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  • Jul 17 2018 11:57AM

इमली के सहारे खुद को गरीबी से बाहर निकाली सोनामती उरांव

इमली के सहारे खुद को गरीबी से बाहर निकाली सोनामती उरांव

 आजीविका डेस्क

झारखंड बदल रहा है और बदलाव की धुरी हैं ग्रामीण महिलाएं. झारखंड राज्य के ग्रामीण इलाकों में सखी मंडल का गठन आज एक आंदोलन का रूप ले चुका है. ग्रामीण महिलाएं आज सखी मंडल के जरिये बचत करना सीख रही हैं, वहीं बैंक लिंकेज एवं सखी मंडल से वित्तीय सहायता प्राप्त कर अपनी आजीविका भी संवार रही हैं. आजीविका के नयी-नयी गतिविधियों से जुड़ कर अपनी जिंदगी संवार चुकी लाखों महिलाएं आज गांवों को बदलने में जुटी हैं. सखी मंडल की बहनें राज्य को विकास की ओर उन्मुख राज्य बनाने में अहम भूमिका निभा रही हैं. आज ग्रामीण महिलाएं अपनी घर-गृहस्थी संभालते हुए रोजगार से जुड़ कर अच्छी आय कर रही हैं.दीनदयाल अंत्योदय योजना-एनआरएलएम के तहत ग्रामीण महिलाएं उत्पादक समूह में जुड़ कर इमली प्रसंस्करण, बकरी पालन, सब्जी की खेती एवं लघु उद्यम से जुड़ रही हैं. आजीविका को सशक्त बनाने की कवायद में रोजाना हजारों महिलाएं इस माध्यम से जुड़ रही हैं और अपने परिवार के भरण-पोषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं. आइए आज आपको बदलाव की धुरी बनी ऐसी ही महिलाओं की कहानियों से रूबरू कराते हैं, जो बदलते झारखंड की खुशबू से माहौल को खुशनुमा बना देगा.

वन संसाधन आधारित सतत आजीविका का विस्तार
खूंटी प्रखंड राज्य व देश का सर्वाधिक लाह एवं इमली उत्पादक प्रखंड है. इसके अलावा यहां विभिन्न प्रकार के गैर-इमारती वनोपज (एनटीएफपी) जैसे- इमली, हर्रा, कुसुम बीज आदि प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं. पीढ़ियों से यहां रह रहे आदिवासी समुदायों ने प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित कर गैर-इमारती वनोपज(एनटीएफपी) के संग्रहण एवं बिक्री को अपने आजीविका का आधार बनाया है. साल 2016-17 में आजीविका के अवसरों को बढ़ाने के लिए गैर-इमारती वनोपज (एनटीएफपी) गतिविधियां शुरू हुईं, ताकि ग्रामीणों की आय दोगुनी हो सके. इसमें मुख्यतः वैज्ञानिक विधि से लाह की खेती एवं इमली वैल्यू-चैन आधारित आजीविका को डीएवाई-एनआरएलएम के तहत शुरू किया गया. इसके तहत विभिन्न संस्थाओं द्वारा अभिसरण कर प्रशिक्षण योजनाओं को तैयार किया गया, जिससे वैज्ञानिक तरीके से खेती एवं प्रसंस्करण संभव हो पाया. लाह की खेती का पहले से अनुभव रखने वाले समूह के सदस्यों को कुसुमी लाह की वैज्ञानिक खेती के लिए चिह्नित किया गया.

इमली के सहारे अपना जीवन निखारतीं महिलाएं
इमली इस क्षेत्र में दूसरा महत्वपूर्ण वनोत्पाद है. यही कारण है कि इमली के लिए वैल्यू-चैन आधारित आजीविका गतिविधियों को क्रमबद्ध तरीके से डीएवाई-एनआरएलएम के अंतर्गत शुरू किया गया. इसके तहत सखी मंडलों को उत्पादक समूह के रूप में विकसित करना एक महत्वपूर्ण लक्ष्य है. इसके बाद समुदाय आधारित व्यापार के संवर्धन के लिए समुदाय प्रबंधित महिला उत्पादक समूह, कालामाटी और कालामाटी ग्रामीण सेवा केंद्र का सघन ड्राइव चलाकर गठन किया गया. इनके क्षमतावर्धन के लिए उत्पादक समूह और ग्रामीण सेवा केन्द्र में विभिन्न प्रकार के प्रशिक्षण का आयोजन हुआ. इसमें मुख्यतः उत्पादन के विभिन्न आयामों, कटाई, मूल्य संवर्धन और वनोत्पाद के बाजार के लिए नियमित प्रशिक्षण का आयोजन किया गया.

आजीविका वनोपज मित्र हैं सोनामती उरांव
फूदी पंचायत के कालामाटी गांव की रहनेवाली हैं सोनामती उरांव. सोनामती पहले गरीबी की जिंदगी जी रही थीं. साल 2015 में समूह से जुड़ीं और उजाला स्वयं सहायता समूह की सदस्या बनीं. उस समय वनोपज इकट्ठा करना तथा मजदूरी करना इनके आजीविका का मुख्य श्रोत था. वनोपज आधारित मुख्य आजीविका के साधन होने के कारण इनका परिवार बिचौलियों और उधारदताओं के चंगुल में बुरी तरह फंस चुका था और परेशान था. समूह से जुड़ने के बाद सोनामती ने समूह से 35 हजार रुपये का ऋण लिया. इस राशि से उन्होंने वैज्ञानिक तरीके से लाह की खेती और इमली से संबंधित कार्य शुरू किया. साल 2017 में सोनामती ने अपने ग्राम संगठन (वीओ) से लोन के रूप में पांच किलो बिहन लाह प्राप्त किया. लाह उत्पादन के लिए बिहन लाह बीज सामग्री के रूप में लिया गया था. उन्होंने इंडियन इंस्टीच्यूट ऑफ नैचुरल रेजीन एंड गम्स (आइएनआरजी), नामकुम से लाह की खेती संबंधी प्रशिक्षण प्राप्त किया. प्रशिक्षण के बाद सोनामती ने वैज्ञानिक तरीके से लाह की खेती शुरू की. जून 2017 में सोनामती ने एक कुसुम पेड़ से कुल 55 किलो बिहन लाह तथा 10 किलो स्क्रैप लाह की कटाई की. फसल की बिक्री करने पर उन्हें 18,300 रुपये की आमदनी हुई, जिसमें 16,500 रुपये बीहन लाह से तथा 1800 रुपये स्क्रैप लाह से प्राप्त हुआ. इसके बाद सोनामती ने लोन के रूप में लिये पांच किलो बीहन लाह की जगह ग्राम संगठन को साढ़े पांच किलो बीहन लाह वापस किया. जुलाई 2017 के उत्पादन चक्र में उन्होंने 35 बेर पेड़ों की फसल से 109 किलो बीहन लाह तथा 45 किलो स्क्रैप लाह का उत्पादन किया. इस तरह दूसरी फसल से कुल 40,800 रुपये की आमदनी हुई. इसमें 32,700 रुपये बीहन लाह से तथा 8100 रुपये स्क्रैप लाह से आमदनी हुई.

जनजातीय परिवारों का मार्गदर्शक बनीं सोनामती
सखी मंडल की अन्य दीदियों को सोनामती के अनुभव का लाभ मिला. सोनामती ने वित्तीय एवं आजीविका प्रबंधन से संबंधित अनुभव हासिल की थी. आज इस कारण उन्हें कालामाटी में स्थापित खूंटी के पहले ग्रामीण सेवा केंद्र (आरएससी) का सक्रिय हिस्सा बनने में भरपूर मदद मिली, जहां उन्हें आरएससी बोर्ड सदस्यता प्राप्त हुई है. बोर्ड के सदस्य के रूप में वह इमली इकाई का प्रबंधन करती हैं. 15 उत्पादक समूहों से गुणवत्ता के आधार पर कच्ची इमली खरीदना और कच्ची इमली का पल्प और ईंट का उत्पादन करने में उनकी भूमिका है. वित्तीय लेन-देन प्रबंधन, बाजार लिंकेज और कटाई के बाद इमली का प्रबंधन भी करती हैं. अब इस क्षेत्र में इमली संग्रहण में लगे 588 जनजातीय परिवारों का मार्गदर्शक बन चुकी हैं सोनामती.

90
मीट्रिक टन इमली खरीदने का लक्ष्य
आरएससी, कालामाटी ने वर्ष 2018-19 के दौरान समुदाय के निर्णय के आधार पर 90 मीट्रिक टन इमली खरीदने का लक्ष्य निर्धारित किया है. सोनामती के नेतृत्व में ही संग्रहण ड्राइव शुरू हुआ है. इसमें हर संग्राहक को डेढ़ महीने में करीब 3500 रुपये मिलने की संभावना है. अबतक 50 मीट्रिक टन इमली की खरीदारी की जा चुकी है तथा उनके प्रबंधन से 35 मीट्रिक टन फूल और ब्रिक्स में प्रसंस्कृत किया जा चुका है. इस वर्ष आरएससी से पांच लाख रुपये कुल लाभ होने का अनुमान है, जिसे उद्यमिता आधारित मॉडल एवं विभिन्न प्रकार के आजीविका के अवसर के लिए प्रयोग किया जायेगा. सोनामती ने खुद आरएससी को 190 किलो कच्ची इमली का योगदान किया है और उसके बदले उन्होंने 7980 रुपये का भुगतान भी प्राप्त किया है. आरएससी में ये पल्प निष्कर्षण इकाई में एक सदस्य भी हैं, जहां उन्होंने खुद 1.5 मीट्रिक टन कच्ची इमली का पल्प के रूप में प्रसंस्करण किया है, जिससे आठ रुपये प्रति किलो की दर से 12 हजार रुपये की आमदनी हो चुकी है.

जीवन में आया बड़ा बदलाव : सोनामती उरांव
आजीविका वनोपज मित्र सोनामती उरांव कहती हैं कि जेएसएलपीएस और एमकेएसपी ने मुझे हिम्मत दी है. इससे जीवन में बहुत बड़ा बदलाव आया है. इसके योगदान को कभी भूल नहीं सकते. अन्य ग्रामीण महिलाओं को भी वनोपज से जोड़ने की कोशिश की जा रही है, ताकि समुदाय आधारित नेतृत्व करने की क्षमता विकसित हो सके.