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  • Aug 7 2017 12:33PM

मत्स्य मित्र नरेंद्र की शून्य से शिखर की कहानी, कभी पैसे के लिए मोहताज थे अब लाखों का करते हैं कारोबार

मत्स्य मित्र नरेंद्र की शून्य से शिखर की कहानी, कभी पैसे के लिए मोहताज थे  अब लाखों का करते हैं कारोबार

पंचायतनामा डेस्क

नरेंद्र पांडेय, एक ऐसा नाम जो रांची के कांके डैम की ताजी मछली रांचीवासियों को खिला रहे हैं और मछली खाने के शौकीन दूर-दूर से इनके पास ताजी मछलियां लेने के लिए आते हैं. अब तो आलम है कि मछली पालन के क्षेत्र में इनकी खास पहचान बन चुकी है. रोजाना कांके डैम से नरेंद्र पांडेय और उनकी टीम मछली निकालते हैं और ग्राहकों की मांग पूरी करते हैं. कांके डैम के 18 एकड़ के हिस्से में नरेंद्र पांडेय मछली पालन करते हैं. इसके जरिये नरेंद्र पांडेय ना सिर्फ अपनी आजीविका चला रहे हैं, बल्कि इनके साथ जुड़े लगभग 35 लोग भी यहां से अपनी आमदनी कर रहे हैं. नरेंद्र पांडेय को मत्स्य विभाग के निदेशक राजीव कुमार ने बेहतर उत्पादन और मत्स्य उत्पादन के क्षेत्र में बेहतर कार्य करने के लिए पुरस्कृत भी किया है.

कैसे हुई शुरुआत

नरेंद्र पांडेय और उनके मित्र बलिराम प्रसाद जायसवाल बताते हैं कि पहले दोनों ही बेरोजगार थे. इसी दौरान डीएफओ मनोज ठाकुर से उन दोनों की मुलाकात हुई. धीरे-धीरे आना-जाना शुरू हुआ, जिससे और नजदीकियां बढ़ी. मनोज ठाकुर ने दोनों को मत्स्य पालन के क्षेत्र में जुड़ने को लेकर प्रोत्साहित किया. विभाग के अधिकारियों के सहयोग मिलने के बाद नरेंद्र और बलिराम ने एक समिति का गठन किया. कांके डैम मत्स्यजीवि सहयोग समिति लिमिटेड के नाम से गठित इस समिति में वर्तमान में 56 सदस्य हैं. समिति के अध्यक्ष नरेंद्र पांडेय और सचिव बलिराम प्रसाद जायसवाल हैं.  हालांकि, समिति बनाने को लेकर भी काफी परेशानियों का सामना करना पड़ा था. काफी दौड़-धूप के बाद समिति बनाने में सफल हुए थे. नरेंद्र बताते हैं कि समिति बनाने के लिए कई बार वो पैसे के अभाव में कांके रोड से अपर बाजार और विकास भवन पैदल ही गये. सुबह से शाम तक बिना कुछ खाए रहे, लेकिन आज वो मछली पालन करके अच्छी आमदनी कमा रहे हैं. 

मत्स्य निदेशक से मुलाकात वरदान साबित हुई 

मछली पालन के क्षेत्र में आने के लिए नरेंद्र के मित्र रघुनंदन यादव से प्रेरणा मिली. रघुनंदन यादव ने उस वक्त तिलैया में केज फीसिंग की शुरुआत की थी. नरेद्र और बलिराम प्रसाद दोनों ने ही जाकर तिलैया में केज फिसिंग को देखा. उसके बाद ही दोनों ने मछली पालन करने की ठानी. तिलैया से जानकारी मिलने के बाद नरेंद्र और उनके दोस्त रांची आये और यहां पर डीएफओ मनोज ठाकुर के माध्यम से मत्स्य निदेशक राजीव कुमार से मुलाकात की. नरेंद्र कहते हैं कि मत्स्य निदेशक राजीव कुमार से मुलाकात उनके लिए वरदान साबित हुआ. हर स्तर पर राजीव कुमार और मनोज ठाकुर का मार्गदर्शन मिलता रहा. इस दौरान 15 दिनों का मत्स्य पालन संबंधी प्रशिक्षण शिविर में शामिल भी हुए. 

आजीविका का बेहतर साधन बना मत्स्य पालन 

मत्स्य मित्र नरेंद्र के सामने सबसे बड़ी समस्या कांके डैम के उस हिस्से को साफ करने की थी, जिस हिस्से में सबसे ज्यादा गंदगी थी. साथ ही जलकुुंभी से डैम का काफी हिस्सा पटा हुआ था. नरेंद्र बताते हैं कि केवल डैम के उस हिस्से से एक हजार ट्रैक्टर जलकुंभी निकाली गयी, तब जाकर वो हिस्सा पूरी तरह साफ हो पाया. सफाई पूरी होने के बाद डैम के 18 एकड़ के हिस्से को घेरने के लिए केज लगाया गया. इस काम को पूरा करने में उन्हें कर्ज लेकर पैसे देने पड़े. सफाई और केज का काम पूरा होने के बाद पहली बार साल 2015 में 28 हजार रुपये की पूंजी लगा कर 70 हजार मछली का जीरा डैम में डाला गया, लेकिन दुर्भाग्यवश लगभग 65 हजार मछलियों की मौत हो गयी. नरेंद्र के लिए यह पहला झटका था. बावजूद इसके, हार नहीं मानते हुए इन्होंने दोबारा प्रयास किया और इस बार मेहनत रंग लायी और तब से लगातार मछली का उत्पादन कर रहे हैं. अब तो नरेंद्र और बलिराम समेत समिति के अन्य सदस्यों के लिए मत्स्य पालन ही आजीविका का बेहतर साधन बन गया है.

मछलियों की बढ़ी मांग

नरेंद्र और उनकी टीम खुद ही मछली का प्रजनन भी कराते हैं. डैम के ही एक हिस्से में इन्होंने नर्सरी भी खोल रखी है. साथ ही स्पॉन उत्पादन के लिए प्लांट भी लगाया है. इस साल से नरेंद्र पांडेय मछली का जीरा भी बेचने लगेंगे. नरेंद्र पांडेय कहते हैं कि डैम के पास पार्क और एक बाजार का होना उनके लिए फायदेमंद साबित हो रहा है. पार्क में हर रोज सैकड़ों लोग सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक के लिए आते हैं. साथ ही पास में बाजार भी लगता है, जिसके कारण भी काफी संख्या में ग्राहक उनके पास मछलियां खरीदने आते हैं. नरेंद्र पांडेय की मछलियों को लेने के लिए ग्राहकों को घंटों इंतजार करना पड़ता है. ग्राहकों को यहां पर रोहू, कतला, तेलपिया और पंगास प्रजाति की ताजी मछलियां मिलती है. 

नये मत्स्य उत्पादक क्या करें

जो युवा मत्स्य उत्पादन से जुड़ना चाहते हैं, वो सबसे पहले पूरी जानकारी हासिल करें. राजधानी रांची के धुर्वा स्थित शालीमार के मत्स्य किसान प्रशिक्षण केंद्र में जाकर प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं. साथ ही अपने आस-पास के बाजारों का भी आकलन कर लें. इस क्षेत्र में मेहनत ही एकमात्र सहारा है. मत्स्य किसानों के पास तालाब होना चाहिए. किसान खुद के तालाब या लीज लिये तालाबों को लेकर मत्स्य पालन की शुरुआत कर सकते हैं. आधुनिक तकनीक से मत्स्य पालन के लिए प्रशिक्षण लेना आवश्यक है. q

प्रखंड : कांके

जिला : रांची