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  • Nov 20 2018 10:30AM

महिला किसान अवार्ड के लिए झारखंड की तीन महिला चयनित

महिला किसान अवार्ड के लिए झारखंड की तीन महिला चयनित

बुधमनी मिंज

 

खेती-बारी में महिलाओं का अहम योगदान है. वह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिला कर अन्न उपजाती हैं. सब्जियों के उत्पादन से लेकर उसे बाजारों में बेचती भी हैं. इसके बावजूद किसान कहलाने का क्रेडिट पुरुषों को चला जाता है. अपने पसीने की मेहनत, धैर्य और आगे बढ़ने के हौसले से झारखंड की तीन महिलाओं ने इस मिथक को तोड़ा है. इन्हें महिला किसान अवार्ड के लिए चयनित किया गया है. दिल्‍ली में पहली बार महिला किसान अवार्ड का आयोजन किया जा रहा है. इसके लिए देशभर से 112 महिला किसानों का चयन किया गया है.

महिला किसानों की है अपनी पहचान
झारखंड की तीन सफल महिला किसानों में रामगढ़ जिले से रीता देवी, गोड्डा जिले से पानवती देवी एवं गढ़वा जिले से शोभा तिवारी हैं. खेती-बारी में आज इनकी अपनी पहचान है. इन्हें अपने-अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य करने एवं सफलता के नये कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास करने को लेकर अवार्ड के लिए चयनित किया गया है. ये महिला किसान खेती-बारी से जहां अपने परिवार को आर्थिक रूप से मजबूत कर रही हैं, वहीं अपने बच्‍चों का भविष्‍य भी संवार रही हैं.

सफलता की कहानी, उन्हीं की जुबानी

1. टमाटर के बीज से साढ़े तीन लाख सालाना कमाती हैं रीता
प्रखंड : गोला
जिला : रामगढ़

रामगढ़ जिला अंतर्गत गोला प्रखंड के डुंडीगाछी गांव की रहनेवाली रीता देवी का चयन महिला किसान अवार्ड के लिए हुआ है. 28 वर्षीया रीता दवी के परिवार में पति, सास-ससुर और दो बच्‍चे हैं. रीता देवी इंटरमीडिएट तक पढ़ी हैं. खेती ही उनका मुख्‍य व्‍यवसाय है. उनके पास 50 डिसमिल जमीन है और 10 डिसमिल जमीन उन्‍होंने लीज पर ले रखी है. इस जमीन पर वे अपने सास-ससुर, पति और 10 मजदूरों के साथ मिल कर खेती करती हैं. वे धान की खेती के साथ-साथ हर मौसम में सीजन के अनुसार सब्‍जी व फसल उगाती हैं. रीता देवी बताती हैं कि शुरुआत में उनके पास खेती करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं थी. जैसे-तैसे खेती कर गुजारा कर रहे थे. खेती करने की तकनीक से भी अंजान थे. इसलिए जितना बोते थे, उससे काफी कम उपजता था. रीता देवी खेतों में बहुफसली खेती करना चाहती थीं, लेकिन इसके लिए उनके पास पर्याप्‍त पूंजी नहीं थी.

ऐसे मिली प्रेरणा
रीता देवी बताती हैं कि स्वयं सहायता समूह से जुड़ने और प्रोजेक्ट एग्रीकल्चर ऑफिसर सत्यजीत से मुलाकात के बाद स्थिति बेहतर होने लगी. बेहतर प्रशिक्षण के लिए सिजेंडा फाउंडेशन, महाराष्ट्र में खेती के कई गुर सीखे. प्रशिक्षण के दौरान रीता ने टमाटर के बेहतर उत्पादन को देखा. नेट का इस्तेमाल कर टमाटर के बीजों को सूखा कर अच्छे दामों में बाजार में बेचा जा रहा है. यहीं से रीता को प्रेरणा मिली और गांव वापस आकर इस तकनीक को अपनाना शुरू किया.

बैंक से लिया लोन और खरीदा नेट
नेट लगाने के लिए रीता ने बैंक से लोन लिया. इस काम के लिए शुरुआती खर्च एक लाख 60 हजार रुपये का है. केवल नेट का ही दाम 70 हजार रुपये का था. बैंक से लोन लेकर रीता ने खेती-बारी शुरू की. टमाटर के बीज को सूखाया और उसे महाराष्ट्र के सिजेंडा फाउंडेशन को भेज दिया. यहीं से बीज बाजार में पहुंचते हैं. पहले साल ही टमाटर के बीज से एक लाख 60 हजार रुपये की कमाई की और बैंक का लोन चुका दिया. दूसरे साल एक लाख 80 हजार रुपये की कमाई की. अब टमाटर के बीज से सालाना साढ़े तीन लाख रुपये कमा लेती हैं.

आसान नहीं है बीज निकालना
रीता देवी बताती हैं कि बीजों को टमाटर से अलग करने का काम काफी मुश्किल भरा होता है. सबसे पहले पके हुए टमाटर को तोड़ कर उसे मसला जाता है. इसके बाद बीजों को अलग करने के लिए तीन से चार बार उसे साफ पानी से धोया जाता है, क्योंकि उसमें टमाटर के छिलके कई बार चिपके रह जाते हैं. इसके बाद उसे नेट के अंदर सूखाया जाता है. इस तरह बीज सूख कर तैयार हो जाता है. हालांकि, बीज निकालने के लिए मशीन भी उपलब्ध करायी जाती है, लेकिन इसके लिए पांच-छह यूनिट का होना अनिवार्य है. फिलहाल उनके पास एक ही यूनिट है. रीता बताती हैं कि टमाटर बीज की कीमत 10 हजार रुपये प्रति किलो है.

कृषि उद्यमी व समाजसेविका हैं रीता
रामगढ़ जिले में रीता देवी की खेती-बाड़ी में अपनी पहचान है. वे श्रीविधि से धान की खेती करती हैं, वहीं सब्जी की खेती में केंचुआ खाद का उपयोग करती हैं. वह अब गांव के साथ-साथ अपने प्रखंड के लोगों को खेती के गुर सीखाती हैं. इसके अलावा वे गांव के कई मामले भी सुलझाती हैं. वे एसएचजी की साप्ताहिक बैठकों में महिलाओं को खेती की ट्रेनिंग भी देती हैं. गर्भवती महिलाओं को समय-समय पर आवश्यक जानकारी देने के अलावा जरूरत होने पर एंबुलेस की व्यवस्‍था भी उपलब्ध कराती हैं. बच्चों के टीकाकरण से लेकर उनकी पढ़ाई तक से जुड़े कार्य में वे लोगों की मदद करती हैं.

2. महाजन के पास बंधक 10 बीघा जमीन छुड़ा कर पानवती आज कर रही हैं खेती
जिला : गोड्डा

गोड्डा जिले की पानवती देवी ने अपने संघर्षों से मिसाल कायम की है. मात्र दूसरी पास पानवती देवी के पास 10 बीघा जमीन है. वे अपने खेतों में धान से लेकर सभी सब्‍जी व फसलों की खेती करती हैं. 46 वर्षीया पानवती देवी के परिवार में उनके पति और तीन बच्‍चे हैं. वे अपने खेतों में अपने पति और 10 मजदूरों के साथ काम करती हैं. आज वे एक सफल महिला किसान के तौर पर उभरी हैं. उनके बच्चे अच्छी नौकरी में हैं. वे बताती हैं कि काफी संघर्ष के बाद उन्हें सामाजिक कार्य करने का भी मौका मिला है. इसके बाद अब उनके क्षेत्र में बिना उनसे पूछे कोई कार्य नहीं होता है.

नौ साल में हो गयी थी शादी
पानवती देवी की शादी मात्र नौ वर्ष की आयु में ही हो गयी थी. पति के खेत भी महाजन के पास बंधक थे. वे कहती हैं कि उस समय एक सौ रुपये में 20 हल खरीदे थे. काफी खेत महाजन के पास होने और पूरी तरह से कर्ज में डूबने के कारण मकई खाकर पेट पालना पड़ा था. किसी तरह ए‍क वक्‍त के भोजन का जुगाड़ हो पाता था. 20 साल की उम्र में पहला पुत्र हुआ. इसके बाद जैसे-तैसे कमाई कर महाजन से खेत छुड़ायी. 13 साल की उम्र में खेती करने का फैसला किया था.

धान से लेकर सभी सब्‍जी व फसलों की करती हैं खेती
साल 2011 में पानवती देवी ने वार्ड सदस्‍य का चुनाव जीता. इसके बाद केवीके से जुड़ीं. वह धान, गेहूं, आलू, करेला, टमाटर, अरहर, उड़द के अलावा लत्‍तेदार सब्‍जी व फसलों की खेती करती हैं. पानवती देवी श्रीविधि तकनीक से धान की खेती करती हैं. इसके अलावा वे मौसमी फसलों की भी खेती करती हैं. पानवती देवी खेती को लेकर समय-समय पर प्रशिक्षण भी लेती हैं और नयी तकनीक से खेती करती हैं. वे जैविक खाद को लेकर भी अच्‍छी जानकारी रखती हैं. पानवती के पति अभी भी साइकिल से सब्‍जी बेचने जाते हैं और आसपास के बाजारों में उनकी सब्जियों के अच्‍छे दाम भी मिल जाते हैं.

3. खेती के साथ-साथ डेयरी क्षेत्र में बेहतर कर रहीं शोभा तिवारी
जिला : गढ़वा

खेती-बाड़ी के क्षेत्र में गढ़वा जिले की शोभा तिवारी की आज अपनी पहचान है. उन्होंने इस क्षेत्र में मिसाल कायम की है. खेती के साथ-साथ उन्होंने डेयरी क्षेत्र में भी काम शुरू किया. दारोगा की पुत्री शोभा की पढ़ाई के दौरान ही कम उम्र में शादी हो गयी. साल 2005 में पति के दुर्घटना में घायल होने के बाद घर की आर्थिक‍ स्थिति को संभालने की जिम्‍मेदारी उनके ऊपर आ गयी. उन्‍होंने खुद अपने पैरों पर खड़ा होने का निश्चय किया. इसी का नतीजा है कि शोभा अब बखूबी गौशाला चला रही हैं. शुरुआत में उनके पास एक गाय थी. अब उनके पास 19 गाय हैं. काफी संघर्ष के बाद उन्हें सफलता मिली और अब इलाके के लोग उनके घर से दूध लेकर जाते हैं. उन्‍होंने रांची से बागवानी का भी प्रशिक्षण लिया है और अपने गांव में कई फलदार वृक्ष भी लगाये हैं. वे अपने खेत में धान, गेहूं, दलहन और तिलहन की भी खेती करती हैं. शोभा कहती हैं कि कड़ी मेहनत से हर क्षेत्र में कामयाबी पायी जा सकती है.