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  • Mar 27 2018 12:58PM

दलालों के चंगुल से छूटी लड़कियां जगा रही हैं आशा

दलालों के चंगुल से छूटी लड़कियां जगा रही हैं आशा

 पंकज कुमार पाठक


झारखंड की कई बच्चे- बच्चियों को बहला कर दिल्ली, पंजाब, हरियाणा समेत कई दूसरी जगहों में बेच दिया जाता है. मासूम बच्चियां कहीं नौकरानी का काम करती हैं, तो कहीं गलत कामों में फंसा दी जाती है. दलालों के चंगुल से निकलना मुश्किल होता है. अगर किसी तरह छुप कर घरवालों से संपर्क भी करती हैं, तो घरवाले इतने सक्षम नहीं होते कि उन्हें वापस ला सके. ऐसे में गैर सरकारी और सरकारी संगठन की मदद से इन्हें छुड़ा कर वापस लाया जाता है. वापसी के बाद गांव में दोबारा नयी जिंदगी शुरू करना कितना आसान होता है. झारखंड के खूंटी, गुमला, सिमडेगा जैसे इलाकों में दलालों का ग्रुप आज भी सक्रिय है. इसके बाद की स्थिति आज भी कई सवाल खड़े किये हुए है. जिस मजबूरी में आकर लड़कियां शहरों को रुख करती हैं, क्या वो गांव आते हीं दूर हो जाती है? उन बच्चियों के साथ क्या होता है, जो लौटकर अपने गांव आती हैं. कई संस्थाएं इन्हें आसरा देती है. एक नयी जिंदगी की उम्मीद देती हैं. यह आशा जगाती है कि उन्हें भी जिंदगी में सबकुछ हासिल करने का अधिकार है, जिसके वो सपने देखती हैं.


राजधानी रांची से लगभग 25 किमी की दूरी पर रिंग रोड के किनारे भुसूर गांव में दो मंजिला इमारत इन बच्चों के भविष्य की नींव को मजबूत करने में लगी है. यहां वैसे बच्चे हैं ,जो ईंट भट्ठों में काम करते थे. यहां वैसे बच्चे भी शामिल हैं, जिन्होंने पैदा होते ही ईंट भट्ठों की गरमाहट महसूस की. आंख खुली, तो चिमनी से निकलता धुंआ देखा. इस काले धुएं में ही कई बच्चों का बचपन खो गया. आशा संस्था ( एसोसिएशन फॉर सोशल एंड ह्यूमन अवेरनेस) की अध्यक्ष पूनम टोप्पो और सचिव अजय जायसवाल इस क्षेत्र में काम कर रहे हैं. उनकी संस्था में फिलहाल 70 से ज्यादा बच्चे रह रहे हैं. यहां रह रहे हर एक बच्चे की आंखों में सपना है.  
सुनीता ठिठयार 2010 से यहां रह रही है. माता – पिता ईट भट्ठा में काम करते हैं. खूंटी जिले के लिमड़ा पंचायत के रायशिमला की रहने वाली हैं. सुनीता अकेली नहीं है. उनके साथ उसके भाई-बहन भी हैं. सुनीता पुलिस में भर्ती होना चाहती हैं. यहां बच्चों से उनके मां-बाप साल में सिर्फ एक बार आते हैं. बारिश के वक्त ईंट भट्ठों में काम कम होता है. खेती के वक्त मजदूर घर का रुख करते हैं. यही वक्त होता है जब माता-पिता अपने बच्चों से मिल पाते हैं. सुनीता की तरह सुमरी कुमारी, उर्मिला, पर्मिला, राहुल, मुकेश मुंडा, पवन, मनीला, नितेन जैसे कई बच्चे रहते हैं. उर्मिला डांसर बनना चाहती है. कोई फौज में जाना चाहता है, तो टीचर बनना चाहता है. आशा ने इनके जिंदगी में एक नयी रोशनी दी है. हिम्मत दी है एक नया सपना देखने की.

कैसे चलते हैं ऐसे संगठन, कहां से आते हैं पैसे
कई सालों से बच्चों के बचपन को सही दिशा दे रहे अजय बताते हैं कि कभी कोई बड़े संगठन हमारी मदद कर देते हैं, लेकिन साल में कुछ महीने ऐसे होते हैं, जब हमारे पास राशन के लिए पैसे तक नहीं होते. ऐसे में कुछ लोग हैं, जो हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं. सीसीएल कभी अपने सीएसआर फंड से मदद कर देता है, तो कभी अनुराग गुप्ता जैसे लोग एक फोन पर मदद के लिए तैयार रहते हैं. कई मारवाड़ी संगठन मदद करते हैं. इसी तरह बच्चों के जीवन में आशा बनी रहती है.

दलालों से निपट रहीं हैं सहेलियां
साल 2011 में सखी सहेली नाम से एक ग्रुप बना. सुधा ने इस ग्रुप को बनाने में अहम भूमिका निभायी. गांव में एक्टिव दलालों से नौ साल से निपट रही हैं. कई बार धमकियां मिली, लेकिन सखी सहेली एक्टिव होकर काम करती रही. आज खूंटी और रांची में 500 लड़कियों का ग्रुप मिल कर काम कर रहा है. इसके 200 मेंटोर एक्टिव हैं. दलालों को गांव से दूर रखने के लिए लड़कियों ने अपनी किक का इस्तेमाल किया . जागरूकता के लिए हथियार बना फुटबॉल. कई गांवों में टूर्नामेंट का आयोजन किया गया. ऐसी कई लड़कियां आज शानदार फुटबॉलर हैं, जो कभी बड़े शहरों में नौकरानी का काम कर रहीं थी. अब इस खेल और अभियान के जरिये उनकी अलग पहचान है. ग्रामसभा में सखी सहेली अलग पहचान बना रही है. कौशल विकास योजना से जुड़कर गांव में ही ट्रेनिंग ले रहीं है.

मिशाल बन रहीं है कई लड़कियां
सखी- सहेली का पूरा ग्रुप गांव में सक्रिय दलालों पर नजर रखता है. एक बार उन्हें जानकारी मिली कि खूंटी की पांच लड़कियों को बहला-फुसलाकर दूसरे शहर ले जाया जा रहा है. सुधा को जब इसकी जानकारी मिली, तो अपनी टीम के साथ वह हटिया स्टेशन पहुंची और पांचों लड़कियों को दलालों के चुंगल से बचा लिया. उनमें से दो लड़कियां आज अपनी अधूरी पढ़ाई पूरी कर रही हैं. ऐसी कई लड़कियां हैं, जिनके सिर पर परिवार की जिम्मेदारी है. इस ग्रुप की एक लड़की शांति के दो भाई-बहन हैं. पूरे परिवार के जिम्मेदारी उसी के कंधे पर है. लखनऊ में जब उसके फंसे होने की खबर मिली, तो संस्था की मदद से उसे छुड़ा लिया गया, लेकिन पैसे कमाना उसकी मजबूरी थी. शांति को खाना बनाना पसंद है. संस्था ने खाना बनाने की 10 दिनों की ट्रेनिंग के लिए शांति को दिल्ली भेजा. ट्रेनिंग पाने के बाद शांति आज संस्था में बच्चों को खाना बनाकर खिला रही है. साथ ही अपने दो भाई-बहनों को पढ़ा रही है. शांति पहले कहीं भी अकेले आने-जाने से डरती थी. पुरानी यादें उसका पीछा करती थी, लेकिन आशा ने उसे हिम्मत दी और दिल्ली में 10 दिनों की ट्रेनिंग ने हुनर के साथ उसे आत्मविश्वास भी दे दिया. अब शांति कई जगहों पर बिना डरे आ-जा सकती है. शांति समेत फुटबॉल टीम की कई लड़कियां आज उदाहरण बनी हैं. ऐसी कई संस्थाएं हैं, जो मजबूर बच्चों को छोटा व्यापार करने में साथ-साथ अपनी पढ़ाई पूरी करने में मदद करती हैं.

आशा की तरह ऐसी कई सरकारी और गैर सरकारी संस्थाएं हैं, जो इन बच्चों के लिए काम कर रही है.अगर आप भी किसी ऐसे बच्चे को जानते हैं, जो बाल मजदूरी कर रहा है या किसी बड़े शहर में तकलीफों में जिंदगी काट रहा है, तो आप इन जगहों पर संपर्क कर सकते हैं.

आश्रय घर (शेल्टर होम)
रांची, पूर्वी व पश्चिमी सिंहभूम, दुमका, हजारीबाग, बोकारो, धनबाद, गुमला,

(
आइसीपीएस के अधीन)
विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए घर सरकारी संस्थाएं - बोकारो, धनबाद व हजारीबाग

गैर सरकारी संस्थाएं - जामताड़ा, रामगढ़, चाईबासा,जमशेदपुर, हजारीबाग, जामताड़ा, खूंटी, (एनजीओ के अधीन चलने वाले शेल्टर होम्स) सिमडेगा, कोडरमा, पलामू

बोकारो (स्वाधार गृह)