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  • Jun 20 2019 6:19PM

वृद्ध महिलाओं की समूह ने कहा-मांगने से अच्छा है खुद पर भरोसा करना

वृद्ध महिलाओं की समूह ने कहा-मांगने से अच्छा है खुद पर भरोसा करना

पंचायतनामा टीम

वृद्धावस्था उम्र का आखिरी पड़ाव, जहां शरीर साथ छोड़ने लगता है. इस दौर में अपने भी मुंह फेरने लगते हैं. इस कारण व्यक्ति अकेला महसूस करने लगता है. इन सबके बीच सबसे अहम है आर्थिक समस्या. ग्रामीण क्षेत्र के बुजुर्गों को यह दर्द ज्यादा परेशान करता है, लेकिन नामकुम प्रखंड के कुछ गांवों की बुजुर्ग महिलाओं ने शिकायत का रोना रोने की बजाय इसका समाधान ढूंढ निकाला. बुजुर्ग महिलाओं ने स्वयं सहायता समूहों का गठन किया. इससे इनकी परेशानी काफी हद तक कम हो रही है. इतना ही नहीं, उम्र के इस पड़ाव पर पहुंच कर भी महिलाएं आत्मनिर्भर बन रही हैं. अब उन्हें अपनी छोटी-मोटी जरूरतों के लिए किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता है. इन छोटे-छोटे समूहों के जरिये महिलाओं का एकाकीपन भी दूर हो रहा है और जीने की इच्छा भी बरकरार है. वृद्ध महिलाएं, जिन्हें घर के लोग बोझ समझते थे. आज वे अपनी मेहनत की बदौलत घर के खर्चे में सहयोग कर रही हैं. इन वृद्ध महिलाओं को जेएसएलपीएस के माध्यम से भरपूर सहयोग मिलता है.

काफी अच्छे से होता है पैसों का लेन- देन
नामकुम प्रखंड की सिदरौल पंचायत के प्लांडू गांव में मई 2016 में सरना वृद्ध स्वयं सहायता समूह का गठन हुआ. समूह में 12 महिलाएं हैं. इनकी उम्र 45 से 70 साल है. आज इनका समूह काफी अच्छे से चल रहा है. वृद्ध महिलाएं काफी अच्छा काम कर रही हैं. वे कहती हैं कि उन्हें अब जीने का सहारा मिल गया है. उनके समूह में पैसों का लेन-देन काफी अच्छे तरीके से होता है. समय पर समूह की बैठक होती है और सभी वृद्ध महिलाएं साप्ताहिक बैठक में पैसा जमा करती हैं. बुजुर्ग महिलाएं बताती हैं कि उम्र के इस पड़ाव में स्वास्थ्य एक बड़ी समस्या है और अक्सर बीमार भी पड़ते हैं. इसके कारण कभी-कभी घरवाले इलाज कराने में आनाकानी करते हैं, लेकिन अब कोई समस्या नहीं है, क्योंकि समूह में पैसे जमा हैं. जब जरूरत पड़ती है, पैसे निकाल लेते हैं और धीरे-धीरे चुका देते हैं. वे बताती हैं कि इस उम्र में समूह से जुड़ने का उन्हें एक और लाभ मिल रहा है कि वृद्धजनों के लिए चलायी जा रही सरकारी योजनाओं की जानकारी उन्हें मिल जाती है और वे इसका लाभ भी उठा रही हैं.

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शारीरिक श्रम से मिली मुक्ति
सरना स्वयं सहायता समूह की वृद्ध महिलाएं बताती हैं कि वृद्ध हो जाने के बाद शरीर भी ठीक से काम नहीं करता है. खासकर ग्रामीण इलाकों में तो खेती-बारी करना असंभव ही हो जाता है. शारीरिक मेहनत करके और कोई काम नहीं कर पाते हैं, लेकिन अब इन सबसे छुटकारा मिल गया है. अब सिर्फ महिलाएं साप्ताहिक बैठक करती हैं. समूह में कुछ ऐसी महिलाएं हैं, जो समूह से छोटा लोन लेकर आजीविका के लिए बकरी पालन और सूकर पालन कर रही हैं. वे बताती हैं कि अब मजदूरी कर पाने में वो सक्षम नहीं हैं और न ही उनके पति काम करने के लायक हैं, जिसके कारण उन्हें परेशानी होती है. इसलिए अब यह समूह उनके लिए आजीविका का जरिया बन गया है.

अब अकेलेपन का डर नहीं सताता
वृद्ध महिला समूह की महिलाएं बताती हैं कि अब उनके पास घर में भी कोई काम नहीं होता है, तो घर में अकेले ऐसे ही बेकार बैठी रहती थीं. खाली-बैठे रहने से मन में तरह-तरह के विचार भी आते थे और समय नहीं बीतता था, लेकिन अब समूह बनने के बाद सभी महिलाएं एक जगह बैठ कर बातचीत करती हैं. अपने सुख-दुख को एक-दूसरे के साथ साझा करती हैं. इससे उनका अकेलापन दूर हो जाता है और वो अब पहले से अधिक खुश रहती हैं. इससे इनकी जिंदगी में बदलाव आया है और उनकी धीमी हो चुकी जिंदगी एक बार फिर से रफ्तार पकड़ने लगी है.

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मांगने से कोई नमक तक नहीं देता है : फूलो एक्का
सरना वृद्ध स्वयं सहायता समूह की महिला सदस्य फूलो एक्का कहती हैं कि मांगने से कोई नमक तक नहीं देता है, पैसे तो बहुत दूर की बात है. पहले किसी से पैसे लेने पर कुछ सामान उनके पास गिरवी रखना पड़ता था, लेकिन अब हमारा खुद का समूह हो जाने के कारण हमें पैसों के लिए परेशानी नहीं होती है. फूलो कहती हैं कि पहले वो शराब बनाती थीं, लेकिन समूह से जुड़ने के बाद वह शराब बनाना बंद कर दी हैं.

जरूरतें पूरी हो जाती हैं : आशुमनी लकड़ा
समूह की सदस्य आशुमनी लकड़ा बताती हैं कि पहले वो मजदूरी करती थीं और पति भी मजदूरी करते थे, लेकिन अब शरीर शारीरिक मेहनत करने के लायक नहीं है. ऐसे में महिला समूह से जुड़ने के बाद काफी फायदा हुआ है. समूह से लोन लेकर बकरी और सूकर पालन की शुरुआत की हैं. इससे घर बैठे कमाई हो जाती है.

समाज के लिए कुछ करने का मौका मिला है : ज्योति खलखो
समूह की एक दिव्यांग महिला सदस्य ज्योति खलखो बोल पाने में असमर्थ हैं, लेकिन उनमें आत्मविश्वास है. यह आत्मविश्वास समूह से जुड़ कर हुआ है. वो कहती हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि अब वो खुद से पैसे भी कमा पायेंगी और समाज के लिए कुछ कर पायेंगी, लेकिन समूह के जरिये सामाजिक सुरक्षा के लिए जो कार्य किये जा रहे हैं, उसमें उनकी भागीदारी रहती है. ज्योति कहती हैं कि समूह की बैठक में हर महीने अतिरिक्त राशि जमा की जाती है, जिसे सामाजिक कार्यों में लगाया जाता है.

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सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ मिल रहा है : चिंतामणी देवी
चिंतामणी देवी बताती हैं कि महिला समूह से जुड़ने के बाद लगातार बैठकें हो रही हैं. इस दौरान वृद्धों के लिए चलायी जा रही सरकारी योजनाओं की जानकारी दी जाती है. इससे समूह की महिलाओं में एकजुटता आई है. उन्हें पेंशन मिल रही है और समूह की बाकी महिलाओं को भी पेंशन दिलाने का प्रयास किया जा रहा है.

दु:-तकलीफ का साथी बना समूह : सुधन देवी
दो साल पहले चेने पीरीडीह में एकता आजीविका वृद्ध महिला समूह का गठन हुआ था. सुधन देवी भी उसमें सदस्य के तौर पर जुड़ी थीं. शारीरिक रुप से कमजोर सुधन देवी काफी बीमार थीं और जल्द स्वस्थ्य हुई हैं. बीमारी के दौरान उन्हें इलाज कराने में कोई दिक्कत न हो, इसके लिए समूह से लोन लेकर उन्होंने इलाज कराया. अब धीरे-धीरे उसे चुकता भी कर रही हैं. अब वह बांस का सामान बनाने का काम कर रही हैं. इससे पर्व-त्योहार के दिनों में उन्हें अच्छी आमदनी हो जाती है.