blog

  • Jan 17 2018 11:40PM

झारखंड: सपनों को सच कर दिखानेवाली इन महिलाओं को सलाम

झारखंड: सपनों को सच कर दिखानेवाली इन महिलाओं को सलाम

विजय बहादुर

vijay@prabhatkhabar.in
 www.facebook.com/vijaybahadurranchi/
 twitter.com/vb_ranbpositivevijay@prabhatkhabar.in
 

कहते हैं संघर्ष ही जीवन है. कुछ लोग इसी संघर्ष का रोना रोते रहते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने आगे बढ़ने की जिद ठानी और कदम आगे बढ़ाया. छोटे गांव की बड़ी प्रतिभाओं के हौसले आपको हैरत में डाल देगी. उनके चेहरे का आत्मविश्वास सुकून देता है. पश्चिमी सिंहभूम जिले की जानकी पूर्ति और खूंटी जिले की सरानी कंडुलना की जिद से उनके जीवन में आये बदलाव को जान कर आप भी चौंक जायेंगे. इन्होंने साबित कर दिया है कि छोटे गांवों में भी बड़े सपने पूरे हो सकते हैं.

पार्लर वाली दीदी जानकी 

पश्चिमी सिंहभूम जिले के खूंटपानी प्रखंड के केंदुलोटा गांव की रहनेवाली जानकी पूर्ति, आज अपने इलाके में सफल उद्यमी के रूप में जानी जाती हैं. 2010 के शुरुआती दौर में वो घरेलू महिला थीं. उनके पति खेती-बारी किया करते थे. इससे किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो पाता था. इसके अलावा उन्हें अपने ससुर से घर खर्च के लिए मुश्किल से महीने के 100 रुपये मिलते थे. इसके बावजूद जानकी को पूरा भरोसा था कि उनके जीवन में भी एक नयी सुबह जरूर आयेगी. साल 2013 में इंतजार की घड़ियां खत्म हुई और जानकी आजीविका मिशन से जुड़कर नूतन महिला समिति की सदस्य बन गयीं. सखी मंडल से जुड़ने के बाद जानकी ने छह हजार रुपये कर्ज लेकर सिलाई व ब्यूटीशियन कोर्स में नामांकन कराया. यहीं से बदलाव की कहानी शुरू हुई.

ब्यूटी पार्लर में काम सीखने के साथ-साथ जानकी ने अपने गांव में अपना हुनर आजमाना शुरू कर दिया, ताकि कर्ज को समय पर वापस कर दोबारा कर्ज लेने के लिए आवेदन करने के योग्य हो सके. छह महीने का कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने सखी मंडल के सीआइएफ, सामुदायिक निवेश फंड से 30 हजार रुपये कर्ज लेकर बाजार में एक ब्यूटी पार्लर खोला. जानकी आज अपने इलाके में पार्लरवाली दीदी के नाम से जानी जाती हैं. साथ ही कॉस्मेटिक उत्पादों को बेचना और सिलाई का काम भी शुरू किया. आज जानकी लघु उद्यम के माध्यम से करीब 10 हजार रुपये हर महीने कमा लेती हैं. अपने हौसले के बूते जानकी की सफलता की इस कहानी से आज खूंटपानी की सैकड़ों महिलाएं प्रभावित हैं. आज वो सखी मंडल की बहनों के लिए एक मिसाल हैं.

जिद से सरानी की बदल गयी जिंदगी 

राजधानी रांची से खूंटी के रास्ते आगे बढ़ने पर एक छोटी-सी जगह है कालामाटी़. खूंटी से पहले कालामाटी पांच टोलों का गांव है. उन्हीं पांच टोलों में से एक छोटे टोले तिरिलटोली की रहनेवाली है सरानी कंडुलना़. उम्र लगभग 34-35 साल. जेएसएलपीएस में जीवन ज्योति सखी मंडल से जुड़ी हैं. वर्ष 2015 में आजीविका की सदस्य बनीं. सदस्य बनने के बाद से सरानी के जिंदगी में बड़ा बदलाव आया. अब वह सपने देखती हैं. सपनों को लक्ष्य की तरह लेती हैं, फिर उसे पूरा करने की जिद ठानती हैं और एक-एक कर उसे पूरा भी कर रही हैं.
 
छोटे-बड़े कर्ज लेकर जिंदगी की कहानी बदल रही हैं. पांच बच्चे हैं. पांचों बेहतर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं. उनकी चाहत है कि रोजमर्रा के जीवन-यापन के लिए जो संघर्ष उन्हें करना पड़ा, उनके बच्चों को उससे पाला न पड़े. फिलहाल मशरूम की खेती की तैयारी में लगी है. इसके लिए 20 हजार रुपये का कर्ज लिया है. मशरूम के पहले बेर और कुसुम के पेड़ पर लाह लगा चुकी है.

मछली पालन भी थोड़ा बहुत करने की तैयारी में लगी है. अपनी जिंदगी में आये बदलाव और संघर्ष के सवाल पर सरानी कहती हैं कि हम सात भाई-बहन हैं. बाबा के पास इतने पैसे नहीं होते थे कि वे अच्छे से अपने बच्चों को पढ़ा सके. जीवन-यापन के लिए धान की खेती से अनाज तो आ जाता था, लेकिन पैसे नहीं होते थे, तो मैंने मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ दी, ताकि मेरे और भाई-बहन भी पढ़ सकें. स्कूल में पढ़ाई करती थी, तभी छुट्टी के दिनों में पत्थर तोड़ने भी जाया करती थी. 10 घंटे पत्थर तोड़ने के बदले मात्र 20 रुपया मिलता था. मैट्रिक के बाद पढ़ाई छोड़ी, तो चूड़ी बनाने की ट्रेनिंग गांव में ही ली. चूड़ी बनाने और बेचने लगी, लेकिन उसमें बचत नहीं होता था. तब झारसुगड़ा से झाड़ू लाकर हाट-बाजार में बेचने लगी. साल 1995 में शादी हुई. पांच बच्चे भी हो गये. साल 2011 में अचानक पति गुजर गये, तो विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा. कइयों ने सलाह दी कि अभी उम्र ही क्या हुई है, फिर से शादी कर लो, पूरा जीवन पहाड़ बन जायेगा, लेकिन मैं इस मामले में बहुत साफ थी. भले जिंदगी पहाड़ जैसी लगे, संघर्ष होगा तो उससे लड़ूंगी, लेकिन दोबारा शादी नहीं करूंगी.

2015 तक जिंदगी की गाड़ी इसी तरह एक-एक दिन संघर्ष करने में गुजरती रही. फिर 2015 में गांव में सखी मंडल बनना शुरू हुआ. मैं भी सखी मंडल से जुड़ीं. थोड़ी पढ़ी-लिखी थी, तो सखी मंडल में बुक कीपिंग का काम मिला. सप्ताह में 10 रुपये मिलने लगे. उसी 10 रुपये को जमा भी करने लगी. इसी बीच समूह से छोटा कर्ज लेकर सिलाई का काम करना शुरू किया. घर में सिलाई कर उसे जोड़ापुल खूंटी, हुटार, सतरंजी एवं दस माइल जैसे बाजारों में जाकर बेचने लगी. व्यापार के हिसाब से अगर फायदा देखें, तो बहुत ज्यादा नहीं था, लेकिन यह इसलिए ज्यादा लग रहा था, क्योंकि पहली बार साहूकारों के कर्ज के झमेले से निकली थी. 

पहले साहूकार से 20 प्रतिशत सूद पर कर्ज लेती थी. उसी कर्ज को चुकाने में ही पूरी कमाई और बचत चली जाती थी. समूह से जुड़ कर सिलाई का काम करते-करते ही आजीविका मिशन ने सक्रिय सदस्य भी बना दिया. अब जिम्मेदारी बढ़ गयी. रोज मीटिंग में जाना, दीदियों से मिलना, उनसे संवाद करना और खुद को आगे बढ़ने की जानकारी मिलने के बाद मैंने भी व्यापार बदलने को सोची. लाह की खेती से जुड़ गयी. यह भी रास नहीं आया, तो मशरूम की खेती करने को सोची. इसके के लिए बीज लेकर आयी. मशरूम बेचने के सवाल पर सरानी हंसते हुए कहती हैं कि आजीविका मिशन से जुड़ कर दुनिया ही तो समझी हूं. वह सब पता कर चुकी हैं कि इसका उत्पादन कर उसे कहां ले जाना है. सरानी हंसते हुए कहती हैं कि अब सोचती कम हूं और करती ज्यादा हूं.