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  • Jul 5 2019 5:26PM

राशन डीलरों की मनमानी से लाभुकों को नहीं मिल रहा चावल, जांच के आदेश

राशन डीलरों की मनमानी से लाभुकों को नहीं मिल रहा चावल, जांच के आदेश

दुर्जय पासवान

जिला: गुमला

गुमला जिले के जंगलों व पहाड़ों में रहनेवाले विलुप्तप्राय आदिम जनजातियों के घर पर डाकिया योजना का चावल नहीं पहुंच पा रहा है, जबकि सरकार का निर्देश है कि 35 किलो चावल हर पीवीटीजी परिवार के घरों तक पहुंचाया जाये. गुमला जिले में रहनेवाले असुर, कोरवा, बिरजिया, बिरहोर, परहैया जनजाति के लोगों को यह सुविधा नहीं मिल रही है. आलम यह है कि आपूर्ति विभाग द्वारा पीवीटीजी लाभुकों का राशन डीलरों को थमा दिया जा रहा है, जो लाभुक डीलर के घर तक पहुंच गये, उन्हें राशन मिल गया. लेकिन, जो लाभुक डीलर के घर तक नहीं पहुंच पा रहे हैं, उन्हें राशन नहीं मिल रहा है. हालांकि, जिला आपूर्ति कार्यालय का दावा है कि बिशुनपुर प्रखंड की पंचायतों में चावल का वितरण किया गया है. जिले की 52 पंचायत के 171 गांवों में आदिम जनजाति परिवार निवास करते हैं. इनके कुल परिवारों की संख्या 3904 है, जबकि आबादी 20 हजार से अधिक है

प्रखंडवार आदिम जनजाति परिवारों की संख्या

प्रखंड                    पंचायत                 गांव               लाभुक
बिशुनपुर                     10                        52              1825
चैनपुर                        06                        39               846
डुमरी                         12                        29               507
घाघरा                        07                        27               470
रायडीह                      09                        11                 61
गुमला                        02                        03                 27
पालकोट                    02                        02                 14
कामडारा                   01                          01                 11
जारी                        03                          07               143
कुल                       52                       171               3904

राशन के लिए तय करनी पड़ती है 10 किमी की दूरी
पानी, बिजली, शौचालय और स्वास्थ्य की सुविधा नहीं है. चलने लायक सड़क भी नहीं है. रहने के लिए वही पुराना कच्ची मिट्टी का घर. ऊपर से डाकिया योजना का राशन भी समय पर नहीं मिलता है. यही है विलुप्तप्राय कोरवा जनजाति गांव की कहानी. हम बात कर रहे हैं गुमला से 10 किमी दूर घटगांव पंचायत के तेतरडीपा गांव की. आजादी के बाद भी आज तक इस गांव की तस्वीर नहीं बदली. इस गांव में कोरवा जनजाति के 15 परिवार रहते हैं. गांव में एक स्कूल चल रहा था. जिसे छात्रों की कम संख्या का हवाला देकर बंद करा दिया गया. ग्रामीण बताते हैं कि एक साल पहले मुखिया गांव गया था. इसके बाद कभी झांकने नहीं आया. सरकार हर गरीब राशन कार्डधारी को मुफ्त में गैस सिलेंडर दे रही है, लेकिन जिले का यह पहला गांव है, जहां कोरवा जनजाति को रसोई गैस सिलेंडर नहीं मिला है. गैस सिलेंडर देने के नाम पर एक बिचौलिए ने आवेदन भरने के नाम पर 30-30 रुपये वसूल लिया. अभी तक सिलेंडर नहीं मिला है. गांव में पेयजल की सुविधा नहीं है. डेढ़ किमी दूर पहाड़ की तराई के चुआं से पानी भरकर लोग लाते हैं, तब पीते हैं. पानी भरने के लिए भी शारीरिक मेहनत खूब करनी पड़ती है. गांव की बुद्धवा कोरवा, सोनिया कोरवाइन, सनियारो कोरवाइन, संतु कोरवा ने कहा कि आजादी के बाद विकास की उम्मीद थी. सरकारें बदलती रहीं, लेकिन गांव की तस्वीर नहीं बदली. राशन लाने के लिए 15 किमी दूर सोसो लालडीपा गांव डीलर के घर जाना पड़ता है. ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि 35 की जगह 33 किलो ही चावल मिलता है.