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  • Dec 19 2017 1:07PM

सफल वही है, जिसे लोग सफल मानते हैं

सफल वही है, जिसे  लोग सफल मानते हैं

विजय बहादुर

twitter.com/vb_ranbpositive


डॉ 
रूप राय चौधरी, पश्चिम बंगाल के राइट टू पब्लिक सर्विस कमीशन में चीफ कमिश्नर हैं. वह मूल रूप से पश्चिम बंगाल के हैं, लेकिन झारखंड से उनका गहरा नाता है. कई संस्थानों में शीर्ष पदों पर रह चुके डॉ राय चौधरी बेस्ट सीइओ अवार्डी हैं. वह कहते हैं कि सही मायने में सफल वही है, जिसे लोग सफल मानते हैं.
 

बीआइटी मेसरा से की है इंजीनियरिंग : पश्चिम बंगाल के राइट टू पब्लिक सर्विस कमीशन में चीफ कमिश्नर डॉ अरूप राय चौधरी मूलतः पश्चिम बंगाल के हैं, लेकिन गर्व से झारखंड और अविभाजित बिहार के साथ अपनी तीन पीढ़ी के जुड़ाव का बखान करते नहीं थकते. उनके पिताजी अविभाजित बिहार में मेदिनीनगर(डालटनगंज) में पहले चीफ इंजीनियर थे. पिताजी की नौकरी के कारण डॉ चौधरी के जीवन का आरंभिक करीब 22 वर्ष अविभाजित बिहार में ही बीता.पटना के सेंट जेवियर्स और सेंट माइकल स्कूल से इनकी स्कूलिंग हुई. बीआइटी मेसरा से इंजीनियरिंग के बाद उन्होंने आइआइटी (दिल्ली) से मास्टर्स व पीएचडी किया.

वर्ष 2001 था जीवन का टर्निंग प्वाइंट : प्रोफेशनल करियर की शुरुआत डॉ चौधरी ने एनपीसीसी से की. इसके बाद राइट्स इंडिया, इरकॉन मलेशिया और डीएलएफ जैसे नामी संस्थानों में शीर्ष पदों पर काम किया, लेकिन वर्ष 2001 उनके जीवन का टर्निंग प्वाइंट था. सिर्फ 44 वर्ष की उम्र में वो एनबीसीसी के सीएमडी बन गये. कम उम्र होने के बावजूद उन्होंने एनबीसीसी की दशा और दिशा बदल दी. वर्ष 2010 में डॉ चौधरी ने एनटीपीसी में सीएमडी के रूप में कार्यभार संभाला और वर्ष 2015 में रिटायर होने तक एनटीपीसी को नयी बुलंदियों तक पहुंचाया. इस दौरान वो डीवीसी के चेयरमैन भी रहे.

मिला है बेस्ट सीइओ का अवार्ड : बीआइटी मेसरा में आज भी डॉ अरूप रॉय चौधरी की गिनती पब्लिक सेक्टर में बेहतर करियरवाले छात्र के रूप में की जाती है. डॉ चौधरी को तेर्रापिन्न द्वारा एशिया सीइओ ऑफ द ईयर (2012) और फोर्बेस इंडिया लीडरशिप द्वारा बेस्ट सीइओ पब्लिक सेक्टर (2014 ) का अवार्ड मिला है. डॉ चौधरी की दो किताबें मैनेजमेंट बाई इडियट्स और देलहीज न्यू मोती बाग भी प्रकाशित हुई हैं और तीसरी किताब टाइगरस टू राइडिंग जल्द प्रकाशित होगी.

पारिवारिक पृष्ठभूमि : डॉ चौधरी कहते हैं कि उनकी मां और पिता दोनों ही गुलाम भारत में पैदा हुए. पिता पटना में प्रवासी बंगाली थे और बहुत कम उम्र से ही अपने चाचा से प्रभावित थे. उनके चाचा पटना के राजा राम मोहन राय स्कूल के उन विद्यार्थियों के शिक्षक थे, जिन्होंने पटना सचिवालय पर तिरंगा फहराने की कोशिश में अंग्रेजों की गोलियां सीने पर खायी थीं. अपनी मां के बारे में डॉ चौधरी बताते हैं कि उनकी मां का जन्म रंगून (वर्मा) में हुआ था. उनके नाना जी का परिवार दूसरे विश्वयुद्ध तक रंगून में रहा. उनकी नानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बचपन की साथी थीं. नेताजी की बालिका सेना में उनकी मां मात्र 13 साल की उम्र में शामिल हो गयी थीं. डॉ चौधरी बताते हैं कि उनके दादा जी ने अपना जीवन शून्य से शुरू किया. उन पर एक विधवा मां, दो बहनें और दो भाइयों का जीवन संवारने की जिम्मेवारी थी. ऐसा कहा जाता है कि उनके पिता को गणित के शिक्षक ने 100 में 110 नंबर दिये थे. परिवार की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण उनके पिता पर इंटरमीडिएट के तुरंत बाद नौकरी करने का दबाव था, लेकिन उन्होंने इंजीनियर बनने का प्रण लिया था. उन्होंने पटना इंजीनियरिंग कॉलेज में नाम लिखवाया. 1950 में वे बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन की परीक्षा में शामिल हुए और टॉपर बने.

डॉ चौधरी स्वामी विवेकानंद की पंक्तियों को प्रेरणाश्रोत मानते हैं कि इस धरती पर आये हो, तो अपनी छाप छोड़ जाओ, अन्यथा एक इंसान और पेड़-पत्थर में क्या अंतर है? पेड़-पत्थर भी तो लंबे समय तक धरती पर मौजूद रहते हैं.

सभी को जीवन में मिलते हैं मौके 

सफलता का राज पूछने पर काफी शालीनता से कहते हैं कि आप अपने आपको कितना भी सफल मान लें, जब तक लोग आपको सफल नहीं समझते हैं, तब तक उसका कोई मायने नहीं है. जीवन में हर किसी को मौके मिलते हैं. ये साबुन के बुलबुले की तरह आपके पास आता है. ये आपके ऊपर निर्भर है कि आप सही बुलबुले की पहचान कर उसे आगे बढ़ाएं. डॉ चौधरी अपने को सकारात्मक निराशावादी मानते हैं. 

सफलता के सूत्र

  • सफलता का आकलन तय लक्ष्य पर किया जा सकता है और यह समय के साथ बदलता है. लक्ष्य में बदलाव प्रोफेशनल, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक और परिपक्वता के आधार पर होता है
  • इंसान की सफलता उसके आस-पास के लोगों से जुड़ी होती है. किसी की गिनती सफल व्यक्ति के रूप में इसलिए की जाती है, क्योंकि समाज का उसके प्रति नजरिये में बदलाव होता है
  • जीवन में तरक्की का रास्ता दूसरे को देने और त्याग से होकर गुजरता है. अगर उसे लगता है कि वो सफल होने के लिए त्याग कर रहा है, तो वो अपनी उपलब्धियों का कभी भी आनंद नहीं उठा सकता है
  • सफल होने के लिए लीडर बनना होगा. बिजनेस लीडर चुना जाता है, न कि मनोनीत होता है. लीडर में क्षमता चाहिए िक वो टीम को निर्देशित कर सके व अपने सहयोगियों से काम करा सके. लीडर को समय से आगे रहने की जरूरत है, जो जरूरत पड़ने पर कुर्सी का भी त्याग कर सके