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  • Oct 3 2019 2:26PM

पइला निर्माण से जुड़े हैं रेगे गांव के ग्रामीण

पइला निर्माण से जुड़े हैं रेगे गांव के ग्रामीण

पंचायतनामा टीम
प्रखंड : मांडर
जिला : रांची 

मांडर-बुढ़मू मुख्य सड़क के किनारे 30 परिवारों वाला एक गांव है रेगे. मांडर प्रखंड की करगे पंचायत अंतर्गत इस गांव के मलार कॉलोनी की अलग पहचान है. लगभग तीन दशक से गांव मलार कला का मुख्य केंद्र रहा है. पइला (चावल, धान तौलने का बर्तन) ढीबरी यानी दिया के अलावा चंदवा, पैरो (गहना), घूंघरू, लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति आदि बनाने का काम काफी पहले से होता आ रहा है. ग्रामीण बताते हैं कि जब उनके पूर्वज 70 के दशक में यहां आये थे, तब उनके पास घरेलू इस्तेमाल की वस्तुएं बनाने के अलावा कोई हुनर नहीं था. उनके हुनर को देखते हुए उन्हें उस वक्त वहां पर घर बनाने के लिए जगह दी गयी, ताकि आस-पास के ग्रामीणों को पइला और पारंपरिक गहना मिलने में आसानी हो. तब से लेकर आज तक यहां के लोग पूर्वजों का सिखाया काम कर रहे हैं. इनके द्वारा बनायी गयी ढीबरी से कई घर रोशन हैं.

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हर घर के बाहर दिखता है पइला
मुख्य रूप से मलार कॉलोनी के ग्रामीण पइला और ढीबरी बनाने का काम करते हैं. ग्रामीण क्षेत्रों में पइला घर में रखना शुभ माना जाता है, खास कर किसान परिवारों के यहां पइला होना जरूरी है. इससे ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीण चावल, धान, गेहूं, मड़ुआ की खरीद-बिक्री करते हैं, हालांकि अब पइला से माप कर खरीद-बिक्री करने का प्रचलन धीरे-धीरे कम हो रहा है. इसके बावजूद इस कला को आज कुछ लोग जिंदा रखे हुए हैं. गांव के हर घर में पइला बनाने का काम होता है. यह काफी मेहनत भरा काम है. इसे बनाने के लिए जंगल से मिट्टी लानी पड़ती है. घर के पास की टांड़ जमीन की मिट्टी का भी उपयोग होता है. पइला के ऊपर डिजाइन बनाने के लिए अलकतरा का उपयोग किया जाता है. एल्युमीनियम को पिघलाने के लिए लकड़ी की आवश्यकता पड़ती है.

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मेले व बाजारों में बिकते हैं सामान
अपने बनाये सामानों को बेचने के लिए मलार आज भी मेले और स्थानीय बाजारों पर ही निर्भर हैं. झारखंड के विभिन्न जिलों में आयोजित होनेवाले मेलों में वो जाते हैं और वहां अपने उत्पाद बेचते हैं. इसके अलावा स्थानीय बाजार में भी इनके बनाये सामानों की बिक्री होती है. कुछ लोग घर से भी खरीद कर ले जाते हैं. बेहतर बाजार का नहीं होना एवं समाज का आधुनिक होना इनकी परेशानी का सबब बनने लगा है. ग्रामीण बताते हैं कि पहले वो गांव-गांव जाकर अपने उत्पाद बेचते थे और बदले में धान लेते थे. अब यह भी लगभग बंद सा हो गया है.

परंपरा से पारंपरिक चीजें चलती हैं : संजय मलार
इस पेशे से जुड़े संजय मलार मानते हैं कि पारंपरिक चीजों का अच्छा बाजार हो, इसके लिए पंरपरा को निभाना होगा. हम पारंपरिक चीजें बनाते हैं, लेकिन लोग परंपरा से दूर भाग रहे हैं, तो हमारे उत्पाद की बिक्री कैसे होगी. पूरे गांव के लोग इस धंधे पर निर्भर हैं. हमें आगे बढ़ने के लिए समय के साथ उन्नत तकनीक सीखनी होगी. हमारे पास पूंजी का अभाव है. इस कारण अधिक उत्पादन नहीं कर पाते हैं.

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इस पेशे में आने लगी कई चुनौतियां : मनपूरन मलार
मनपूरन मलार बताते हैं कि यह बहुत मेहनत का काम है. दिनभर काम करने के बाद एक या दो पइला ही तैयार हो पाता है. हमेशा इसे बेच नहीं सकते हैं. पूर्वजों से यह काम सीखा है और आज तक निभा रहे हैं. अब इस पेशे को आगे बढ़ाने में कई चुनौतियां हैं. बच्चों का जाति व आवासीय प्रमाण पत्र नहीं बन पाता है. इस कारण उच्च शिक्षा प्राप्त करने में भी समस्या आ रही है.

सरकार मदद करे, तो हम बेहतर कर सकते हैं : जयप्रकाश मलार
जयप्रकाश मलार रांची के होटवार में अपना हुनर दिखा चुके हैं. उन्हें नेशनल गेम्स के मोमेंटो बनाने के लिए बुलाया गया था. उस समय झारखंड समेत दूसरे राज्यों के भी कलाकार आये थे. समस्याओं का जिक्र करते हुए बताते हैं कि बाजार की परेशानी है. अगर हमें प्रशिक्षित किया जाये, तो हम पारंपरिक चीजों के अलावा दूसरी वस्तुओं का भी निर्माण कर सकते हैं. इससे हमारे समाज का विकास होगा.