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  • Feb 16 2018 11:37AM

गोमिया की सपना के असहनीय तकलीफों में भी जीवन को आगे बढ़ाने की कहानी

गोमिया की सपना के असहनीय तकलीफों में भी जीवन को आगे बढ़ाने की कहानी


सपना के जीने की जिद को सलाम


विजय बहादुर
vijay@prabhatkhabar.in
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भोजन करते वक्त गले में खाना फंसता है, तो हाथ खुद ब खुद पानी की तरफ बढ़ जाता है. पानी पीते वक्त सरक जाते हैं, तो आंखें खोलना मुश्किल हो जाता है. ये कहानी ऐसे ही अंतहीन दर्द की है, जिससे 'सपना' हर रोज गुजरती है. खाना खाने से पहले हर दिन उन्हें असहनीय दर्द से गुजरना पड़ता है. सपना की कहानी न सिर्फ अंधविश्वास से दूर रहने की सीख देती है, बल्कि साबित करती है कि इससे सिर्फ तकलीफ और दर्द ही मिल सकता है. ऐसे में सपना के जीने की जिद सबके लिए प्रेरणा है.

अंधविश्वास ने उजाड़ा भरा-पूरा परिवार 

वर्ष 1999 की बात है. बोकारो जिले के गोमिया में भोला स्वर्णकार का परिवार मंदी से गुजर रहा था. परिवार का बड़ा बेटा गोपाल के गले में जादू था. वह कई जगहों पर कार्यक्रम कर चुका था. दूसरा बेटा घनश्याम और दो बेटियां आशा और सपना. उस जमाने में इनके पास एंबेसडर कार थी. परिवार समृद्ध था, लेकिन मंदी के कारण दुकान ठप पड़ गयी थी. इससे परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गयी थी. इस विपरीत परिस्थिति में परिवार अंधविश्वास की गिरफ्त में इस कदर आ गया कि कुछ भी करने को तैयार था. इसका फायदा उठाते हुए घर के ठीक सामने रहनेवाले व्यक्ति ने ईर्ष्या में भोला स्वर्णकार को तेजाब देते हुए कहा कि इस पानी को पूरे परिवार को पिला दो, इससे परिवार पर लगी नजर खत्म हो जायेगी. भोला घर आकर अपने परिवार के साथ उसे पीने बैठे. जैसे ही तेजाब उनकी जुबान पर गयी, वो समझ गये कि यह तेजाब है. उन्होंने अपनी छोटी बेटी सपना और घनश्याम के हाथ से तेजाब फेंक दिया. घनश्याम तो पूरी तरह बच गये, लेकिन सपना के गले में तेजाब का कुछ अंश पहुंच गया. इलाज के दौरान पिता भोला स्वर्णकार, भाई गोपाल और बहन आशा की मौत गयी, जबकि सपना को गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती कराया गया. इस घटना से भरा-पूरा परिवार उजड़ गया. 

जान बची, लेकिन जीना हुआ दूभर

सपना की जान तो बच गयी, लेकिन जीना मुश्किल हो गया. डॉक्टर हैरान थे कि इलाज कैसे किया जाये. तेजाब से चेहरा जलने या शरीर के किसी भाग को इससे नुकसान पहुंचने जैसे केस आते हैं, लेकिन सपना के गले से तेजाब नीचे उतर गया था, जिसने खाने की नली को पूरी तरह जल दिया था. डॉक्टर बार-बार प्रयोग करते, फिर ऑपरेशन करते, लेकिन इलाज करने में सफल नहीं हो सके. आखिरकार उन्होंने स्थायी इलाज को काफी खर्चीला बताते हुए कहा कि सपना डाइलेटर के जरिये ही जिंदा रह सकती है. मुंबई में तीन वर्षों तक इलाज चला. इस दौरान उनकी मां और छोटा भाई साथ था. इलाज में परिवार की सारी संपत्ति बिक गयी.

खाने से पहले हर दिन दर्द से गुजरती हैं सपना

हर दिन खाना खाने से पहले सपना को लगभग ढाई फीट की पाइप गले के अंदर ले जाने की मजबूरी है. पाइप की मोटाई आधा इंच है. गले में सूखी पाइप नहीं जा सकती. इसलिए डॉक्टरों ने एक मरहम दिया है, जिसे पाइप पर लगाकर गले के अंदर ले जाना पड़ता है. इसमें उन्हें एक घंटे का वक्त लगता है. गले के अंदर इसे 45 मिनट रखना पड़ता है. यही वक्त है जब गले की नली खुलती है. इस पूरी प्रक्रिया के बाद सपना हल्का व गीला खाना खा पाती हैं. जीने के लिए सपना को हर दिन इस अंतहीन तकलीफ से गुजरना पड़ता है. 

नगर निगम में करती हैं काम

सपना की शादी वर्ष 2006 में हुई थी. उनके दो बच्चे हैं. बेटी सलोनी (आठ वर्ष) और बेटा अनमोल (छह वर्ष). पति सिकंदर साव उनका बखूबी साथ देते हैं. सपना नगर निगम में काम करती हैं. इसके लिए उन्हें रोजाना लगभग 30 किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है.

परिवार, समाज का मिला सहयोग

सपना पूरी तरह ठीक होकर आम इंसान की तरह जीना चाहती हैं. उनके बच्चे पढ़-लिख कर बेहतर बन सकें. इसके लिए वह प्रयासरत हैं. वह बताती हैं कि भाई घनश्याम और मां के कारण ही वह जीवित हैं. इन दोनों ने उनके लिए सब कुछ दांव पर लगा दिया. दीदी और जीजा ने भी हमेशा ख्याल रखा. समाज ने काफी सहयोग किया. 

आज सपना तेजाब पीड़ित महिलाओं और महिला सशक्तीकरण के लिए काम करनेवाली संस्था आसरा से जुड़ कर काम कर रही हैं, ताकि किसी और सपना को ऐसा दिन नहीं देखना पड़े.