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  • Feb 18 2019 7:45PM

मिथक तोड़ रहीं आदिवासी समाज की दादियों से पढ़िए खुद्दारी का पाठ

मिथक तोड़ रहीं आदिवासी समाज की दादियों से पढ़िए खुद्दारी का पाठ

गुरुस्वरूप मिश्रा

शिक्षित युवा बेरोजगारों के बीच उम्र के आखिरी पड़ाव में भी मिथक तोड़ रहीं आदिवासी समाज की निरक्षर दादियां पुश्तैनी हुनर के बल पर देश को खुद्दारी का पाठ पढ़ा रही हैं. गरीबी-बेबसी की तपती धूप में ये ठ‍ंडी हवा का झोंका हैं. संयुक्त परिवार में घर की शान रहीं दादियां बढ़ते एकल परिवारों में हाशिये पर आ गयी हैं. जिस उम्र में घर-परिवार की दादियां मामूली खर्च के लिए भी अपने पति-बेटे-बहू-पोते पर आश्रित रहती हैं और बात-बेबात पारिवारिक बोझ बताकर प्रताड़ित की जाती हैं. ऐसे में इनकी सक्रियता, बोलता हुनर और स्वाभिमान के लिए संघर्ष की गाथा जानकर इन्हें सलाम करने को जी चाहेगा. ये आदर्श दादियां झारखंड के रांची जिले के नामकुम प्रखंड स्थित रामपुर पंचायत के आदिवासी गांव चेने (पिरिडीह) की हैं. आदिवासी समाज की ये बुजुर्ग महिलाएं आज भी बांस की टोकरी बनाकर और मरम्मत कर न सिर्फ आत्मनिर्भर हैं, बल्कि परिवार को आर्थिक मदद भी कर रही हैं

 

दिन-गुरुवार, सुबह-10 बजे. राजधानी रांची से 18 किलोमीटर दूर नामकुम की रामपुर पंचायत के आदिवासी गांव चेने (पिरिडीह) में कर्कट-खपड़ापोस मकान व मिट्टी के आंगन में जामून पेड़ की छांव में सुधन देवी बोरे पर बैठ कर अपने हुनर से बांस को आकृति देने में तल्लीन हैं. घर की ड्यूढ़ी पर बांस के छीले हुए टुकड़े करीने से सजाकर रखे गये हैं. पास में ही मैट्रिक पास छोटी बिटिया व बेटा धूप सेंक रहे हैं. जिंदगी की तेज रफ्तार से इतर वह इत्मिनान से एल्यूमिनियम के बर्तन में रखे पानी की मदद से बांसों की महीन कारीगरी के जरिए टोकरी को आकार देने में जुटी हैं. यही इनके बुढ़ापे की लाठी है. नइहर से सीखा ये हुनर उन्हें आज भी नया जीवन दे रहा है. बांस के हुनर और बचत की बदौलत न सिर्फ वह इस उम्र में भी स्वाभिमान के साथ जी रही हैं, बल्कि परिवार को आर्थिक मदद भी कर रही हैं. ये कहानी सिर्फ सुधन देवी की नहीं है. पड़ोस की लखो देवी, सुकरो देवी और जतरी देवी भी घर-परिवार से पैसे नहीं मांगती हैं. बांस के हुनर से वह भी परिवार को अच्छी तरह मदद कर रही हैं. मंगरी लकड़ा, गालो लकड़ा और चंपू लकड़ा भी समूह में बचत कर व सखियों के साथ मिलबैठकर खुशहाल हैं.

नइहर के हुनर का कमाल
सुधन देवी, लखो देवी, सुकरो देवी और जतरी देवी ने बांस का हुनर नइहर से सीखा था. बचपन में ही मां-पिता से उन्होंने यह कला सीखी थी. शादी के बाद भी वह बांस का काम करती रहीं. घर-परिवार को आर्थिक मदद करती रहीं. आज इनके पति नहीं हैं. घर में बेटे-बेटी-बहू हैं. इसके बावजूद उन्होंने अपना हुनर जिंदा रखा है. यही वजह है कि परिवार के आगे उन्हें हाथ नहीं पसारना पड़ता. उल्टे वह मदद करती हैं. इनके बेटे-बेटी-बहू घर में बैठे मिल जायेंगे, लेकिन ये आदर्श दादियां घर में बांस का सामान बनाती मिलेंगी, रामपुर बाजार में बेचती दिख जायेंगी या गांव-गांव घूमकर बिक्री करतीं मिलेंगी.

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खुद्दारी का संघर्ष और आनंद
सुधन देवी, लखो देवी और सुकरो देवी बांस का सिर्फ सामान ही नहीं बनातीं, बल्कि उसका मरम्मत भी करती हैं. पीठ पर सामान लिए एक किलोमीटर पैदल रामपुर बाजार जाकर उसकी बिक्री भी करती हैं. ये करीब सात किलोमीटर क्षेत्र के गांवों में पैदल घूम-घूमकर भी बांस के सूप व टोकरी भी बेचती हैं. इतना ही नहीं बांस की खरीदारी भी पड़ोस के गांवों में जाकर खुद करती हैं. जतरी देवी के न पति हैं और न बेटे. परिवार में सिर्फ बहू और पोते-पोती हैं. इस कारण वह गांव-गांव घूम कर सिर्फ सूप-टोकरी की मरम्मत कर परिवार को अच्छी तरह पाल रही हैं. वह अपने पोते-पोती को बेहतर शिक्षा के लिए प्राइवेट स्कूल में पढ़ा रही हैं. ये दादियां कहती हैं कि हुनर को कैसे छोड़ सकते हैं. खुद्दारी का संघर्ष तो है, लेकिन इसके आनंद का कोई मुकाबला भी नहीं है.

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दिनभर में बनाती हैं 150 का सामान
20-25
रुपये में जंगली, जबकि 100 रुपये में हाइब्रिड बांस खरीदती हैं. बांस खरीदकर लाना, चीरना, छीलना तब जाकर बुनने का काम करती हैं. दो टोकरी हर रोज बना लेती हैं यानी करीब 150 रुपये का काम कर लेती हैं. इसमें करीब 50 रुपये पूंजी लग जाती है. बाद बाकी इनकी अथक मेहनत होती है.

महीने में चार हजार की कमाई
रामपुर में शुक्रवार को साप्ताहिक बाजार लगता है. हर बाजार को करीब 800-900 रुपये के सामान बेच लेती हैं. बीच-बीच में पड़ोस के गांवों में भी पैदल जाकर बांस के सामान बेचती हैं. सूप-टोकरी की मरम्मत करती हैं. इस तरह महीने में चार हजार की कमाई कर लेती हैं. इन्हें वृद्धा पेंशन भी मिलती है. वैसे ये इसकी मोहताज नहीं हैं.

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बांस के सामानों की कीमत(रुपये में)
सूप-60, टोकी-70, टोकरी-80, नाचू-100, खांचा-150, टापा-170 और बांस का छाता 400 में बेचती हैं.

समूह से बदला जीवन का रंग
अधिकतर बुजुर्ग तिरस्कार, अकेलापन, भय, परिवार की मुख्यधारा से अलग, बहिष्कृत व बोझ समझी जाती हैं. किसी तरह जिंदगी काटने पर मजबूर रहती हैं, लेकिन वृद्ध समूह से इनके जीवन का रंग बदल गया है. समूह की साप्ताहिक बैठक में ये बचत करती हैं. अपनी उम्र की सखियों के साथ मिल-बैठकर बातें भी करती हैं. नये वृद्ध परिवार से जिंदगी सरस हो गयी है.

हुनर को मिला जीवनदान
वर्ष 2016 में झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी के सहयोग से एकता आजीविका वृद्ध स्वयं सहायता समूह का गठन किया गया. सोसाइटी के रामपुर कलस्टर के पीआरपी प्रकाश कुंवर बताते हैं कि पहले भी ये बांस के सामान बनाती थीं, लेकिन पूंजी का अभाव रहता था. नियमित काम नहीं कर पाती थीं. समूह गठन के साथ ही वन टाइम मैनेजमेंट कॉस्ट के रूप में तीन हजार रुपये व स्टार्टअप किट के रूप में तीन हजार रुपये यानी छह हजार रुपये समूह को दिये गये. इसके बाद रिवॉल्विंग फंड के रूप में 15 हजार दिये गये हैं. समूह की बुजुर्ग महिलाएं साप्ताहिक 10 रुपये बचत करती हैं. इससे अब वह लोन लेकर आसानी से अपना काम कर लेती हैं. किसी से मदद मांगने की जरूरत नहीं पड़ती.