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  • Apr 3 2018 12:19PM

दूध के कारोबार से दरहाटांड़ के ग्रामीणों में आयी समृद्धि

दूध के कारोबार से दरहाटांड़ के ग्रामीणों में आयी समृद्धि

पंचायतनामा डेस्क

 पंचायत इटकी पश्चिमी

प्रखंड इटकी
जिला रांची


राजधानी रांची से करीब 22 किलोमीटर दूर इटकी का दरहाटांड़ गांव दूध उत्पादन के लिए मशहूर है. 65 परिवार और करीब 500 की आबादी वाले इस गांव में करीब 350 गायें हैं, जहां हर रोज तकरीबन 1800 लीटर दूध का उत्पादन होता है. इससे ग्रामीणों को प्रतिमाह 15 लाख रुपये की आमदनी होती है. इस गांव में एक बल्क मिल्क कूलर (बीएमसी) है, जहां से प्रतिदिन तीन हजार लीटर दूध की सप्लाई की जाती है. आस-पास के तीन गांवों के एमपीपी से लगभग 1300 लीटर दूध रोजाना यहां पहुंचता है. औसतन 29.50 रुपये प्रति लीटर के हिसाब से दूध का दाम सीधे किसानों के खाते में चला जाता है. इस तरह ग्रामीण खुशहाल हो रहे हैं.

पहले खेती पर आश्रित था गांव
दरहाटांड़ के ग्रामीण पहले पूरी तरह से खेती पर आश्रित थे. इससे किसानों को बहुत लाभ नहीं मिल पा रहा था. किसान गौ पालन भी करते थे, लेकिन उनके लिए यह मुनाफे का व्यवसाय नहीं था, क्योंकि पहले किसानों को समय पर पैसा मिलता ही नहीं था. दलालों की चांदी थी, जिस कारण दूध का उचित मूल्य भी किसानों को नहीं मिलता था, लेकिन जब से गांव में बीएमसी खुला, किसानों को सही समय पर दूध का उचित मूल्य मिलने लगा, तो किसानों में विश्वास बढ़ा. किसान गौ पालन में जुट गये. गांव के दूसरे किसानों को फायदा होता देख अन्य ग्रामीण भी इस व्यवसाय से जुड़ते चले गये. आज गांव में ही 1800 लीटर दूध का उत्पादन हो रहा है. सरकारी योजनाओं के तहत 45 बीपीएल परिवारों को दुधारू नस्ल की गायें मिली हैं.

समृद्धि के साथ शिक्षा
दूध उत्पादन में बढ़ोतरी होने के बाद दरहाटांड़ गांव में समृद्धि आ गयी. अब तक 65 में से 60 परिवारों ने पक्के मकान बना लिये. सभी घरों में दोपहिया वाहन आ गया. ग्रामीणों के बच्चे अच्छी शिक्षा प्राप्त करने लगे. शिक्षा के स्तर में भी गांव में काफी सुधार आया है. सभी को रोजगार मिल गया. लोग अब खेती के साथ-साथ हरा चारा का भी उत्पादन कर रहे हैं. इससे पशुओं को उचित आहार भी मिल रहा है. खेतों में अब रासायनिक खाद का इस्तेमाल नहीं होता है.

एक बछिया से शुरू हुआ सफर : अशोक महतो
दरहाटांड़ के बीएमसी के संचालक सह गौ पालक अशोक महतो कहते हैं कि पहले वो साप्ताहिक बाजार जाकर सब्जी का व्यापार करते थे. साल 2002 में एक बछिया की खरीदारी की. एक बछिया से शुरू हुआ सफर आज 20 तक जा पहुंचा है. अशोक कहते हैं कि साल 2010 तक वे स्थानीय बाजार में ही दूध बेचा करते थे, लेकिन इसी साल वो डेयरी से जुड़ गये. इससे अशोक को मुनाफा होने लगा. साल 2013 में झारखंड मिल्क फेडरेशन में जुड़े. अधिकारियों से संपर्क होने के बाद गांव में गोकुल ग्राम खोला गया. इसके बाद दूसरे लोग भी इस व्यवसाय से जुड़ने लगे. फिर गांव में बीएमसी खोला गया. बीएमसी खुलने के बाद ग्रामीणों का विश्वास जगा और आसपास के ग्रामीण भी इस व्यवसाय से जुड़ने लगे. किसानों को सब्सिडी में गाय का चारा मिलने लगा. डेयरी किसानों को प्रशिक्षण भी मिलने लगा. वह बताते हैं कि दूध के व्यवसाय से ही उनकी आर्थिक स्थिति सुधरी है. आज उनके पास एक चार पहिया वाहन और पक्का मकान है. वह आज खुशहाल जिंदगी जी रहे हैं.