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  • Sep 3 2019 1:33PM

देसी मुर्गी पालन को बढ़ावा दे रहे जाराडीह के ग्रामीण

देसी मुर्गी पालन को बढ़ावा दे रहे जाराडीह के ग्रामीण

पंचायतनामा टीम
प्रखंड: अनगड़ा
जिला: रांची 

देसी मुर्गा खाना लोग पसंद करते हैं. यह बॉयलर मुर्गा से ज्यादा फायदेमंद है. देसी मुर्गी को लोग अभी भी पारंपरिक तरीके से ही पालते हैं. इस कारण अधिक मुनाफा नहीं हो पाता है. अगर बेहतर प्रबंधन के साथ देसी मुर्गी फार्म खोला जाये, तो इससे भी अच्छी कमाई हो सकती है. राजधानी रांची के अनगड़ा प्रखंड अंतर्गत जाराडीह गांव के बलिराम बेदिया देसी मुर्गी फार्म से अच्छी कमायी कर रहे हैं

कम मेहनत में अधिक मुनाफा
देसी मुर्गी पालन में हाइब्रिड मुर्गी पालन की अपेक्षा कम मेहनत लगती है. इसके कारोबार में लागत भी कम आती है. इसके तहत सात गुना पांच फीट के आकार का शेड बनाया जाता है, जहां बांस के रैक बनाये जाते हैं और उसमें बांस लटका दिया जाता है, ताकि मुर्गी प्राकृतिक माहौल में रह सके. जगह निर्धारित होने के कारण मुर्गी उसी शेड में आकर एक निर्धारित जगह पर अंडा देती है और चूजा निकालने के लिए उसके ऊपर बैठती है. सभी चूजे और मुर्गियों को समय-समय पर वैक्सीन दिया जाता है, ताकि बीमारी से बचे रहें. खाने के लिए चावल, मकई, अजोला और दीमक दिया जाता है. चारा उत्पादन के लिए किसान के घर के चारों ओर झाड़ी से घेराव किया जाता है और जो जगह बचती है, वहां मकई की खेती की जाती है. अजोला उत्पादन किया जाता है. सूखी लकड़ियां रखकर दीमक पालन किया जाता है. लत्तेदार पौधे लगाये जाते हैं. कीट को मुर्गियां खाती हैं. घेराव होने का फायदा यह होता है कि फार्म की मुर्गियां दूसरी मुर्गियों के संपर्क में नहीं आती हैं. संस्था उद्योगिनी द्वारा ग्रामीणों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग प्रदान किया जा रहा है.

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30 परिवार देसी मुर्गी पालन से जुड़े
टाटी पंचायत के जाराडीह गांव के 30 परिवार देसी मुर्गी पालन से जुड़े हैं. विकास महिला समूह, जाराडीह के बैनर तले यह कार्य हो रहा है. इसके तहत एक ब्रीडर फार्म बनाया गया है, जहां से किसान चूजा खरीद सकते हैं. फिलहाल किसान जोन्हा बाजार में जाकर मुर्गी बेचते हैं, जहां उन्हें अच्छी कीमत मिलती है. पर्व-त्योहार के दौरान 500-800 रुपये तक प्रति मुर्गा की कीमत मिलती है. जाराडीह के अलावा टाटी गांव के 24 परिवार भी देसी मुर्गी पालन कर रहे हैं.

एटीएम है देसी मुर्गी फार्म : मालती देवी
मालती देवी बताती हैं कि मुर्गी पालन के लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया गया. वैक्सीनेशन का भी प्रशिक्षण दिया गया. देसी मुर्गी फार्म से काफी लाभ है. अब बाजार जाने के लिए पैसों की दिक्कत नहीं होती है. एक मुर्गी को बाजार ले जाते हैं और उसे बेच कर सामान खरीद कर घर आ जाते हैं. यह हमारे लिए एटीएम की तरह है.

देसी मुर्गी पालन में कम मेहनत : पैरो देवी
पैरो देवी पहले से घर में मुर्गी पालन करती थीं, पर उतना मुनाफा नहीं था. अब शेड बनाकर मुर्गी पालन करने से मुनाफा होगा, हालांकि अभी तक इनके चूजे तैयार नहीं हुए हैं, पर त्योहार के दौरान इसके अच्छे दाम मिलते हैं. आदिवासी समाज में पूजा-पाठ के दौरान भी अच्छी कीमत मिलती है.

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अब मुर्गी नहीं मरती है : कुलमनी देवी
कुलमनी देवी बताती हैं कि पहले गांव में मुर्गी की बीमारी आने पर पूरे गांव की मुर्गियां मर जाती थीं. अब वैक्सीनेशन हो जाता है, जिससे मुर्गी नहीं मरती है. बाउंड्री होने से मुर्गियां दूसरी मुर्गियों के संपर्क में नहीं आती हैं और बीमारी से बची रहती हैं.

आमदनी का अच्छा जरिया है : बुधनी देवी
बुधनी देवी बताती हैं कि गांव की महिलाओं के लिए रोजगार का यह बेहतर विकल्प है. खेती-बारी और बकरी पालन के साथ इसे कर सकते हैं. वो खुद घर का काम करने के बाद बकरी चराने जाती हैं. सिर्फ सुबह और शाम में मुर्गी को शेड में जाकर देख लेती हैं और उनकी संख्या गिन लेती हैं.