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  • May 4 2019 4:53PM

मानव सभ्यता की भाषा की प्रतीक है सोहराय व कोहबर कला

मानव सभ्यता की भाषा की प्रतीक है सोहराय व कोहबर कला

संजय सागर
जिला: हजारीबाग 

सोहराय और कोहबर कला हमारी सभ्यता-संस्कृति की प्रतीक है. सोहराय कला मानव व पशुओं के बीच गहरा प्रेम स्थापित करती है. यह पर्व देश के मूल निवासियों के लिए एक विशेष त्योहार है, क्योंकि देश के अधिकतर मूल निवासी खेती-बारी पर निर्भर हैं. खेती-बारी का काम बैल व भैंसों के माध्यम से किया जाता है. इसलिए सोहराय पर्व में पशुओं की पूजा मां लक्ष्मी की तरह की जाती है. इस दिन बैल व भैंसों को पूजा कर किसान वर्ग धन-संपत्ति मेें वृद्धि की मांग करते हैं. सोहराय पर्व झारखंड के सभी जिलों में मनाया जाता है. इसकी शुरुआत दामोदर घाटी सभ्यता की इस्को गुफा से हुई थी. यहां आज भी सोहराय कला प्राचीन मानवों द्वारा बड़े-बड़े नागफनी चट्टानों में बनायी गयी है. इसे शैलचित्र या शैल्दीर्घा भी कहा जाता है.

सोहराय व कोहबर कला का जन्म इस्को गुफा से
ऐतिहासिक शैलचित्रों के आधार पर माना जाता है कि सोहराय का पर्व झारखंड के बड़कागांव से शुरू हुआ था. इसका प्रमाण दामोदर घाटी सभ्यता की प्राचीन इस्को गुफा के शैलचित्रों में देखने को मिलता है. इतिहासकारों के अनुसार, इस्को गुफा के शैलचित्र सुमेर घाटी सभ्यता के समकक्ष माने जाते हैं. सुमेर घाटी सभ्यता विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता मानी जाती है, लेकिन अब इस पर्व को मनाने की परंपरा झारखंड के अन्य राज्यों में भी है. इसके अलावा छत्तीसगढ़, उत्तराखंड, बिहार एवं देश के अन्य आदिवासी इलाकों में मनाया यह मनाया जाता है.

बड़कागांव क्षेत्र में हुई शुरुआत
सोहराई एक कला है. इसका प्रचलन हजारीबाग जिले के बड़कागांव के आसपास के क्षेत्र में कई वर्षों पूर्व शुरू हुआ था. इस क्षेत्र की इस्को पहाड़ियों की गुफाओं में आज भी इस कला के नमूने देखे जा सकते हैं. कहा जाता है कि करणपुरा राज व रामगढ़ राज के राजाओं ने इस कला को काफी प्रोत्साहित किया था. इसी वजह से यह कला गुफा की दीवारों से निकलकर घरों की दीवारों पर अपना स्थान बना पाने में सफल हुई, लेकिन अब अत्याधुनिक व फैशन के जमाने में सोहराय कला धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है. ग्रामीण क्षेत्रों में सोहराय व कोहबर कला का आज भी प्रचलन है.

आज भी जिंदा है सोहराय व कोहबर कला
हजारीबाग जिले के बड़कागांव, केरेडारी, टंडवा प्रखंड के गांवों में आज भी सोहराय एवं कोहबर कला देखने को मिलती है. गांव में विभिन्न पर्व-त्योहार एवं शादी-विवाह के अवसर पर महिलाएं दीवारों पर अपनी उत्कृष्ट कला उकेरती हैं. बड़कागांव की सोमरी देवी, पचली देवी, सारो देवी, पातो देवी, रुकमणि देवी आज भी शादी-विवाह या कोई पर्व-त्योहार के अवसर पर सोहराय चित्रकला बनाती हैं. इस कला के पीछे एक इतिहास छिपा है. इस कला से जुड़ीं महिला कलाकार कहती हैं कि कर्णपुरा राज में जब किसी युवराज का विवाह होता था और जिस कमरे में युवराज अपनी नवविवाहिता से पहली बार मिलते थे, उस कमरे की दीवारों पर यादगार के लिए कुछ चिह्न अंकित किये जाते थे. ये चिह्न अधिकतर सफेद मिट्टी, लाल मिट्टी, काली मिट्टी या गोबर से बनाये जाते थे. इस कला में कुछ लिपि का भी इस्तेमाल किया जाता था, जिसे वृद्धि मंत्र कहते थे.

हजारीबाग जिला प्रशासन ने सोहराय कला को किया प्रोत्साहित
सोहराय कला को हजारीबाग जिला प्रशासन ने काफी प्रोत्साहित किया है. सोहराय और कोहबर कला को प्रोत्साहन देने का काम तत्कालीन उपायुक्त डॉ मनीष कुमार ने किया. इसके बाद तत्कालीन उपायुक्त मुकेश कुमार ने इस कला को स्वच्छता अभियान में शामिल किया, जिससे हजारीबाग जिले के शहर व गांव के दीवारों में सोहराय व कोहबर कला दिखने लगी. इस अभियान में कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय, बड़कागांव की छात्रा नीलम कुमारी, प्रीति कुमारी, सोनाक्षी कुमारी, ममता कुमारी, प्रिया कुमारी, छाया कुमारी, मालती कुमारी के साथ वार्डेन निशि रानी ने दीवारों में इस कला को उकरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी.