुड़े हुए हैं. कक्षा आठ व नौ के बच्चों को कंप्यूटर की शिक्षा के साथ सामान्य ज्ञान पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है.

गुजरात में खेल प्रतिभा का मनवाया लोहा
सातवीं कक्षा के छात्र हिंदू बोदरा ने गुजरात में आयोजित खेल प्रतियोगिता में कांस्य पदक हासिल किया है. नौवीं कक्षा की छात्रा रायमुनी तियू को राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने राजभवन में अच्छी पेंटिंग के लिए सम्मानित किया है. इसके अलावा वह विभिन्न पेंटिंग प्रतियोगिताओं में भी कई बार अवार्ड हासिल कर चुकी है.

30
बच्चों के साथ 2011 में शुरू हुआ था विद्यालय
बच्चों को पेंटिंग, रंगोली, वाद-विवाद प्रतियोगिता, क्विज, नृत्य, झारखंड के शहीदों की जीवनी, संगीत समेत अन्य का प्रशिक्षण दिया जाता है. इसके लिए चार शिक्षक व छह कर्मचारी हैं. इसमें एक शिक्षक मूकबधिर हैं. 30 बच्चों के साथ इस स्कूल की शुरुआत वर्ष 2011 में की गयी थी.

इशारों से बच्चों को सिखाते हैं शिक्षक
स्कूल में ऑडियो-विजुअल क्लासरूम है. इसमें प्रोजेक्टर और स्क्रीन लगा है. बच्चों को प्रोजेक्टर और स्क्रीन पर अल्फाबेट और शब्द दिखाये जाते हैं. शिक्षक होठों के इशारे से इन्हें बोलना सिखाते हैं. इसमें डीफ अल्फाबेट टू हैंड मशीन का उपयोग किया जाता है.

दसवीं का भी नहीं मिला है दर्जा
प्रिंसिपल सुभद्रा बेहरा कहती हैं कि राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू ने इस स्कूल को प्लस टू करने की घोषणा की थी, हालांकि अभी तक स्कूल को 10वीं का ही दर्जा नहीं मिलने के कारण परेशानी हो रही है. मजबूरन कुछ विद्यार्थियों का नामांकन जिला स्कूल, चाईबासा में दसवीं कक्षा में कराया गया है, ताकि वह बोर्ड की परीक्षा दे सकें.

आम इंसान की तरह मूकबधिर बच्चों को मिले शिक्षा : नरगिस खातून
स्कूल की संचालक नरगिस खातून कहती हैं कि इस स्कूल का मुख्य उद्देश्य आम इंसान की तरह ही इन मूकबधिर बच्चों को शिक्षा दिलाना है. स्कूल चलाने में कई बार फंड की समस्या सामने आयी है. फंड की कमी के कारण शिक्षक एवं शिक्षिकाओं को कई महीनों तक मानदेय भी नहीं मिल पाता.उन्होंने कहा कि सरकार से पर्याप्त सहयोग मिले, तो इन मासूमों की दशा-दिशा बदल सकती है.