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  • Jan 22 2018 4:47PM

बालुडीह गांव से बालू गायब, अब हैं पक्की सड़कें

बालुडीह गांव से बालू गायब, अब हैं पक्की सड़कें

कभी बुनियादी सुविधाओं का था घोर अभाव, अब बदल रही है गांव की तस्वीर
नीलम कुमारी मिश्रा
कभी बालुडीह में बालू हुआ करता था, जहां बच्चे कबड्डी खेला करते थे. बचपन के दिनों के साथ बालू गायब हो गये. अब पक्की सड़कें हैं. पलाश और आम के पेड़ भी अब खोजने से नहीं मिलते. पलाश के फूलों से और इनके झुरमुटों में छिपने-पकड़ने का खेल भी सपना हो गया. आज बच्चों में क्रिकेट का जुनून है. बरसात में अब कोई हाथ में चप्पल-जूता उठाकर सड़क पर चलता नहीं दिखता. ढिबरी बारने के दिन भी गये. बिजली और स्ट्रीट लाइट की दूधिया रोशनी है. पहले गिनती के पढ़े-लिखे लोग थे. अब हर घर में पढ़ा-लिखा मिल जायेगा. बदलाव की ये कहानी पलामू जिले के पांकी प्रखंड की नवडीहा पंचायत के बालुडीह गांव की है. यहां कभी बुनियादी सुविधाओं का कभी घोर अभाव था. गांव में बिजली आना किसी चमत्कार से कम नहीं था. वक्त के साथ सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन अब भी कई सुविधाएं जरूरी हैं. धीरे-धीरे ही सही बालुडीह की तस्वीर बदल रही है. नक्सल प्रभावित बालुडीह पांकी प्रखंड मुख्यालय से चार किलोमीटर दूर है. पांकी-रांची मुख्य सड़क के सोरठ से पूर्व दिशा में नावाडीह के बाद है. गांव में प्रवेश करते ही करीब 100 साल पुराना विशाल बरगद का पेड़ आपका स्वागत करता है. यहां कभी बालू, पलाश और आम के पेड़ काफी संख्या में हुआ करते थे. चारों तरफ हरियाली थी.
धीरे-धीरे बदली गांव की सूरत
वर्ष 1985 में भुइयां टोली में  पांकी के पूर्व मुखिया हरिद्वार साव का मिट्टी का भंडार घर था. उसी में  स्कूल चलता था. पास के कुएं से बच्चे पानी पिया करते थे. 90 के दशक में  स्व. रामनंदन मिश्र ने स्कूल के लिए जमीन दी थी. राजकीय उत्क्रमित मध्य  विद्यालय, उलगाड़ा में चोरया, उलगाड़ा और बालुडीह, इन तीनों गांवों के  बच्चे यहां पढ़ने आते  हैं, लेकिन सिर्फ एक पारा शिक्षिका हैं. वह सभी  बच्चों को पढ़ाती हैं. गांव में पहला चापाकल 1997 में लगा. आज चार चापाकल  है. 2010 में गांव में आयी बिजली किसी चमत्कार से कम नहीं थी. शहरों में  चमक-दमक और इस गांव के पिछड़ेपन को देख लोगों को लगता था कि शायद ही इस  गांव में कभी बिजली पहुंचेगी. होली-दिवाली और दशहरे का आनंद ही कुछ अलग था.  जब ग्रामीणों की टोली एक दूसरे के गांवों में जा-जाकर होली खेला करती थी.  अब वो होली भी नहीं रही. झारखंड बनने के बाद से गांव की सूरत धीरे-धीरे  बदलने लगी. बदलाव की हकीकत के बीच अभी भी कई जरूरी कार्य बाकी हैं. राज्य बने 17 साल बीत गये, लेकिन आज भी गांव में अपना सड़क, नालियां, स्कूल, उपस्वास्थ्य केंद्र एवं डिजिटल सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं. आज भी गांव के लोग इलाज के लिए चार किलोमीटर दूर पांकी जाने पर विवश हैं.
70 के दशक के बाद से गांव में दिखा बदलाव
1956 में बालुडीह में 12 घर थे. दो घर ब्राह्मण, तीन घर कुम्हार (प्रजापति), दो घर यादव और पांच घर भुइयां के  थे. चारों बिरादरी के अलग-अलग टोले थे. गांव प्रवेश करते ही ब्राह्मण टोला  मिलता. दायीं ओर कुम्हार टोली और जंगल के समीप यादव और भुइयां टोली थी.  आबादी करीब 50 थी. सभी के मकान मिट्टी के थे. खेती-बारी ही आजीविका का  मुख्य साधन था. पीने के पानी के लिए चार कुएं थे. कोई स्कूल गांव में नहीं  था. दो किलोमीटर दूर मंगलपुर जाकर कुछ लोग पढ़ते थे. बुनियादी सुविधाओं का  घोर अभाव था. काफी गरीबी थी. गांव में किसी के पास साइकिल तक नहीं थी.  बिजली, सड़क, स्कूल, अस्पताल किसी तरह की कोई सुविधा नहीं थी. इलाज के लिए  भी चार किलोमीटर दूर पांकी जाना पड़ता था. 70 के दशक से गांव में कुछ बदलाव  दिखने लगा. कुछ एक घरों में साइकिल आयी. धीरे-धीरे गांव में रेडियो बजने लगे. उस वक्त यह मनोरंजन का इकलौता माध्यम था. इसके जरिये देश-दुनिया की खबरें मिलने लगीं. सबसे अहम गांव में रोजगार का अभाव था. काम की तलाश में लोग पंजाब जाया करते थे. आज भी गांव के युवा रोजगार के लिए राज्य से बाहर जाने पर मजबूर हैं. पूरे देश में डिजिटल इंडिया पर जोर है, लेकिन यह गांव इससे कोसों दूर है.
मुिखया की साइकिल देखने के लिए लगती थी भीड़ : प्यारी प्रजापति
जंगल से बिल्कुल सटे इस गांव के पांच मुहान (चौक) पर हर शाम चौपाल सजती थी. बुजुर्ग, पुरुष, महिलाएं और युवा जुटते थे और संवाद होता था. गांव के सबसे बुजुर्ग 80 वर्षीय प्यारी प्रजापति कहते हैं कि 1952 में देववंश नारायण सिंह मंगलपुर पंचायत के मुखिया थे. बुजुर्ग होने के बावजूद साइकिल से गांवों में घूम-घूम पंचायती किया करते थे. उनकी साइकिल देखने के लिए लोगों की भीड़ लग जाती थी. छोटे-मोटे मामले वह खुद ही निपटा दिया करते थे.
पहले गांव में पैदल चलना होता था दूभर :  संजय नाथ मिश्रा
गांव के ही संजय नाथ मिश्रा बताते हैं कि 1976 में इस गांव में बाढ़ आयी थी. जंगल से काफी सटे होने और तालाबों के लबालब भर जाने के बाद पानी गांव के बीचों-बीच वाली केवाल मिट्टी की सड़कों को खनहारती हुई चोरया की तरफ निकल गयी थी. इस कारण गांव की पथरीली सड़क पर चलना उस समय काफी मुश्किल भरा था. यादव टोले काफी ऊंचाई पर थे. यहां दलदल कच्ची संकरी सड़क करीब आठ फीट नीचे थी. काफी मशक्कत के बाद वे घर में प्रवेश कर पाते थे. इसी रास्ते से होकर गांव के लोग गाय-बकरी चराने जंगल जाया करते थे. कीचड़ और संकरी इस सड़क से गुजरने का अलग ही अहसास था. हाल में बनी पीसीसी सड़कों ने उस खाई को पाट दी है. बरसात के दिनों में गांव में प्रवेश करनेवाली मुख्य सड़क (कच्ची) पर  पैदल चलना दूभर था. साइकिल से गुजरना मुश्किल था. हाथ में चप्पल-जूता उठाकर काफी मशक्कत के बाद केवाल मिट्टी वाली सड़क पर लोग चल पाते थे. अब भी मोरम-पत्थर वाली सड़क है, लेकिन लोगों को राहत है.
अब लड़कियां साइकिल से जाती हैं स्कूल : सिंधु मिश्रा
आंगनबाड़ी सेविका सिंधु मिश्रा बताती हैं कि गांव में मिनी आंगनबाड़ी केंद्र है. यहां 20 बच्चे हैं. वह कहती हैं कि यहां की लड़कियां पहले चार किलोमीटर दूर पैदल चल कर हाइस्कूल, पांकी जाती थीं. अब वह साइकिल से जाती हैं.